
मेरी दिलीप कुमार जी से मुलाकात कैफ़ी आज़मी जी के साथ हुई थी । मिलकर ऐसा लगा कि मैं सामान्य कलाकार के सामने नहीं अपितु एक ऐसी विभूति के समक्ष हूँ जो कला को जीते हैं । एक एक शब्द वो बहुत सोच समझ कर बोलते थे । वो शब्दवेत्ता थे । परदे पर जिस दर्द को उकेरते थे, उसे वे जीते व महसूस करते थे । उन्होंने सहानुभूति के साथ नहीं स्वानुभूति के साथ अभिनय किया, इसलिए वे लाजवाब व जीवित किवदंती बन गए थे । जब वे गरीब व्यक्ति बनते थे तो ऐसा लगता था कि गुरबत के दंश को आवाज दे रहे हैं , वहीं जब वे एक सच्चा हिंदुस्तानी बनते थे तो ऐसा लगता था उनमें भारत की आत्मा बसती है । भारत ही नहीं भारत से बाहर भी वे लोकप्रिय थे । मैंने मॉरीशस यात्रा, अरब यात्रा के साथ साथ अफ्रीका यात्रा के दौरान देखा लोग दिलीप साहब के दीवाने थे । वे देश, भाषा की परिधि से ऊपर उठ चुके थे , अपनी साधना के बल पर वहां अपने स्थापित कर चुके थे जहाँ शब्द नहीं पहुंच सकते। वे शब्देतर हैं ।उन्होंने कभी कला के मेयार को गिरने नहीं दिया, वे लोकप्रियता के शिखर पर थे, दीवानगी थी उनकी इस मुल्क में, लेकिन कोई कंपनी वाला अपना तेल, साबुन बेचने के लिए उन्हें पकड़ नहीं । एक बार एक कंपनी से उनके सचिव ने विज्ञापन के लिए पैसे ले लिए तो दिलीप साहब ने पैसे लौटा दिए । उनका जीवन कला व अभिनय के लिए समर्पित था । वे कभी पैसे के पीछे नहीं भागे । सदियों के बाद ऐसा कलाकार पैदा होता है, जिसपर कला खुद फख्र करती है । कैफ़ी साहब व दिलीप कुमार साहब की बातचीत सुनते हुए मुझे लगा कि दिलीप साहब के फकत एक अभिनेता नहीं अपितु इस मुल्क की तहरीकी आंदोलन को जीने वाले अजीम शख्सीयत हैं । वे सोशलिज्म व सेक्युलरिज्म को जीने वाले कलाकार थे । हिन्दु मुस्लिम एकता के प्रतीक थे । उनका असली नाम यूसुफ था पर वे हिंदू नाम से जाने गए ।