हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी के सूत्रधार शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और महान क्रांतिधर्मी समाजवादी चिन्तक डा0 राम मनोहर लोहिया के व्यक्तित्व, सोच, कार्य प्रणाली तथा जीवन दर्शन में कई समानतायें एवं सादृश्यतायें दृष्टिगत हैं। भगत सिंह के स्वप्न एवं डा0 लोहिया की अवधारणायें व्यापक दृष्टिकोण से देखने में एक ही रूप व रंग के प्रतीत होते हैं। दोनों का सैद्धान्तिक साध्य ऐसे समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना थी जिसमें कोई व्यक्ति किसी का भी शोषण न कर सके। कई घटनायें, व्यक्ति और प्रेरक तत्व ऐसे हैं जो दोनों के जीवन में उभयनिष्ठ हैं। इसे महज मणिकांचन संयोग नहीं कहा जा सकता कि जिस तिथि को नियति ने भगत सिंह को शहादत दी, उसी दिन डा0 राम मनोहर लोहिया का जन्म हुआ। दोनों अप्रतिम विभूतियों को एक तल के दो सागर कहना गलत न होगा। भगत सिंह ने समाजवादी आंदोलन को जहां छोड़ा, वही स्थान डा0 लोहिया के लिए प्रस्थान बिन्दु बना।
सर्वविदित है कि 23 मार्च को 1931 को 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह को सुखदेव व राजगुरु के साथ फांसी दी गई थी तो स्वर्णाक्षरों में अंकित करने योग्य इसी दिन 1910 में प्रातःकाल तमसा नदी के तट पर अकबरपुर में लोहिया का जन्म हुआ था। इनके पिता हीरालाल लोहिया और माता का नाम चन्दा था। भगत सिंह और डा0 लोहिया में मात्र 3 साल का अंतर था। एक ही काल-खण्ड में पैदा होने और समवय व समान भावभूमि होने के कारण मनोवृत्तिगत समानता होना स्वाभाविक है। देश-भक्ति और त्याग दोनों को विरासत में मिली। लोहिया के पिता जहां प्रतिबद्ध गांधीवादी और सत्याग्रही थे, वहीं भगत सिंह के पिता किशन सिंह पंजाब के प्रमुख आंदोलनकारियों में अग्रगण्य थे। जब भगत सिंह 27 सितम्बर 1807 को बंगा, लायलपुर में पैदा हुए, उनके पिता जेल में थे। 1945 में जब डा0 लोहिया आगरा में बंदी थे उनके पिता की मृत्यु का दुःखद समाचार प्राप्त हुआ। दोनों अपने पिता की अंत्येष्टि में शामिल नहीं हो पाये। एक फांसी पर चढ़ चुका था और एक कारागार में था।
डा0 लोहिया तमाम आग्रहों के बावजूद अपना जन्म दिवस भगत सिंह का शहादत दिवस होने के कारण नहीं मनाते थे, इससे पता चलता है कि भगत सिंह के प्रति लोहिया के मन में अथाह व अनिर्वचनीय सम्मान था। बहुत कम लोग जानते हैं कि राम मनोहर लोहिया को प्रथम बार अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रियता जिस घटनाक्रम के कारण मिली, उसके मूल में शहीद-ए-आजम भगत सिंह ही थे। 1931 में भगत सिंह को फांसी देने की खबर डा0 लोहिया को जर्मनी में मिली। वे वहां उच्च शिक्षा ग्रहण कर रहे थे। भगत सिंह के बलिदान से लोहिया का अंतस् ब्रिटानिया हुकूमत के प्रति आक्रोश की भावना से पूरी तरह भर चुका था। 