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आज हमारी दुनिया और देश की स्थिति जितनी बेहतर होनी चाहिए, नहीं है। जो दुःख-दर्द, दंश, दलन, दुर्भाग्य व दूर्वाग्रह पिछली सदी के पूर्वार्द्ध (1900-1950) के दौरान थे, कमोबेश वर्तमान सदी के पूर्वार्द्ध में भी वैसे ही हैं, थोड़ा दृश्यरूप में भले ही प्रतीत हो रही है, किन्तु तत्वतः आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, मानसिक व सांस्कृतिक विसंगतियाँ, विषमतायें व विडम्बनायें वैसी ही हैं।

अभी वही है निजामे कोहना, अभी तो जुल्मो-सितम है
अभी मैं किस तरह मुस्कुराऊँ अभी तो रंजोअलम वही है,
अभी वही है उदास राहें, वहीं हैं तरसी हुई निगाहें,
शहर के पैगम्बरों से कह दो यहाँ अभी शामे-गम वही है।

निराला का ‘‘स्वप्निल सवेरा’’ और साहिर की ‘‘हसीन सुबह’’ अभी नहीं आई, हालांकि हमारा अविचल विश्वास है कि वो सुबह कभी तो आएगी, वो सुबह हमीं से आएगी। दुनिया और देश मंे व्याप्त विषमता को प्रति व्यक्ति आय के समंकों से रेखांकित और प्रतिबिम्बित किया जा सकता है। लक्जमबर्ग की प्रतिव्यक्ति आय 1 लाख 35 हजार 6 सौ डालर है। एक तरफ डेनमार्क, आइसलैण्ड, आस्ट्रेलिया, नीदरलैण्ड, सैन मेरिनो, ग्रीनलैण्ड, स्वीडन, मकाऊ, जर्मनी, बेल्जियम, कनाडा, इजराइल, हांगकांग, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देश हैं जिनकी औसत आय 50 हजार डालर से अधिक है, दूसरी तरफ बुरूण्डी, अफगानिस्तान, सूडान, सियरा लियोन, सोमालिया, यमन जैसे देश हैं, जिनकी प्रतिव्यक्ति आय 1000 डालर से भी कम है। सबसे अधिक प्रतिव्यक्ति आय वाले देश लक्जमबर्ग की औसत आमदनी सबसे कम औसत आमदनी वाले राष्ट्र बुरूण्डी (246 डालर) से 5 सौ 51 गुणा अधिक है। भारत की भी तस्वीर ‘‘नरौ वा कुंजरौ वा’’ शैली में ऐसी ही है। अद्यतन आंकड़ों के अनुसार सबसे अधिक प्रतिव्यक्ति आय वाले राज्य गोवा (4 लाख 72 हजार 70 रूपये अथवा 6215 डालर) और सबसे कम औसत आय वाले प्रांत बिहार (47 हजार 498 रुपए अथवा 625 डालर) मंे लगभग 10 गुणे यानि 4 लाख 24 हजार 572 रूपए का अंतर है। मात्र एक सड़क के अंतर पर स्थित दिल्ली (3 लाख 89 हजार 529 रूपए) और उत्तर प्रदेश (73 हजार 48 रूपए) में 3 लाख 16 हजार 481 रूपए प्रतिव्यक्ति आय का अंतर आर्थिक विषमता की भयावह व वीभत्स चित्र को चित्रित करता है। क्षेत्रीय विषमता जैसी ही स्थिति लैंगिक विषमता की भी है। महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी और समाजवादी चिन्तक राममनोहर लोहिया ने ‘‘सप्तक्रांति’’ का सूत्र देते हुए गैर-बराबरी मिटाने को लोकजीवन का समग्र लक्ष्य बताया था। आजादी की लड़ाई के दौरान चंद्रशेखर आजाद की अध्यक्षता में शहीद-ए-आजम भगत सिंह सदृश मनस्वी राष्ट्रप्रेमियों ने हिन्दुस्तान समाजवादी गणतांत्रिक संघ का गठन भारत को आजाद करा कर यहां शोषण विहीन समता मूलक समाजवादी समाज की स्थापना के ध्येय से 1928 में किया था। नेताजी सुभाषचन्द्र बोस ने बतौर कांग्रेस अध्यक्ष त्रिपुरी में ‘‘समाजवाद की अमंद बयार’’ बहाने की प्रतिबद्धता दोहराई थी। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने संविधान सभा के लक्ष्यों की उद्घोषणा करते हुए 13 दिसम्बर 1946 को कहा था, ‘‘सज्जनों, मैं समाजवाद का समर्थक हूँ, और मुझे आशा है कि सारा हिन्दुस्तान समाजवाद का समर्थन करेगा एवं वह समाजवादी शासन विधान बनाएगा और सारी दुनिया को भी इसी दिशा में चलना होगा’’। नेहरू के प्रस्ताव को सरदार पटेल, मौलाना आजाद, हसरत मोहानी, श्यामा प्रसाद मुखर्जी समेत सभी राष्ट्रनायकों का समर्थन था। आज हम अपने राष्ट्रनायकों की नीति से विचलित हो रहे हैं। लोकनायक जयप्रकाश भी अमीरी-गरीबी की खाई पाटने की संकल्पना समग्र क्रांति में की है। भारत समतामूलक समृद्धि और समृद्धि पूर्ण समानता का पैरोकार रहा है। कृष्ण ने गीता में ‘‘समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्ति परमेश्वरम्’’ कहते हुए समानता व समाजवाद की प्रेरणा दी है। रामराज्य एवं समाजवाद का उद्देश्य एक है, तभी समाजवादी चिंतक राममनोहर लोहिया रामायण मेला लगवाते हुए रामराज्य पर बहस चलाते थे। रामराज्य की व्याख्या करते हुए तुलसीदास ने राम चरित मानस में

