आचार्य नरेन्द्रदेव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया की त्रयी के पश्चात् भारतीय समाजवादी आन्दोलन, विचारधारा और तदनुसार अभियानों को समग्रतः सर्वतोन्मुखी समृद्धि व शक्ति देने वाले सेनानियों में रबि़ राय का नाम सर्वाधिक अग्रगण्य एवं पूजनीय है जिन्होंने ‘‘समाजवाद’’ को जीवन-दर्शन के रूप में आत्मसात किया और ‘‘यथा नाम-तथा कर्म’’ सूर्य (रवि) की भाँति सामाजिक-सांस्कृतिक- राजनीतिक विडम्बनाओं-विकृतियों एवं वैरूप्य में निर्णायक मोर्चा लिया। रबि राय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मनसा-वाचा-कर्मणा ही नहीं जन्मना भी सोशलिस्ट, सामाजिक न्याय के योद्धा एवं करुणा से ओत-प्रोत क्रांतिधर्मी मनस्वी थे। लोहिया-जेपी के बाद की पीढ़ी में कुछ ही अखिल भारतीय सिद्धांतनिष्ठ समाजवादी नेता रहे जिनका लेखकीय सरोकार भी रहा उनमें रबि राय अग्रिम-पांक्तेय नेता थे। रबि राय भले ही केन्द्रीय मंत्री और लोकसभाध्यक्ष जैसे बड़े पदों पर पदस्थ रहे किन्तु उन्हें सत्ताजनहित सम्पत्ति, सम्पत्ति प्रसूत सुविधाभोग और अन्य वर्जनायें छू तक नहीं सकीं। वे सत्ता के गलियारों में भी ‘‘कबीर’’ की भॉति रहे। मैं उन सौभाग्यशाली लोगों में से एक हूँ जिन्हें दैव-कृपा से देवतुल्य रबि रायजी के संदर्शन और उनके साथ संवाद का सुअवसर मिला है। समाजवादी वैचारिकी के अलावा भारतीय संस्कृति व भाषाओं विशेषकर हिन्दी के सशक्तीकरण में उनका अतुलनीय योगदान है। आजादी के योद्धा रबि राय का जन्म वर्ष 1926 में नवम्बर माह की 26वीं तारीख को गुलाम भारत में हुआ था। यह वह दौर था जब भारत औपनिवेशिक दासता के विरुद्व निर्णायक संघर्ष की तैयारी कर रहा था। श्री रबि राय बचपन से ही देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत थे, साथ ही साथ सामाजिक कुरीतियों से खिन्न रहते थे। उन्हें समाज में व्याप्त ऊँच-नीच की भावना और मानवीय विभेद को मजबूत करने वाली परम्पराओं से नफरत थी। एक बार सिर्फ संदेह के आधार पर एक ग्वाले की अमानुषिक पिटाई से उनका मन इतना विदग्ध हुआ कि तरुण रबि विद्रोह पर उतारू हो गये। अन्याय के सतत् प्रतिकार का यही भाव उन्हें राममनोहर लोहिया के निकट लाया। उन्होंने आजादी के लिए बुलन्द आवाज मात्र 16 वर्ष की अवस्था में उठाई जब वे भिंगारपुर हाईस्कूल में नवीं कक्षा में पढ़ते थे। उन्होंने नवीं कक्षा के छात्रों को एकत्र कर अगस्त क्रांति की घोषणा के बाद गांधी जी की गिरफ्तारी के विरोध में ‘‘महात्मा गांधी की जय-इंकलाब जिन्दाबाद’’ का नारा लगाते हुए पढ़ाई छोड़ने की घोषणा की। वे सत्याग्रही भी थे और क्रांतिधर्मी भी। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह सदृश हिन्दुस्तान समाजवादी गणतांत्रिक सेना के नायकों का समाजवादी भारत के निर्माण का सपना और इंकलाब जिन्दाबाद का नारा, उनका भी मधुर सपना व नारा था। उनके पिता श्रीमान् घनश्याम राय गांव के सरपंच थे और माता भगवान नृसिंह की पुजारिन थीं। बालक रबि के गुणों पर माता-पिता का प्रभाव पड़ा। रवि के व्यक्तित्व में सिंह की भांति निर्भीकता के तत्व मिलते हैं। रवि राय ‘‘अंग्रेजों भारत छोडो’’ आन्दोलन के दौरान उड़ीसा में हो रहे छात्र-गतिविधियों के केन्द्र बन गये थे। उन्होंने कुछ साथियों के साथ रेंवेशा कालेज के वार्षिक खेलोत्सव के दौरान फहर रहे ब्रिटानिया हुकूमत के झण्डे यूनियन जैक को उतारकर तिरंगा फहरा दिया। देखते ही देखते पूरे उत्कल क्षेत्र में तिरंगा फहराते की मांग होने लगी। यह घटना आजादी प्राप्ति के पहले की है। 1946 में उत्कल विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में ब्रिटानिया हुकूमत के प्रधान सेनापति सर क्लॉड जॉन आइरे आचिनलेक (ब्सवनक श्रवीद म्लतम ।नबीपदसमबा) को शिरकत करना था, किन्तु गतिरोध के भय से वे नहीं आये। आचिनलेक को अकिनेलेक भी कहते थे। रेवेंशा कालेज के पश्चिमी छात्रावास को रबि राय और सहयोगी छात्र नेताओं ने स्वतंत्र छात्रावास घोषित कर दिया। कटक शहर में आजादी और छात्रों के मांग के पक्ष में ऐतिहासिक जुलूस निकालने के कारण रबि राय की गिरफ्तारी हुई। यह उनकी पहली गिरफ्तारी थी। भले ही अपना लोककर्तव्य मान कर रवि राय ने स्वतंत्रता संग्राम में अपनी सहभागिता को अपनी अनिवर्चनीय यश का आधार नहीं बनाया और स्वतंत्रता संग्राम सेनानी का पेश्ंान व अन्य सुविधायें नहीं ली, लेकिन हमारा जाज्वल्यमान इतिहास साक्षी है कि रबि राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के अझुक-अरुक सेनानी थे। वे लोहिया-लोकनायक जयप्रकाश अरूणा आसफ अली की त्रिमूर्ति से 1942 से ही प्रभावित थे। उनकी लोहिया से पहली मुलाकात 1948 में हुई। उन्होंने अपने सैकड़ों समर्थकों के साथ लोहिया से बालेश्वर में जाकर मिले जो प्रसिद्ध समाजवादी नेता रवीन्द्रमोहन दास के यहाँ ठहरे हुए थे। रबि राय ने लोहिया को उसी मुलाकात के बाद अपना नेता, अगुवा व आदर्श मान लिया और जीवन-पर्यन्त लोहिया के अनन्य अनुगामी बने रहे, जो और जैसा सम्बन्ध प्रभु राम व हनुमानजी का रहा वैसा ही सम्बन्ध राममनोहर लोहिया एवं रबि राय का था। वे 1948 में रेवेंशा के छात्र संघ (संसद) के अध्यक्ष चुने गये। वे तरुण समाजवादी संघ के प्रत्याशी थे जिन्होंने कांग्रेस व कम्युनिष्ट छात्र संगठनों के प्रत्याशियों को हराया। उसी दौरान मधुसूदन आइन महाविद्यालय की स्थापना हुई जिसके प्रथम छात्र संसद का चुनाव भी अपनी ईमानदारी, कर्मठता और ज्ञानशीलता जैसे गुणों से अर्जित लोकप्रियता के बल पर रबि बाबू ने जीता। एक उभरते हुए राजनीतिक नक्षत्र के रूप में रबि राय का नाम पूरे प्रदेश में फैलने लगा। लोहिया की भाँति रबि राय ने भी विवाह न करने और परिवार के बन्धनों से मुक्त रहकर राष्ट्र को सशक्त करने और समाज की सेवा का संकल्प लेने का मन बनाया। रबि राय लोहिया की सोशलिस्ट पार्टी से जुड़े। प्रथम आम चुनाव में उड़ीसा में सोशलिस्ट पार्टी 11.77 फीसदी वोट और 10 सीटें मिली। कांग्रेस