1931 में ही लीग आफ नेशन्स के अधिवेशन के दौरान डा0 लोहिया ने भारत में हो रहे अंग्रेजी सरकार के दमन चक्र और भगत सिंह को दी गई फांसी के बाद हुकूमत के खिलाफ बने माहौल और क्रोध से दुनिया के प्रतिनिधियों को अवगत कराने का निर्णय लिया। एक सामान्य विद्यार्थी के लिए लीग आफ नेशन्स के सभागार में पहुंचना आसान कार्य नहीं था। डा0 लोहिया ने किसी तरह अभिन्न मित्र व सहपाठी गोवा के मूल निवासी जूलियो मेनेजिस और अपने लिए दो पास की व्यवस्था कर ली। जैसे ही गुलाम भारत का प्रतिनिधित्व कर रहे बीकानेर के महाराज गंगा सिंह ने ब्रिटानिया सल्तनत की कसीदागोई शुरू की, दर्शक दीर्घा में बैठे लोहिया विलक्षण ‘‘कुहूक’’ के साथ सीटी बजाने लगे। इस अनापेक्षित एवं आकस्मिक घटनाक्रम पर सभा के अध्यक्ष रूमानिया के टिटेलेस्क्यू समेत सभी हतप्रभ थे। लोहिया और मेनेजिस को सभागृह निकालने का आदेश दिया गया, किन्तु जाते-जाते डा0 लोहिया बीकानेर के महाराज के झूठ को बेपर्दा करने में सफल रहे। दूसरे दिन डा0 लोहिया ने लीग आफ नेशंस के अध्यक्ष नाम तक खुला पत्र (जिसमें धारासणा में किये गये अत्याचार और भगत सिंह को दी गई फांसी का विस्तृत विवरण था) लिखा। साम्राज्यवादी ताकतों का कच्चा चिट्ठा छापने का साहस सिर्फ लू-त्रावे-ह्यूमेनाइट नाम के एक अखबार ने किया। इस अखबार की अनेकानेक प्रतियां खरीद कर लोहिया ने सभी प्रतिनिधियों का अध्ययनार्थ बांटा। यह घटना भगत सिंह द्वारा असेम्बली में फेंके गये बम और वितरित किये गये पर्चे जैसी ही थी। दोनों से एक सी मेधा, सोच और कार्यप्रणाली परिलक्षित होती है। इस घटना से यूरोप और एशिया के राजनीतिक कार्यकर्ताओं तथा क्रांतिकारियों में डा0 लोहिया की एक अलग व विशिष्ट पहचान बनी। देखते ही देखते कट्टर साम्राज्यवाद विरोधी सोच के कारण लोहिया, भगत सिंह की तरह समाजवादियों और देशभक्तों के चहेते बन गये।
इतिहास साक्षी है कि भारत में प्रथम प्रभावशाली समाजवादी संगठन के निर्माण का श्रेय भगत सिंह को जाता है। शचीन्द्रनाथ सान्याल ने 1923 के अंत में हिन्दुस्तान प्रजातंत्र संघ (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसियेशन) की स्थापना की, जिसका लक्ष्य क्रांति द्वारा भारत को आजाद कराकर संयुक्त राज्यों का एक संघीय गणराज्य बनाना था। इसका संविधान पीले रंग के पर्चे पर छपवाकर जनवरी 1925 में पूरे उत्तर भारत में बांटा गया था। दो साल के भीतर ही चन्द्रशेखर आजाद और कुन्दन लाल गुप्ता को छोड़कर पार्टी के सभी प्रमुख नेता काकोरी कांड के सिलसिले में जेल में बंद कर दिये। दूसरी पंक्ति के नेताओं के साथ मिलकर भगत सिंह ने दस प्रतिनिधियों की उपस्थिति में 8 सितम्बर 1928 को हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसियेशन बनाया जिसका लक्ष्य स्वतंत्रता के बाद समाजवाद की प्रतिस्थापना थी। स्थापना हेतु बुलाई गई बैठक में । भगत सिंह ने निम्न प्रस्ताव रखे - (क) समय आ गया है कि हम समाजवाद को साहस के साथ अपना अंतिम लक्ष्य घोषित करें (ख) पार्टी का नाम तदनुसार बदला जाना चाहिए ताकि लोग जान सकें कि