‘बयरु न कर काहू सन कोई,
राम प्रताप विषमता खोई’

लिखा है, जबकि अपना देश इस समय गरीबी व आर्थिक विषमता के अथाह महासागर में स्थित अमीरी के हिमालय सरीखा प्रतीत हो रहा है। अमरीका, चीन, जापान व जर्मनी के बाद सबसे धनी व बड़ी अर्थव्यवस्था भारत (3.4 खरब डालर) की है। इस संदर्भ में इंग्लैण्ड, फ्रांस एवं रूस से धनी हिन्दुस्तान है। अरबपतियों के मामले में जापान व जर्मनी से भी आगे भारत तीसरे स्थान पर है, जबकि प्रतिव्यक्ति आय के मामले में हमारे देश से 138 देश आगे हैं। अभी हाल में ग्लोबल हंगर सूचकांक जारी किया गया है जिसमें 125 देशों में भारत 111वें स्थान पर है। भुखमरी की तस्वीर भारत में चिंताजनक है। हम लोगों को बेहतर देश व दुनिया बनाने के लिए सतत प्रयास करना होगा। जब तय है कि इसी देश व दुनिया में रहना है और कोई ग्रह व विकल्प नहीं है तो इसे बेहतर बनाने के अलावा दूसरा रास्ता भी नहीं है। समानता व समाजिक समरसता जैसे आदर्श को आत्मसात कर आगे बढ़ना होगा। अभी भी हमें सांस्कृतिक उपनिवेशवाद से मुक्ति नहीं मिली। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश भारत को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थाई सदस्यता और हिन्दी का संयुक्त राष्ट्र संघ में आधिकारिक भाषा के दर्जा से वंचित होना लोकतांत्रिक आदर्शों का प्रहसन है। ‘वीटो’ लोकतंत्र का माखौल उड़ा रहा है। भारत में भी एक सामान्य जन कलक्टर से अपनी फाइल पर हस्ताक्षर न करने का कारण नहीं पूछ सकता। हमारा स्वयं का व्यवहार सवारी ढोने वाले पायलट और सवारी ही ढोने वाले रिक्शा-चालक के प्रति कितना विभेदपूर्ण होता है। अदालतों में अंग्रेजी का प्रभुत्व न्याय को अन्याय में अभी भी बदल रहा है। हम स्वयं राष्ट्र और देश से जुड़े सवालों पर मौन या पर्याप्त मुखर नहीं हैं। समर अभी शेष है। देश व दुनिया को बेहतर बनाने व लोकतंत्र को सशक्त करने की लड़ाई अनवरत जारी है। हम तटस्थ रहे तो अपराधियों की कतार में खड़ा करने से इतिहास चूकेगा नहीं। राष्ट्रकवि लोहिया व जे.पी. के मित्र दिनकर के शब्दों में-

‘‘समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध
जो तटस्थ है, समय लिखेगा उनका भी अपराध
समर शेष है, चलो ज्योतियों के बरसाते तीर
खण्ड-खण्ड हो गिरे विषमता की काली जंजीर’’

आइए! सोचें कि जो स्वप्न हमारे राष्ट्रनायकों ने देखे थे हम उन्हें कितना मूर्तरूप दे सके और ....

‘‘कोई ख्वाब बुनें कल के वास्ते’’


मंडेला अवार्डी समाजवादी चिंतक दीपक बौद्धिक सभा
व संयुक्त राष्ट्र हिन्दी जन अभियान के अध्यक्ष हैं।
सम्पर्क: 8433373337, 7317356789