के बाद उड़ीसा में किसी भी राष्ट्रीय दल की सबसे बड़ी जीत थी। रबि राय की इस महनीय जीत में महत्वपूर्ण भूमिका रही। वे समाजवादी युवक सभा की अखिल भारतीय (राष्ट्रीय) कार्यकारिणी के संयुक्त सचिव बनाये गये। रबि राय ने इस दौरान हिन्दी सीखी। डा0 लोहिया द्वारा 28 दिसम्बर 1955 से लेकर 1 जनवरी 1956 के दौरान पंाच दिवसीय गहन मंत्रणा के बाद निर्मित सोशलिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कार्यसमिति के वे सदस्य निर्वाचित हुए। इस प्रकार भारत की राष्ट्रीय राजनीति में उनका पदार्पण हुए। उन्होंने उड़ीसा में सोशलिस्ट पार्टी की नई इकाई का गठन किया। कटक में 1957 में बाढ़ आई। रबि राय ने बाढ़ पीड़ितों की सहायता के लिए कई टोलियों का गठन किया और अपनी समस्त अर्जित पूंजी पीड़ितों को सौंप दी। उन्होंने हरे कृष्ण महताब सरकार के विरुद्ध बाढ़-पीड़ितों की सहायता व पुर्नवास में उदासीनता का आरोप लगाते हुए सत्याग्रह किया और गिरफ्तारी दी। वे इस सत्याग्रह के बाद उड़ीसा में सत्ता से टकराने वाले जननेता के रूप में उभरे। रबिदा ने खुद को समाजवादी आन्दोलनों, अभियानों और सोशलिस्ट पार्टी के सांगठनिक गतिविधियों को समर्पित कर दिया था। डा0 लोहिया ने जन और मैनकाइंड के बाद चौखम्बा का प्रकाशन किया। उन्होंने इसके संपादन का दायित्व तीन युवाओं को दिया जिसमें बी0 सत्यनारायन रेड्डी एवं मामा बालेश्वर दयाल के साथ रबि राय भी थे। ‘‘चौखम्भा’’ में प्रकाशित लेखों, समीक्षाओं एवं संपादकीयों में रबिदा की झलक साफ-साफ दिखती थी। रबि राय जैसा लिखते थे, वैसा ही दिखते भी थे और उनकी कथनी-करनी में कभी अंतर नहीं रहा। वे लोहिया की हर कसौटी पर खरे उतरे। लोहिया हर लेखक से उम्मीद करते थे कि वे जैसा लिखें, वैसा ही दिखें। इस संदर्भ में राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की एक कविता दृष्टव्य है जो उन्होंने ‘‘दिनचर्या’’ शीर्षक से लिखी है -

तब भी मां की कृपा, मित्र अब भी अनेक छाये हैं,
बड़ी बात तो यह कि, लोहिया संसद में आये हैं,
वह पूछते हैं, ‘दिनकर! कविता में जो लिखते हो,
वह है सत्य या कि वह जो तुम संसद में दिखते हो,
मैं कहता हूँ, ‘‘मित्र सत्य का मैं भी अन्वेषी हूँ,
सोशलिस्ट ही हूँ लेकिन कुछ अधिक जरा देशी हूँ।

‘‘चौखम्बा’’ के संपादन-कार्य के कारण रबि राय भारतीय साहित्यकारों व विचारकों के करीब आये और इससे उनके अंतस में छुपे साहित्यकार व विचारक को समुचित मंच एवं प्रस्फुटन का अवसर मिला।

चौखम्बा के संपादकीय दायित्व के कारण उन्हें ज्यादातर समय उड़ीसा के बाहर विशेषकर हैदराबाद में व्यतीत करना पड़ता था। उड़ीसा की जनता और समाजवादी कार्यकर्ताओं ने रबिदा को उड़ीसा की बेहतरी के लिए लोहिया से मांगा। लोहिया के निर्देश पर रबिदा सोशलिस्ट पार्टी की उड़ीसा इकाई के सचिव बने। उनके सचिव बनने के बाद उड़ीसा में समाजवादी कार्यकर्ताओं और पार्टी को मानो जटायु के पर मिल गये। भारतीयता और राष्ट्रीयता