अंतिम लक्ष्य क्या है? (ग) हमें सिर्फ उन्हीं कामों को हाथ में लेना चाहिए जिनका सीधा सम्बन्ध जनता की जरूरतों और भावनाओं से हो सकता है और हमें मामूली पुलिसकर्मियों अथवा भेदियों को मारने में अपनी शक्ति और समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। (घ) धन के लिए हमें सरकारी खजाने पर ही हाथ डालना चाहिए (ङ) सामूहिक नेतृत्व के सिद्धान्त का कड़ाई से पालन करना चाहिए। फणीन्द्रनाथ घोष एवं मनमोहन बनर्जी जैसे नामचीन क्रांतिकारियों के विरोध के बावजूद भगत सिंह ने न केवल समाजवाद को अंतिम लक्ष्य घोषित किया अपितु संगठन के नाम में समाजवादी शब्द भी जोड़ा ताकि किसी प्रकार का भ्रम न रहे। भारत में इसके पहले राष्ट्रीय स्तर के किसी प्रभावशाली संगठन के पहले ‘समाजवादी’ शब्द नहीं मिलता। यहां उल्लेख करना समीचीन होगा कि आजादी के बाद प्रथम विशुद्ध समाजवादी दल की स्थापना डा0 राममनोहर लोहिया ने आचार्य नरेन्द्र देव के नेतृत्व में लोकनायक जयप्रकाश नारायण एवं अन्य प्रतिबद्ध समाजवादियों के सहयोग से किया था।
भगत सिंह के इन प्रस्तावों के सारतत्व को डा0 राम मनोहर लोहिया ने विभिन्न अवसरों पर अपने जीवन में पूर्णतया लागू किया। आजादी की लड़ाई के दौरान माना जाता है कि कलकत्ता में मानिकतल्ला डाकखाना की लूट के प्रेरक-पुरुष डा0 लोहिया ही थे। लोहिया ने ‘कांचनमुक्ति’ में भारत की समग्र राजनीति का अंतिम लक्ष्य समानता, अहिंसा, विकेन्द्रीकरण, लोकतंत्र के पश्चात् समाजवाद को ही निरूपित किया है। लोहिया ने ‘विकेन्द्रीकरण’ की खुली पैरवी कर भगत के ‘सामूहिक नेतृत्व’ की अवधारणा को मजबूत किया। लोहिया की दो छोटी किताबें ‘जंगजू आगे बढें’ और ‘क्रांति की तैयारी करो’ जो अगस्त 1942 में उन्होंने भूमिगत रहते हुए लिखा था, इसमें उन्होंने जनता के बीच जाकर नये-नये प्रतिकार पैदा करने और सामुदायिक कृति के लिए संगठन बनाने को प्रमुख कार्य माना है। ‘‘आजाद राज कैसे बने’’ में उन्होंने प्रभावशाली और सफल क्रांति के लिए सामुदायिक नेतृत्व को अपरिहार्य माना है। संयुक्त प्रान्त के साथियों को सम्बोधित करते हुए उन्होंने लिखा है, ‘‘मैं दावे से कहता हूं कि अगर हर जिले में सौ मजबूत और तैनात आदमी हों और उनको इस तरह संगठित किया जाए कि सारे सूबे में एक साथ कुछ हो सके, तो हम फिर से एक जबरदस्त और सफल क्रांति कर सकते हैं।’’
डा0 लोहिया और भगत सिंह कला, साहित्य दर्शन और अभिनय में भी पारंगत थे यद्यपि उनके गंभीर किरदारों ने इन रूपों को दबा दिया। साण्डर्स को मारने के बाद भगत सिंह सूट-बूट और टाई पहन कर एक अधिकारी का भेष धारण कर लाहौर से निकले थे। भूमिगत जीवन में डा0 लोहिया भी विशुद्ध अंग्रेजी लिबास में कोलकाता के सेन्ट्रल एवेन्यू में एक छमंजिली इमारत के तीसरे तल्ले पर रहते थे। भगत सिंह और लोहिया ने अलग-अलग समय में अंग्रेजी पुलिस को खूब छकाया और गिरफ्तारी के दौरान असहनीय यातना सहते रहे पर झुके नहीं। लाहौर में भगत सिंह भी बंद थे और लोहिया भी, दोनों को प्रताड़ित करने वाले जेलकर्मी और अफसर कमोबेश एक ही थे।
