
इस सदी के सबसे बड़े वैश्विक योद्धा मदीबा नेल्सन मंडेला की आज जयंती है । मुझे दर्प है और होना भी चाहिए कि मैं चंद उन भारतीयों में एक हूँ जिनकी आँखों को मंडेला जी को देखने का पुनीत सौभाग्य मिला है और जिनके हाथों को मदीबा प्रिक्स अथवा मंडेला अवार्ड उठाने का गौरव प्राप्त है । वे इस सदी के लोहिया थे जिन्होंने गांधी के आंदोलन को आगे बढ़ाया । वे राष्ट्रपति थे, दोबारा बन सकते थे, सभी उनके नाम के दीवाने थे किंतु उन्होंने राष्ट्रपति बनने से मना कर दिया । वे किसी भी पद से बड़े थे । जब ट्यूनीशिया से आतंकवाद विरोधी मार्च के दौरान उनसे मिला और अपनी पुस्तक दी । पुस्तक के मुख पृष्ठ पर अंकित महात्मा गांधी और लोहिया की तस्वीरों को देखकर बोले मेरे आदर्श । उनमें जरा भी गुरुर नहीं था । वे न केवल कालों अपितु गोरों के भी प्रेरणा पुरुष थे । वीटो विरोधी अभियान की प्रेरणा मुझे मंडेला साहित्य से मिली और उस समय मुझे जब मंडेला के नाम पर घोषित सम्मान मिला, खुद को शब्दविहीन पा रहा था । मंडेला चाहते थे कि संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो का चलन समाप्त हो, हिंदी को आधिकारिक भाषा का दर्जा मिले और भारत सुरक्षा परिषद का सदस्य होकर तीसरी दुनिया की सशक्त आवाज बने । मंडेला की इन चाहतों को पूरा करने का लोक दायित्व हमें निभाना होगा ।