को जीने वाले रबि राय ने सामंती भाषा अंग्रेजी और भाषागत शोषण के खिलाफ रचनात्मक लड़ाई छेड़ दी। उन्होंने सरकारी दफ्तरों से विशेषकर विधान सभा से अंग्रेजी के प्रभुत्व को हटाने के लिए अभियान चलाया। अंग्रेजी की जगह उड़िया व हिन्दी का प्रयोग हो, इस अभिप्राय से ओत-प्रोत रबि राय के वक्तव्य लोगों को झंकृत करने लगे। सरकार उनकी बढ़ती लोकप्रियता से घबरा गई, उन्हें जेल के सीखचों के पीछे डाल दिया। रबि राय इस यातना से टूटे नहीं अपितु कुंदन की भाँति तप कर और निखरे। परिवार के सदस्य और मित्रगण रबि राय की शादी करवाना चाहते थे किन्तु रबि राय पर लोहिया जैसा बनने का धुन सवार था। हर नेता व कार्यकर्ता जिसे अपना आदर्श मानता है, उसके जैसा बनने की यथासंभव प्रयास करता है। काफी जद्दोजहद के पश्चात् रबि राय को पारिवारिक दबाव के आगे नतमस्तक होना पड़ा। मित्र नरेन्द्र जेना के प्रयास से उनकी शादी डा0 सरस्वती स्वाइं से हुई। डा0 स्वाइं के साथ उनकी शादी भी समाजवादी विचारधारा के अनुरूप हुई। दोनों ने दहेज का बहिष्कार किया। रबि राय दहेज विरोधी मंच के सचिव भी थे। शादी में लेन-देन के नाम पर सौ रुपये का चंदा डा0 स्वाइं की माताजी ने महान समाजवादी चिन्तक व नेता किशन पटनायक को दिया, उस समय किशन पटनायक सोशलिस्ट पार्टी के सचिव थे। डा0 स्वाइं भी कस्तूरबा गांधी, प्रभा देवी की परम्परा की महिला निकलीं। उन्होंने रबि राय का पूरा साथ निभाया और उनकी शक्ति बनीं। उनके नाना स्वाधीनता संग्राम सेनानी और सर्वोदयी नेता हरेकृष्ण बिस्वाल थे इसलिए वे सामाजिक सरोकारों को समझती थीं। उन्होेंने दाम्पत्य को रबि राय की पग-बाधा नहीं बनने दिया। डा0 लोहिया जब भी उड़ीसा के दौरे पर आते, रबि राय उनके साथ छाया की तरह रहते। सोशलिस्ट पार्टी के महासचिव बनने के बाद वे खुद भी संगठन के काम के कारण देश के बाकी हिस्सों में जाते और लोगों को संगठित करते थे। उन्होंने लोहिया के मणिपुर-सत्याग्रह मेें भी रिशांग कीशिंग के साथ सहभाग किया। मणिपुर में लोहिया के बाद सर्वाधिक लोकप्रिय समाजवादी नेताओं रबि राय का ही नाम आता है। यह बात मुझे मणिपुर के प्रथम सांसद, लोहियावादी नेता और वहां के मुख्यमंत्री रहे कीशिंगजी ने बताई थी, जब मैं मणिपुर प्रवास के दौरान उनसे मिलने गया था। कीशिंग के अनुसार रबि राय की सादगी व साफगोई हृदय को छू जाती थी। वे गरीबों में ऐसे उठते-बैठते थे जैसे उनसे ज्यादा गरीब व दीन कोई न हो और बड़े लोग उनके बड़प्पन के कायल थे। कीशिंग के अनुसार उन्होंने राजनीति व समाजसेवा के कई सबक रबि राय से सीखे। पुरी में सरकारी भ्रष्टाचार और प्रशासनिक लूट के विरुद्ध छात्रों व युवाओं ने आन्दोलन किया। इस आन्दोलन को कुचलने के लिए रबि राय को भारत रक्षा कानून के अन्तर्गत गिरफ्तार किया गया। बीरेन मित्रा सरकार को अन्ततोगत्वा झुकना पड़ा। रबि राय रिहा हुए। उनका स्वागत नायकों की भाँति हुआ। कांग्रेस को बीरेन मित्रा की जगह सदाशिव त्रिपाठी को