1928 से 1931 तक भगत सिंह और उनके साथियों की टोली ब्रिटानिया पुलिस के लिए सबसे बड़े सरदर्द थे। इनके पर्चे, भाषण, घोषणा पत्र आदि क्रांति की ‘‘मशाल’’ को ‘‘लौ’’ प्रदान किया करते थे। 1940 से लेकर 1944 तक लोहिया और उनके साथियों द्वारा गठित आजाद दस्ते ने भूमिगत रहते हुए आजादी की लड़ाई को प्रखरता प्रदान की। लोहिया ने यह हरावल दस्ता गोरिल्लावार छापामार लडाई के लिए बनाया था। गुप्त रेडियो व अन्य माध्यमों में इसने जिस तरह से क्रांति की अलख जगाई, लगा मानो भगत सिंह व उनके साथियों का दौर पुनः आ गया, किन्तु 20 मई 1944 को लोहिया की गिरफ्तारी के बाद आजाद दस्ता पूर्णतया बिखर गया, जैसे चन्द्रशेखर आजाद और भगत सिंह की शहादत के बाद हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसियेशन बिखरा था। मैक्स हरकोर्ट ने वायसराय की रिर्पोटों के आधार पर शोध किया और इस निष्कर्ष है कि 1942 के आन्दोलन की सफलता और प्रभाव के पीछे लोहिया तथा जय प्रकाश के नेतृत्व वाली कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी थी। लोहिया व भगत सिंह दोनों अध्ययनशील और प्रारम्भ से ही अन्वेषक प्रवृत्ति के थे। दोनों ने अनथक एवं अनवरत अध्ययन-चिन्तन-मनन से अपनी अद्भुत तर्कक्षमता विकसित की। लाहौर के पुस्तकालयाध्यक्ष राजाराम शास्त्री के अनुसार भगत सिंह किताबों को निगला करते थे। घर से भागकर कानपुर आने के बाद एक पत्रकार के रूप में गणेश शंकर विद्यार्थी के अखबार ‘‘प्रताप’’ में काम करने से लेकर गिरफ्तारी देने के पहले तक दिल्ली से प्रकाशित होने वाले ‘महारथी’ व इंद्र वाचस्पति के ‘अर्जुन’ इलाहाबाद की पत्रिका ‘चांद’, ‘मतवाला’, लाहौर के ‘पीपुल्स’ समेत कई पत्र पत्रिकाओं से भगत सिंह का जुड़ाव रहा। वे कई छद्म नामों से लिखते रहे। उन्होंने ‘अकाली’ व ‘कीर्ति’ का भी संपादन किया। कामरेड साहेब सिंह जोश के संपादन में निकलने वाली ‘किरती’ पत्रिका में वे ‘विद्रोही’ के नाम से लिखा करते थे। उनका एक उपनाम बलवंत भी था। जर्मनी से डाक्टरेट की उपाधि लेकर आने के बाद लोहिया ने पहला लेख मद्रास से प्रकाशित ‘हिन्दू’ में लिखा। 1934 में उन्होंने कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के साप्ताहिक मुख पत्र ‘‘कांग्रेस सोशलिस्ट’’ का सम्पादन किया। इसका प्रकाशन केन्द्र कलकत्ता था। आजादी के उपरान्त ‘जन’, ‘मैनकाइंड’, ‘चैखम्भा राज’, जैसी पत्रिकाओं के संचालन और प्रकाशन में लोहिया की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस प्रकार भगत सिंह और लोहिया अपने दौर की समसामयिक पत्रकारिता से जुड़े रहे तथा सहाफत को जनजागरण एवं विचारों के प्रचार-प्रसार का माध्यम बनाया। भगत सिंह ने पत्र-पत्रिकाओं में लेखन के अलावा ‘आत्मकथा’, ‘समाजवाद का आदर्श’, ‘भारत में क्रांतिकारी आंदोलन का इतिहास’ तथा ‘मृत्यु के द्वार पर’ शीर्षक से किताबें लिखीं थीं। उन्हें जेल में काफी संघर्ष के बाद सितम्बर 1929 में पढ़ने लिखने की सुविधा मिली। उसके बाद उन्होंने ज्यादातर समय गहन चिंतन, अध्ययन व लेखन में लगाया। 