पूरे देश के साथ स्वतंत्रता दिवस और गणराज्य दिवस मनाने के अतिरिक्त गोवावासी प्रतिवर्ष 18 जून को गोवा क्रांति दिवस भी मनाते हैं। स्मरणीय है कि इसी दिन 1946 में डा0 राममनोहर लोहिया अपने एक मित्र एवं सहपाठी डा0 मेनजीस के निमंत्रण पर कुछ दिनो के लिए गोवा गए थे। वहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि गोवावासियों को सभा लेने का सामान्य नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं है। उसी समय उन्होंने वहाँ गोवावासियों की आजादी की प्राप्ति के लिए मडगांव में सविनय अवज्ञा पूर्वक कानून तोड़ते हुए सभा लेकर संघर्ष करने का आह्वान किया। गोवा प्रदेश की भूमि पर डा0 लोहिया का दिया हुआ भाषण वहां हिन्दी में दिया गया पहला भाषण था। जिस स्थान पर सभा हुई थी उसका नामकरण ‘‘लोहिया मैदान’’ किया गया और वहां उनकी एक आदमकाद प्रतिमा लगी है। प्रतिमा के स्तंभ के चारों ओर संगमरमर की पट्टिकाएं लगी हैं। इनमें कोंकणी, मराठी, हिन्दी और अंग्रेजी में 18 जून 1946 के आह्वान की और डा0 लोहिया की प्रशस्ति में काव्य पंक्तियाँ उत्कीर्ण हैं। कोंकणी की पंक्तियां हैं - ‘‘आयज आमी, मेकले जात्यात, आमचे गले उक्ते जात्यात, तुका किते दिवचें आमी, मोग आमचो माग ! आग्वादाच्या शिवा, तुमे आमका हाडली जाग !’’ - मनोहर सरदेसाय हिन्दी पट्टिका में उत्कीर्ण शब्द उक्त कविता का अनुवाद है - ‘‘आज हम हो गये आजाद, मुक्त हमारी आवाज, हम सब कुछ देने को तैयार, मांग लो हमारा प्यार ! हे आग्वादा के शेर, तुमने, जागने की दे दी पुकार!’’ ‘आग्वदा’ एक किला है, जिसे पुर्तगाली राज्य में कारागृह के तौर पर उपयोग किया जाता था। जून 1948 में बंदी बनाकर डा0 लोहिया को इस किले में रखा गया था, इसलिए कवि ने डा0 लोहिया को ‘आग्वादा के शेर’ के सम्बोधन से विभूषित किया।