मुख्यमंत्री बनाना पड़ा। लोहिया 1965 में फर्रूखाबाद से चुनाव लड़ रहे थे। उनके सामने नेहरू कैबिनेट के कद्दावर मंत्री बालकृष्ण विश्वनाथ केलकर थे। सारे देश की दृष्टि इस चुनाव पर थी। रबि राय उड़ीसा से चुनाव प्रचार करने पहुँचे। उन्होंने पूरा एक माह दलित बस्ती में बिताया। लोहिया की ऐतिहासिक जीत में उनकी महती भूमिका थी। लोहिया ने ‘‘कांग्रेस हटाओ-देश बचाओ’’ अभियान के तहत उड़ीसा पहुँचे। उनके पहुँचने के पहले रबि राय एक बड़ी रैली ‘‘कांग्रेस हटाओ’’ आन्दोलन के अन्तर्गत कर चुके थे जिसमें नव कृष्ण चौधरी का भाषण हुआ था। ईमानदारी की प्रतिमूर्ति नवकृष्ण चौधरी उपाख्य नव बाबू, रबि राय के कारण ही इस रैली में आये थे। हर ईमानदार व्यक्ति रबि बाबू को अपना व्यक्ति समझता था। लोहिया का कार्यक्रम उड़ीसा में भुवनेश्वर, पुरी और कटक में लगा। कटक-रैली में लोहिया जी व नव बाबू को साथ-साथ भाषण देना था। शाम को चाय पीने के समय लोहिया जी ने नव बाबू को याद किया तो उनकी खोज शुरू हुई तो पता चला कि वे बाथरूम में कपड़े धो रहे थे। रबि दा को उन्होंने बताया कि कपड़े धोयेंगे नहीं तो सुबह पहनेंगे क्या? वे शाम को कपड़े धोकर फैला देते हैं, सुबह वही पहनकर राजनीति व जनसम्पर्क करते हैं। वे उड़ीसा के मुख्यमंत्री व राजस्व मंत्री रहे। रेवेंशा कालेज में वे रबि राय के सीनियर भी थे। लोहिया और नब बाबू के कहने पर रबि राय पुरी से लोकसभा का चुनाव लड़े। उन्होंने अपने कद्दावर प्रतिद्वंदी मंत्री रहे बिबुधेन्द्र मिश्र को लगभग 60 हजार मतों से पराजित किया।

लोहिया-रबि राय के अभियान का असर उड़ीसा में दिखा। 1967 में गैर-कांग्रेसी सरकार बनी। स्वतंत्र पार्टी ने कांग्रेस को अपदस्थ कर सरकार बनाई, राजेन्द्र नारायण सिंह देव मुख्यमंत्री बने। रबि राय ने संसद में अपना पहला भाषण हिन्दी और उड़िया में दिया। लोकसभा में भारतीय भाषाओं एवं संस्कृति को सशक्त करने की दिशा में यह एक बड़ा और कड़ा निर्णय था। इसके लिए भारतीय भाषाओं के सशक्तीकरण से जुड़े हम सभी सदैव उनके कृतज्ञ रहेंगे। चौथी लोकसभा के प्रथम व द्वितीय सत्र साक्षी है कि रबि राय ने लोहिया के अप्रतिम सहयोगी की आदर्श भूमिका निभाई। उनकी काबिलियत और कटिबद्धता को देखते हुए उन्हें सोशलिस्ट पार्टी का लोकसभा में उपनेता नियुक्त किया गया। लोहिया के कभी-कभी अपनी बारी आने पर वे लोहिया के प्रश्न से जुड़ा पूरक प्रश्न पूछ बैठते थे। जैसे 25 मई 1967 को अखनूर के पास भारतीय सेना की गश्ती दल पर हुए पाकिस्तानी सेना के हमले का प्रश्न लोहिया उठाना चाहते थे तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष ने तकनीकी कारणों से उन्हें अनुमति नहीं दी। प्रश्न उठाने का पूर्व निर्धारित क्रमांक रबि राय का था। उस प्रश्न को रबि राय ने उठाया। 6 जून 1967 को राज्यसभा में बहस के दौरान एक सदस्य ने लोहिया के विरुद्ध अवमानकारी टिप्पणी की, रबि राय ने लोकसभा में विशेषाधिकार प्रस्ताव लाए कि लोहिया पर की गई टिप्पणी की जांच विशेषाधिकार समिति को सौंपा जाय। 