17 जून 1929 को भूख हड़ताल की नोटिस में भगत सिंह ने पंजाब के इंस्पेक्टर जनरल से प्रत्येक प्रकार के साहित्य की मांग की थी। 24 जुलाई, 1930 को उन्होंने जयदेव को लाहौर सेन्ट्रल जेल से पत्र भेजकर मैटीरियेलिज्म (कार्ल लीब्नेखत) व्हाईमैन फाइट (बर्टेण्ड रसेल), सिविल बार इन फ्रांस (माक्र्स) लैण्ड रिवोल्यूशन इन एशिया, स्पाई (अप्टन सिंक्लेयर), थ्योरी आफ हिस्टोरिकल मैटीरियलज्म (बुखारिन) समेत कई किताबों को भेजवाने का आग्रह किया। वे विक्टर ह्यूगो, हालकेन, टालस्टाय, जार्ज बर्नाड शा, डिकेन्स को खूब पढ़ते थे। डा0 राम मनोहर लोहिया का अप्टन सिंक्लेयर के प्रति आकर्षण जगजाहिर है, जिसे उन्होंने जुलाई 1951 में आयडल वाईल्ड हवाई अड्डे पर पहुंचने के बाद अमरीकी संवाददाताओं से बातचीत करते हुए स्वीकारा था। जार्ज बर्नार्ड शॉ ने ‘‘इकोनोमिक बेसिस ऑफ सोशलिज्म’’ में जिन आर्थिक विचारों की पुरजोर पैरवी की है। डा0 लोहिया की अर्थनीति भी उन्हीं उपागमों एवं प्रस्थापनाओं की सिफारिश करती है। भगत सिंह की तरह लोहिया के विचारों को भी नया आयाम दिलाने में जेल की भूमिका महत्वपूर्ण रही है। ‘इकोनोमिक्स आफ्टर माक्र्स’ लोहिया 1943 में आगरा जेल में ही लिखा था जिसमें माक्र्स के आर्थिक चिंतन का परीक्षण किया गया है। लोहिया के विचार फेवियन सोशलिज्म के महान व्याख्याता बर्टेड रसेल के निष्कर्षों से मिलते-जुलते हैं। सबको पता है कि ‘‘माक्र्स’’, ‘लेनिन’ ‘बर्टेड रसैल’ और ‘जे0बी0 शॉ’ को भगत बड़े मन से पढ़ा करते थे। फांसी के वक्त वे लेनिन को ही पढ़ रहे थे।
भगत सिंह को गंगा से उतना ही प्रेम था, जितना लोहिया को। शिव वर्मा ने लिखा है कि पढ़ाई लिखाई से भगत सिंह की तबियत जब ऊबती थी तो वे छात्रावास के पीछे बहने वाली गंगा नदी के किनारे जाकर बैठ जाते थे। लोहिया ने भी बहुत सा समय चित्रकूट, प्रयाग व हरिद्वार में गंगा के किनारे व्यतीत किया है। उन्होंने ‘राम कृष्ण-शिव’ शीर्षक से प्रकाशित मैनकाइंड के अगस्त (1956) के अंक में गंगा के प्रति अपनी सोच को रेखांकित करते हुए लिखा है कि ‘‘गंगा का नाम गम् धातु से बना है जिससे ‘‘गम-गम’’ संगीत बनता है, जिसकी ध्वनि सितार की थिरकन के समान मधुर है।’’ लोहिया, नदियों खास कर गंगा को साफ करने के लिए कार्यक्रम चलाने के पक्षधर रहे हैं। 23 फरवरी 1948 में वाराणसी में उनका वक्तव्य नदियों की सफाई पर ही केन्द्रित था।
