आचार्य नरेन्द्रदेव, लोकनायक जयप्रकाश नारायण और राममनोहर लोहिया की त्रयी के पश्चात् भारतीय समाजवादी आन्दोलन, विचारधारा और तदनुसार अभियानों को समग्रतः सर्वतोन्मुखी समृद्धि व शक्ति देने वाले सेनानियों में रबि़ राय का नाम सर्वाधिक अग्रगण्य एवं पूजनीय है जिन्होंने ‘‘समाजवाद’’ को जीवन-दर्शन के रूप में आत्मसात किया और ‘‘यथा नाम-तथा कर्म’’ सूर्य (रवि) की भाँति सामाजिक-सांस्कृतिक- राजनीतिक विडम्बनाओं-विकृतियों एवं वैरूप्य में निर्णायक मोर्चा लिया। रबि राय बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। वे मनसा-वाचा-कर्मणा ही नहीं जन्मना भी सोशलिस्ट, सामाजिक न्याय के योद्धा एवं करुणा से ओ...
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Image आज हमारी दुनिया और देश की स्थिति जितनी बेहतर होनी चाहिए, नहीं है। जो दुःख-दर्द, दंश, दलन, दुर्भाग्य व दूर्वाग्रह पिछली सदी के पूर्वार्द्ध (1900-1950) के दौरान थे, कमोबेश वर्तमान सदी के पूर्वार्द्ध में भी वैसे ही हैं, थोड़ा दृश्यरूप में भले ही प्रतीत हो रही है, किन्तु तत्वतः आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, मानसिक व सांस्कृतिक विसंगतियाँ, विषमतायें व विडम्बनायें वैसी ही हैं। अभी वही है निजामे कोहना, अभी तो जुल्मो-सितम है अभी मैं किस तरह मुस्कुराऊँ अभी तो रंजोअलम वही है, अभी वही है उदास राहें, वहीं हैं तरसी हुई निगाहें, शहर के पैगम्बरों से कह दो यहाँ अभी शामे-गम वही है। निराला का ‘‘स्वप्...
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भारत को मिले स्थाई सदस्यता व हिंदी को आधिकारिक दर्जा, दीपक ने की ऐतिहासिक कदम उठाने की मांग, प्रधानमंत्री व विदेश नंत्री को लिखा पत्र, बौद्धिक सभा व संयुक्त राष्ट्र हिंदी जन अभियान के अध्यक्ष दीपक मिश्र ने प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदर दास मोदी को पत्र लिखकर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत की स्थाई सदस्यता और हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने हेतु निर्णायक कदम उठाने की पुरजोर मांग की है । समाजवादी चिंतक श्री मिश्र ने बताया कि भारत इस समय संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का अस्थाई सदस्य है, जिसकी मियाद 31 दिसम्बर 2022 को समाप्त हो रही है। ...
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एक बार पुनः संयुक्त राष्ट्र संघ में भारतीय गणराज्य को प्रतीकात्मक रूप में ही सही कूटनीतिक व सामरिक पराजय का मुंह देखना पड़ा । हमारी आन बान शान का प्रतीक तिरंगा की लहराव में जो धुनक होनी चाहिए, वो नहीं दिखी । आज यदि भारत सुरक्षा परिषद का स्थाई सदस्य होता और भारत के पास वीटो पावर होता तो हमारे तिरंगा का मान कुछ और ही होता। भारतीय गणराज्य के माननीय नागरिक के रूप में मैंने कई बार आपसे माननीय विदेश मंत्री जी से और संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव जी से मांग की कि भारत को सुरक्षा परिषद के स्थाई सदस्य प्रदान की जाए और हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा दिया जाए । कहने में थोड़ी हिचक ल...
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सर्वविदित तथ्य है कि भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद देश को स्वतंत्र कराकर हिन्दुस्तान में गणतांत्रिक समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे। अपने इसी पवित्र लक्ष्य के लिए 7-8 सितम्बर 1928 को ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला किले के खण्डहरों में गठित हिन्दुस्तान समाजवादी गणतांत्रिक संघ के वे संस्थापक अध्यक्ष बने थे। आजाद और उनके क्रांतिधर्मी सहयोगी यथा भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव, राजगुरू, मन्मथनाथ गुप्त, डा0 भगवान दास माहौर, विश्वनाथ वैशम्पायन कोरे क्रांतिकारी नहीं अपितु काफी मननशील स्वाध्यायी प्रवृत्ति के थे। दुर्भाग्य है कि आजाद व उनके साथियो...