8 जून 1967 को रबि राय भाषा सम्बन्धी सवाल लोहिया के निर्देश पर उठाया था जिसका जवाब तत्कालीन उप प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने दिया। इसी के बाद आय कर भरने का फार्म अंग्रेजी के साथ-साथ हिन्दी व स्थानीय भाषाओं में उपलब्ध होने लगा। रबि राय ने लोहिया जी से जो सीखा और समझा, लोहिया के बाद परम्परा का रूप दिया। वे सदन में भ्रष्टाचार, कदाचार व अन्तर्राष्ट्रीय मामले पुरजोर तरीके से उठाते रहे। विपक्ष में रहे तो सवाल किए, सरकार में रहे तो सवालों से पीछे नहीं हटे और लोकसभा अध्यक्ष हुए तो पक्ष-विपक्ष का संतुलन बनाए रखा। उन्होंने संसद की मर्यादा व गरिमा से कभी समझौता नहीं किया। कभी भी निजी नफा-नुकसान की बात नहीं की। चौथी लोकसभा में विपक्ष के नेताओं मधु लिमए, अटल बिहारी बाजपेयी व एन0जी0 रंगा तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इन्दिरा गांधी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लेकर आये। विपक्ष की तीन मांगें थीं। संख्या बल के आधार पर अविश्वास प्रस्ताव का गिरना तय था। लेकिन जैसे ही प्रधानमंत्री बोलने के लिए खड़ी र्हुइं, रबि राय ने दृढ़तापूर्वक कहा कि जब तक जनहित की प्रमुख मांगें सरकार स्वीकार नहीं करेगी, वे सदन में प्रधानमंत्री को बोलने नहीं देंगे। नैतिक बल के आधार रबिदा भारी पड़े। तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष नीलम संजीव रेड्डी को लोकसभा मुलतवी करनी पड़ी फिर जब जनहित के मुद्दों को सरकार ने माना, प्रधानमंत्री जी का भाषण हुआ। फ्रांस दौरे के दौरान रबि राय ने पाया कि फ्रांसीसी लोगों को फ्रेंच भाषा के प्रति काफी गौरवबोध है। यही कारण है कि फ्रेंच को संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त है। वे भारतीयों में भारतीय भाषाओं के प्रति वही सम्मानभाव देखना चाहते थे जो फ्रांसीसियों का फ्रेंच के प्रति है। उन्होंने तब मेरी काफी तारीफ की थी जब हिन्दी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के वैश्विक अभियान के लिए उनका आशीर्वाद और मार्गदर्शन मांगने उनके समक्ष गया था। उनके द्वारा प्रशंसा में बोले गए शब्दों को मैं अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनता हूँ। उनका हर शब्द मेरे लिए गीता के शब्दों की भाँति प्रेरक और उत्साहबर्द्धक है। उन्होंने मेरे पर्चे को तीन बार पढ़ा और कुछ संशोधन बतलाए। उनसे जब कोई विदेश या कान्वेन्ट का बच्चा या बच्ची मिलती तो वे उसे हिन्दी व उड़िया पढ़ने के लिए प्रेरित करते थे। इसमें बीजू पटनायक की पुत्री गीता भी शामिल है। ‘‘चौखम्बा’’ में प्रकाशित तत्कालीन राज-विरोधी किन्तु देश प्रेम से सराबोर लेखन व सम्पादन के लिए उन्हें और मामा बालेश्वर को कारावास हुआ। उन्होंने सांसद होने के बाद एक कार्यक्रम में राजभवन की अनुपयोगिता और फिजूलखर्ची पर सवाल उठाते हुए पुरी में स्थित