दोनों नौकरशाही और पुलिस व्यवस्था के घनघोर विरोधी थे। भगत सिंह ने किरती में (जून 1928) में प्रकाशित लेख में गरीबी और गुलामी के लिए पूंजीवादी नौकरशाही को जिम्मेदार ठहराते हुए इनके झांसे के प्रति सावधान रहने की सलाह दी थी। लोहिया की चली होती तो कलक्टर संस्था ही समाप्त हो चुकी होती। वे नौकरशाही से अपने को दूर ही रखते थे। भगत सिंह की तरह डा0 लोहिया भी रसगुल्ला के शौकीन थे। भगत सिंह ने 24 फरवरी 1930 को जयदेव को पत्र लिखकर ‘क्रेवन-ए’ सिगरेट का टिन और रसगुल्ला भेजने का आग्रह किया था और बिना किसी संकोच के स्वीकारा कि सिगरेट के बिना दल की हालत खराब है। एक बार अदालत में से भगत सिंह ने पुलिस कर्मियों द्वारा रसगुल्ला फेंके जाने की शिकायत की। जज द्वारा झल्लाकर पूछने पर कि आपके लिए रसगुल्ला ज्यादा जरूरी है या मुकदमा। भगत सिंह ने रसगुल्ले को अधिक महत्वपूर्ण बताया था। डा0 लोहिया 999 मार्का सिगरेट खूब पीते थे और जब भी कलकत्ता में होते, फुचका और रसगुल्ला की दुकानों पर पहुंच जाते थे।
भगत सिंह की तरह डा0 लोहिया ने भी महात्मा गांधी के प्रति अगाध श्रद्धा व सम्मान के बावजूद वैचारिक मतभेदों को छिपाया नहीं। बापू की सोच और कार्यक्रम को जगजाहिर करने वाले लेख पर खुलकर प्रतिक्रिया की। डा0 राम मनोहर लोहिया कौंसिल में भारतीयों के प्रवेश के विरोधी थे। उन्होंने गांधी जी के रचनात्मक कार्यक्रमों की भी कटु आलोचना करते हुए कांग्रेस सोशलिस्ट में लिखा कि भारत के कंधे पर रखे विदेशी शासन के जुए को हटाने का काम इतना बड़ा है कि छोटे-मोटे सुधार के काम उससे मेल नहीं खाते। लोहिया ने यह लेख बापू को अध्ययनार्थ भेजा। महात्मा गांधी का प्रत्युत्तर आया कि ‘उन्हें उत्तर की आशा नहीं करना चाहिए क्योंकि उन्हें अपने विरोधी का दृष्टिकोण समझने का धैर्य नहीं है।’ डा0 लोहिया को महात्मा गांधी से ऐसे पत्र की उम्मीद नहीं थी। सुभाष चन्द्र बोस, जिन्ना और पंडित जवाहर लाल नेहरू के प्रति महात्मा गांधी के रवैये से भी लोहिया स्वयं को असहज पाते थे। मौलाना अबुल कलाम आजाद की पुस्तक ‘‘इण्डिया विन्स फ्रीडम’’ की समीक्षा लिखते हुए उन्होंने एक पुस्तक ‘‘भारत विभाजन के अपराधी’’ लिखी है, जिसमें अपनी असहजता व असहमति को सार्वजनिक रूप से स्वीकारा है। गांधी-वायसराय की भेंट की खबर ने भी लोहिया को मर्माहत किया था। लोहिया ने बापू से मिलकर अपने क्रोध और आक्रोश से अवगत कराया। गांधी जी ने लोहिया के क्रोध को काफी हद तक उचित माना। लोहिया का मत था कि येन-केन-प्रकारेण देश की आजादी हासिल की जाय। 1 जून 1940 में ‘हरिजन’ के अंक में लोहिया ने ‘सत्याग्रह तुरंत’ शीर्षक से लेख लिखा हालांकि गांधी ने इसी अंक में ‘सत्याग्रह अभी नहीं’ लिखकर अपना पक्ष स्पष्ट किया। सात जून 1940 को डा0 लोहिया को मई में दौलतपुर (जिला सुल्तानपुर) में दिये गये भाषण के लिए गिरफ्तार किया गया। इस भाषण में उन्होंने शोषण, गुलामी और ब्रिटानिया हुकूमत की गवर्नरी निरंकुशता के खिलाफ जमकर बोला था। इसके पहले लोहिया की प्रथम गिरफ्तारी 24 मई 1939 को कलकत्ता में हुई थी। इस गिरफ्तारी का कारण भी। अंग्रेजी सरकार को दी गई खुली चुनौती थी। इस मुकदमे की पैरवी लोहिया ने भगत सिंह की तरह खुद ही की थी। राजनीतिक मुकदमों की पैरवी सिद्धान्तों तथा दर्शन के आधार पर करने की प्रणाली भगत सिंह व लोहिया ने विकसित की। भगत सिंह और डा0 लोहिया ने गिरफ्तारी के बाद अदालती बहस को ही वैचारिक क्रांति का आधार बनाया। दोनों की बहसें समाजवादी आंदोलन की ऐसी धरोहर हैं। जिनसे आने वाली पीढ़ी युग-युग तक रोशनी लेती रहेगी, तात्कालिक होने के बावजूद उनमें कालातीत दर्शन के पुट है।