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Image मैं बड़े गर्व के साथ कहता हूँ कि मैंने नीरज जी के साथ संवाद किया है, उन्हें देखा , सुना और महसूस किया है । वे जितने बड़े रोमानी कवि थे उतने महान यथार्थ के चितेरे थे । हिंदुस्तान की बात खास अंदाज में सलीके से करते थे । उनकी यह पंक्तियां कितनी समीचीन प्रतीत होती हैं- ज्यों लूट के कहार ही दुल्हन की पालकी हालत यही है आज कल हिंदुस्तान की उनसे बहुत कुछ सीखने को मिला । वे गीतों के ऋषि व राजकुमार थे । कई फिल्मों में विशेषकर देवानंद की फिल्मों में उनके गीतों के सम्मोहन के प्रीतिपाश में देश आज भी है। उनके यश का कारवां आज भी उसी धज से गुजर रहा है । उन्होंने सिनेमा में साहित्य को प्रतिष्ठित...
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Image इस सदी के सबसे बड़े वैश्विक योद्धा मदीबा नेल्सन मंडेला की आज जयंती है । मुझे दर्प है और होना भी चाहिए कि मैं चंद उन भारतीयों में एक हूँ जिनकी आँखों को मंडेला जी को देखने का पुनीत सौभाग्य मिला है और जिनके हाथों को मदीबा प्रिक्स अथवा मंडेला अवार्ड उठाने का गौरव प्राप्त है । वे इस सदी के लोहिया थे जिन्होंने गांधी के आंदोलन को आगे बढ़ाया । वे राष्ट्रपति थे, दोबारा बन सकते थे, सभी उनके नाम के दीवाने थे किंतु उन्होंने राष्ट्रपति बनने से मना कर दिया । वे किसी भी पद से बड़े थे । जब ट्यूनीशिया से आतंकवाद विरोधी मार्च के दौरान उनसे मिला और अपनी पुस्तक दी । पुस्तक के मुख पृष्ठ पर अंकित महा...
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Image मेरी दिलीप कुमार जी से मुलाकात कैफ़ी आज़मी जी के साथ हुई थी । मिलकर ऐसा लगा कि मैं सामान्य कलाकार के सामने नहीं अपितु एक ऐसी विभूति के समक्ष हूँ जो कला को जीते हैं । एक एक शब्द वो बहुत सोच समझ कर बोलते थे । वो शब्दवेत्ता थे । परदे पर जिस दर्द को उकेरते थे, उसे वे जीते व महसूस करते थे । उन्होंने सहानुभूति के साथ नहीं स्वानुभूति के साथ अभिनय किया, इसलिए वे लाजवाब व जीवित किवदंती बन गए थे । जब वे गरीब व्यक्ति बनते थे तो ऐसा लगता था कि गुरबत के दंश को आवाज दे रहे हैं , वहीं जब वे एक सच्चा हिंदुस्तानी बनते थे तो ऐसा लगता था उनमें भारत की आत्मा बसती है । भारत ही नहीं भारत से बाहर भी वे लोकप...
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Image आपदा में अवसर तलाशने और पैसा बनाने वाले तथाकथित बड़े लोगों को भारत के सच्चे सपूत का एक संस्मरण बताना चाहूँगा, शायद उन्हें शर्म आ जाए , लेकिन उनमें शर्मोहया होती तो आपदा को आपदा के रूप में लेते न कि उसमें अवसर तलाशते । चाहे वो ग्लोबल टेंडर के बहाने परिचित कंपनी को ठेका दिलाने में जुटे सरकार प्रिय साहेब हों, मौका पाकर ऑक्सीजन का कालाबाजारी करने वाले विधायक जी हों, दोनों मुझे बहुत छोटे लगने लगे जब मंगरु भाई से मुलाकात हुई । कहने में जरा भी हिचक नहीं कि इंसानियत और इंसानी तकाजों को जीने की एक सीख मिली । मेरे जीवन का फलसफा है कि समंदर से लेकर मरुधर को देकर आगे बढ़ जाता हूँ । खाना वित...
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Image गोवा 1498 में पुर्तगाली यात्री वास्कोडिगामा के आने के बाद पुर्तगालियों की दृष्टि में आया। 17वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध तक यहाँ पुर्तगालियों का कब्जा हो गया। भारत के आजाद होने के बाद भी गोवा गुलाम रहा और 19 दिसम्बर 1961 को मुक्त हुआ। गोवा की आजादी का सिंहनाद डा0 लोहिया ने किया था। वहाँ के लोकगीतों में डा0 लोहिया का वर्णन पौराणिक नायकों की तरह होता है। मो0 आजम का यह लेख इसी इतिहास की ओर इशारा करता है। यदि गोवा की आजादी का श्रेय किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वे डा0 राममनोहर लोहिया है, जिन्होंने पहली बार गोवा के आजादी के मुद्दे को राष्ट्रीय स्तर का मुद्दा बनाया और अस्वस्थता के बावजूद गोव...