राजभवन को महिला एवं शिशु चिकित्सालय में बदलने की मांग कर दी, जिसके कारण पुनः जेल की यात्रा करनी पड़ी। जब कच्छ की कुछ जमीन पाकिस्तान को समझौते में दी गयी तो कच्छ-सत्याग्रह कर पहुॅचे और एक बार फिर जेल प्रवास करना पड़ा। रबि राय ने सोशलिस्टों के नारे ‘‘एक पैर रेल में-एक पैर जेल में’’ को अपने युवावस्था में चरितार्थ किया। रबि राय के प्रभाव के कारण बीजू पटनायक पश्चिम बंगाल स्थित झाड़ग्राम में आयोजित सोशलिस्टों के शिविर में पहुॅचे थे। बीजू पटनायक के दिल्ली आवास पर छापा पड़ा तो इंदिरा गांधी की नाराजगी की परवाह न करते हुए रबिदा ने राज्य सभा में छापा के औचित्य पर सवाल उठाया। रबि राय 1974 में राज्य सभा के सदस्य निर्वाचित हुए और 1980 तक राज्य सभा में रहे। उनका घर एक तरह उड़ीसा के लोगों और देश भर के समाजवादियों का निःशुल्क सराय था। कभी-कभी रबि राय को ही सोने के लिए सांसद-मित्रों के आवास की पनाह लेनी पड़ती थी। सन् 1975 में ससंद के लोक लेखा समिति के सदस्य बनाये गये लेकिन आपातकाल का विरोध करने के कारण उन्हें पहने तिहाड़ (दिल्ली) फिर अम्बाला जेल में निरूद्ध किया गया। अम्बाला जेल प्रवास का सदुपयोग उन्होंने अध्ययन के लिए किया। उन्हें ज्ःयादातर किताबें पंजाब के मुख्यमंत्री रहे भीमसेन सच्चर ने उपलब्ध करवाई थी। आपातकाल के स्याह बादल छटे। जनता पार्टी का गठन हुआ। रबि राय जनता पार्टी के महासचिव बनाये गये। कुछ दिनों बाद मोरार जी भाई सरकार में मंत्री बने। वे चौधरी चरण सिंह सरकार में भी स्वास्थ्य मंत्री रहे। लोहिया अकादमी के अध्यक्ष, समता न्यास के अध्यक्ष और ‘‘भारती’’ के अध्यक्ष के रूप में रबि राय ने कई रेखांकित करने योग्य कार्य किये। बढ़ती साम्प्रदायिकता को चुनौती देने के लिए देश ने ख्यातिलब्ध सामाजिक- राजनीतिक व सांस्कृतिक विभूतियों ने राष्ट्रीय साम्प्रदायिक सदभावना समिति बनाई जिसका अध्यक्ष रबि राय को चुना गया। वे 1980 में जगतसिंह पुर लोकसभा से लडे़, कांग्रेस के प्रत्याशी लक्ष्मण मलिक से मात्र एक हजार वोटों के अन्तर से हारे, उनकी हार का प्रमुख कारण था कि वे दूसरों को जिताने में लगे रहे और अपने निर्वाचन क्षेत्र को समय नहीं दे पाये। उनकी नजर मे वैयक्तिक हार जीत से दल और विचारधारा की जीत बड़ी है। बीजू बाबू ने 1989 के लोकसभा के लिए वामपंथी नेता लोकनाथ चौधरी को वचन दे रखा था। रबिदा जगतसिंह पुर से ही लड़ना चाहते थे क्योंकि वे बहुत मामूली वोटों से हारे थे। पार्टी फोरम में रबि दा भारी पड़ने के बावजूद केन्द्रापड़ा से लड़े और जीते। जीत के बाद भुवनेश्वर में बीजू पटनायक ने रबि राय को भारत के गौरव जैसी उपाधि से विभूषित किया। इसमें दो राय नहीं कि उड़ीसा की जिन विभूतियों को पूरा देश जानता हैै, उनमें रबि राय का नाम सर्वाधिक परिचित व प्रतिष्ठित है। रबि राय 19 दिसम्बर 1989 से 9 जुलाई 1991 तक लगभग 1 वर्ष 2 सौ 2 दिन लोकसभा अध्यक्ष रहे। इस दौरान विश्वनाथ प्रताप सिंह, चन्द्रशेखर व पामुलापति वेंकट नरसिंह राव नेता सदन (प्रधानमंत्री) और राजीव गांधी व लालकृष्ण आडवाणी नेता प्रतिपक्ष रहे। 