दोनों अविवाहित, अपरिग्रही व फक्कड़ रहे। भगत सिंह शादी की चर्चा प्रारम्भ होने पर घर से भाग कर कानपुर चले गये। इसी तरह लोहिया को जब पता चला कि सेठ जमना लाल बजाज उन्हें अपना दामाद बनाना चाहते हैं तो वे बनारस छोड़कर कलकत्ता आ गये। स्वतंत्रता और समाजवाद के लिए दोनों ने घर नहीं बसाया। इसका यह अर्थ कदापि नहीं कि दोनों का मन प्रेम और नारी के प्रति निष्ठुर था। दोनों कवि हृदय और भावप्रवण व्यक्ति थे। भगत सिंह को नाटकों का शौक था। उपन्यासों का अध्ययन, कहानियों, किंवदन्तियों का सुनना और उनका सदुपयोग करने की कला में दोनों पारंगत थे।
विक्टर ह्यूगो के नाटक ‘नाइण्टी थ्री’ में वर्णित पात्र सिमरडिन के आत्महत्या करने के प्रसंग पर भगत सिंह और सुखदेव का मतभेद उनके साथियों को पता था। भगत सिंह अक्सर गजलें गुनगुनाया करते थे। ‘‘वे सूरते इलाही किस देश बसतियाँ हैं, जिनको निहारने को आंखे तरसितयां है’’ उनकी सबसे पसन्दीदा पंक्ति थी। नेशनल कालेज में पढ़ते समय एक सुन्दर लड़की को भगत सिंह से प्रेम हो। गया था। उन्हीं के कारण वह भी क्रांतिकारी दल में शामिल हो गई थी। जब असेम्बली में बम फेंकने की जिम्मेदारी देने की बात आई तो दल के नेता चन्द्रशेखर आजाद ने भगत सिंह को यह जिम्मेदारी न देने का निर्णय लिया। आजाद के अनुसार दल को भगत सिंह की अभी बहुत जरूरत थी। सुखदेव ने भगत सिंह पर तंज कसा कि वे उस लड़की के कारण बम फेंकने नहीं जा रहे हैं। भगत सिंह इस आरोप पर काफी दुःखी हुए। भगत सिंह ने दबाव बनाकर दुबारा मीटिंग बुलवाई और शिव वर्मा तथा जयदेव कपूर की जगह बटुकेश्वर दत्त एवं अपना चयन करवाया। भगत सिंह ने सुखदेव के नारी व प्रेम पर केन्द्रित पत्र लिखा जो असेम्बली बम धमाके के तीन दिन बाद 11 अप्रैल 1929 को सुखदेव की गिरफ्तारी के समय प्रकाश में आया। इस पत्र में भगत सिंह ने प्रेम को मानव चरित्र को ऊंचा करने वाली अवधारणा बताया। भगत सिंह के अनुसार प्रेम पशुवृत्ति नहीं बल्कि मधुर मानवीय मान्यता है। डा0 लोहिया सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के सबसे पड़े पैरोकार माने जाते हैं। वे राजनीति और अन्य रचनात्मक गतिविधियों में स्त्रियों की भागीदारी को लोकतंत्र के लिए सुखद और शुभ संकेत मानते थे। वे नारी विहीन सार्वजनिक कार्यक्रमों को ‘वधू विहीन विवाह समारोह’ की संज्ञा देते थे। ‘सप्तक्रांति’ में उन्होंने नर-नारी समानता को पहला सूत्र बताया है। वे नारी को पंचम वर्ण कहा करते थे तथा ऐसे समाज का स्वप्न देखा करते थे जिसमें, लिंगगत विभेद और शोषण नाम मात्र भी न हो। उन्होंने ‘रामराज्य’ की जगह ‘सीतारामराज्य’ की