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लोकराज लोक लाज से चलती है । यह सरकार लोकलाज खो चुकी है । इसकी आंखों में न हया का पानी बचा है न दया का पानी शेष रहा । लोकलाज खोने का सबसे बड़ा उदाहरण यह है कि सरकार स्याह सुलगते सवालों से दो चार होने की बजाय सच को छुपाने में लगी है । डुमरियागंज में पत्रकार ने पूछ लिया कि 50 बेड के अस्पताल के उद्घाटन की घोषणा की जबकि यहां मात्र 2 बेड दिख रहे हैं । योगी जी द्वारा हठ करने के बाद टिकट पाए और प्रदेश में सबसे कम मतों से बामुश्किल से जीतने वाले विधायक और एसडीएम की मौजूदगी में पत्रकार की निर्मम पिटाई की गई । इनका राम और रामराज से कोई सरोकार नहीं है । आज यदि रामराज के चितेरे और राम चरित मानस क...
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अच्छी सरकार व समावेशी सरकार से इनका कोई सरोकार नहीं है । बादल आए बरसे नहीं तो उसके आने का औचित्य क्या है ? मुख्यमंत्री जी सैफई आए, स्वागत, आए थे तो सैफई का बंद पड़ा दूसरा ऑक्सिजन प्लांट चलवा देते,बेड़ों की संख्या बढ़वा देते । मुख्यमंत्री हैं कोई छोटे मोटे व्यक्ति तो है नहीं, हमारे नेता शिवपाल जी के पत्र और संघर्ष की घोषणा के बाद एक प्लांट चला था । राजदंड आपके हाथ में हैं, वे भ्रष्ट अधिकारी जिनके कारण जनता परेशान व शोषित है , त्राहिमाम व आर्तनाद कर रही है, उन अधिकारियों के विरुद्ध कार्यवाही कर देते , कार्यवाही नहीं कर सकते थे तो कार्यवाही का संकेत ही दे देते । आप समाजवाद पर कैसे नि...
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पंडित नेहरू ने स्वतंत्रता संग्राम में कूदने के बाद कभी सुखों की सेज पर नहीं सोए । लखनऊ जेल की दीवारें साक्षी है कि नेहरु जेल में अपने कपड़ों के साथ पिता की मोटी शेरवानी धोया करते है । जवानी जेल और आंदोलन में बिता दी । 1937 में कांग्रेस के अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने अपने उत्तराधिकारी के रूप में नेताजी सुभाषचंद्र बोस को चुना और 1936 में विदेश विभाग का प्रभारी लोहिया और मजदूर प्रकोष्ठ का मुखिया लोकनायक जयप्रकाश को बनाया । उन्होंने कभी रुतबे और रुपए के लिए वकालत नहीं की । रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक, चंद्रशेखर आजाद सदृश काकोरी के नायकों का मुकदमा लड़े, आजाद हिंद फौज के जवानों की वका...
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यह सर्वविदित तथ्य है कि प्रगतिशील समाजवादी पार्टी लोहिया के प्रमुख शिवपाल सिंह यादव अपने वय व कद के सभी नेताओं से अलग व विशिष्ट हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में दल बनाकर और लगातार सक्रियता से चलाकर उन्होंने साबित कर दिया कि उत्तर प्रदेश में उनकी वैयक्तिक पकड़ सर्वाधिक है। जन-मानस में श्री शिवपाल की जो पकड़ है वो किसी भी प्रांतीय नेता के मुकाबले अधिक है। इतने कम समय में प्रसपा को उन्होंने अपनी सांगठनिक क्षमता व भागीरथ प्रयासों से देश के सबसे बड़े सूबे उ.प्र. के गांव गांव तक पहुॅचा दिया। हर जिले में दल की सशक्त इकाइयाँ खडी कर दी। उ.प्र. के गत तीन आम चुनाव के परिणाम साक्षी हंै कि...
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Image करो या मरो (Do or die),"अंग्रेजों भारत छोड़ो "!1942 के निर्णायक आंदोलन की शुरुआत भले ही महात्मा के नेतृत्व में शुरू हुई मगर इस आंदोलन के प्रथम पंक्ति तो "कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी"ने ही अपने हाथों में लेकर अंतिम युद्ध लड़ना शुरू कर दिया । " यूसुफ मेहर अली का यलगार :-अंग्रेजों भारत छोड़ो " यह तो तय था कि अब नहीं तो कभी नहीं ,।रातों रात जब महात्मा और बाकी नरमपंथियों की गिरफ्तारी हो गयी। डॉ लोहिया बाहर रह गए थे । जयप्रकाश नारायण कुछ महीने पहले से ही जेल में कैद थे । लोहिया जी का संदेश कि आप बाहर निकलिये । संदेश पर जेल में बाहर निकलने की रणनीति तैयार होने लगी । श्री रामबृक्ष बेनीपुरी रण...
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