9वीं लोकसभा में किसी का बहुमत नहीं था। ऐसी परिस्थितियों में उन्होंने पूरी गरिमा व गुरुत्व के साथ सदन चलाया। संसद में लोहिया की आदमकद तस्वीर उन्हीं के कार्यकाल में लगी। उन्होंने एक भ्रष्ट न्यायाधीश रामास्वामी को पद से हटाने के लिए पहले कमिटी बनाई फिर उसकी रिपोर्ट को अमली जामा दिया। यह कार्य रबि राय जैसे बेहद साहसी व ईमानदार नेता ही कर सकते थे। उन्होंने दल-बदल कानून को दृढ़तापूर्वक लागू किया और कई कद्दावर मंत्रियों सहित 6 सदस्यों की सदस्यता समाप्त की। उन्हीं के कार्यकाल में पारदर्शिता लाने के लिए 20 दिसम्बर 1989 से संसद की बहसों के सीधे प्रसारण की व्यवस्था की गई। वे राष्ट्र मंण्डल संसदीय संघ के अध्यक्ष भी बनाये गये। इसमें विश्व मंे भारतीय मेधा का परचम बुलन्द हुआ। उन्होंने संसदीय कूटनीति (पार्लियामेन्ट्री डिप्लोमेसी) शीर्षक से पुस्तक लिखी जो अपने आप संसदीय नीतिशास्त्र का मार्गदर्शिका है। रबि दा तिब्बत की आजादी की सत्याग्रही-संग्राम से युवाकाल से जुड़े रहे। वे भारत तिब्बत मैत्री संध के अध्यक्ष 1994 में हुए। उन्हांेेने 1995 में बर्लिन में आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। उन्होंने 1997 में चुनाव न लडने की घोषणा की और लोकनायक जयप्रकाश नारायण की भाँति लोकशक्ति अभियान से जुड़ गये। काशी विद्यापीठ द्वारा उन्हें 1998 में सारस्वत सम्मान दिया गया। दलाई लामा द्वारा 18 दिसम्बर 2002 को उन्हें लाइट आफ ट्रुथ सम्मान से नवाजा गया। उन्होंने उड़िया में प्रकाशित समता का भी लम्बे समय तक सम्पादन किया। वे सदैव विकेन्द्रीकरण के पक्षधर रहे। जब भी कोई राजनैतिक कार्यकर्ता उनसे मिलता वे ईमानदारी से राजनीति करने और अध्ययनशील बने रहने की सीख देते। मैंने महसूस किया कि सदैव उनके चेहरे पर एक अलग दिव्य प्रकाश (औरा) रहता था। मुझे उनसे कई बार मिलने का सौभाग्य मिला है। हर बार कोई न कोई नई और महत्वपूर्ण बात उनसे सीखने को मिलती थी। वे समाजवाद, राष्ट्रीयता, भारतीयता और बेहतर समाज के भावप्रवण स्वप्नद्रष्टा थे। उनके सपनों को मूर्तरूप देना हमारी जिम्मेदारी है। ऐसे दौर में जब राजनीति में जाति, धन, बाहुबल, अनैतिकता, मर्यादाहीनता चरम पर हो, रबि राय की प्रासंगिकता और अधिक महनीय प्रतीत होती है। उनके स्मरणों के माध्यम से नई पीढी के सामने एक आदर्श प्रेरणादायी तस्वीर रख सकते हैं।

उनकी चंद तस्वीरें कही महफूज रख लीजै,
सवाल उठ्ठेगा मुस्तकबिल में ऐसे लोग कैसे थे,
जमीं पर रहते थे लेकिन फरिश्तों जैसे थे।

उनकी सौवीं जयंती के उपलक्ष्य में स्मारिका निकालने और राष्ट्रीय स्तर का वैचारिक संगोष्ठी कराने के लिए भाई अभिषेक रंजन सिंह और डा0 राम मनोहर लोहिया रिसर्च फाउण्डेशन की कोटिशः बधाई, इन कार्यो से भारतीय समाजवादी आन्दोलन एवं विचारधारा को गुणात्मक शक्ति मिलेगी।