परिकल्पना की। व्यक्तिगत जीवन में भी प्रो0 रमा मित्रा, पूर्णिमा बनर्जी, कमला चटोपाध्याय, अरुणा आसफ अली, महादेवी वर्मा, ग्रेटा गार्बो जैसी ख्यातिलब्ध महिलाओं के प्रति उनके लगाव से सभी अवगत हैं। डा0 लोहिया भी स्त्री-पुरुष के प्रेम को एक स्वाभाविक मनोवृत्ति मानते थे। युवावस्था में उन्होंने एम्मायर में अंग्रेजी सिनेमा तथा मदन थियेटर्स व ‘‘एलिफिन्सटन’’ में नाटकों लुत्फ खूब उठाया।
दोनों महान चिंतक और दार्शनिक थे। यदि उनके दर्शन एवं वैचारिकी में साम्य बिन्दुओं को तलाश कर पंक्तिबद्ध किया जाये तो कई ग्रंथ भी कम पड़ेंगे। जिस वैचारिक क्रांति व समाजवादी समाज की बात भगत सिंह किया करते थे, उन्हें डा0 राम मनोहर लोहिया ने न केवल सूत्रवत किया अपितु अमली जामा पहनाने में भी लगे रहे। भगत सिंह के बाद डा0 राम मनोहर लोहिया ने ही आजादी के बाद समाजवादी आंदोलन को जिंदा व जीवन्त बनाये रखा। 1948 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नाम के पहले कांग्रेस शब्द हटाने पर सर्वाधिक जोर लोहिया ने दिया था। वे जीवनपर्यन्त भगत सिंह की तरह शोषण विहीन समाजवादी समाज की स्थापना के लिए संघर्ष करते रहे।
भगत सिंह की तरफ डा0 लोहिया भी धार्मिक पाखण्डों एवं कुरीतियों के खिलाफ थे। ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ, भगत सिंह का एक नव प्रवर्तनकारी लेख 27 सितम्बर 1931 में लाहौर से निकलने वाली पत्रिका ‘दि पीपुल’ में प्रकाशित हुआ था। इसमें भगत सिंह ने धर्म को मानवीय कमजोरी बताया है। भगत सिंह के ही शब्दों में, ‘‘मैं आपको बता दें, अंग्रेजों का शासन यहां इसलिए नहीं है कि ईश्वर की इच्छा है, बल्कि इसलिये है कि उनके पास ताकत है, हम उनका विरोध नहीं करते। वे ईश्वर की सहायता से नहीं बल्कि तोपों, बन्दूकों, बमों और गोलियों, पुलिस और फौज तथा हमारी उदासीनता की सहायता से हमें गुलाम बनाये हुए हैं और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का निर्लज्ज शोषण करने का सबसे घृणित पाप समाज के विरुद्ध सफलतापूर्वक करते चले आ रहे हैं ईश्वर कहां है? वह क्या कर रहा है ? क्या वह मानवजाति के इन सब दुखों और तकलीफों का मजा ले रहा? तब तो वह नीरो है, चंगेज खाँ है, उसका विनाश हो।’ इसी तरह डा0 लोहिया ने शम्बूक बंध के लिए मर्यादा पुरुषोत्तम मानते हुए भी राम की आलोचना की। लोहिया के लिए धर्म दीर्घकालीन राजनीति और राजनीति अल्पकालीन धर्म रही है। वे भी पुर्नजन्म और अन्य पाखण्डों का मजाक उड़ाया करते थे, लेकिन लोक-जागरण के लिए धार्मिक तथा पौराणिक किरदारों का उपयोग भगत सिंह की तरह लोहिया ने भी अपने भाषणों और लेखों में खूब किया है। नवम्बर 1924 में मतवाला में प्रकाशित एक लेख में भगत सिंह ने भारत माता को देवी दुर्गा बताते हुये लिखा है कि ‘तेरी माता, तेरी प्रातः स्मरणीया, तेरी वन्दनीया, तेरी जगदम्बा, तेरी अन्नपूर्णा, तेरी सिंहवाहिनी, तेरी शस्यश्यामलांचला आज फूट-फूट कर रो रही है। क्या उसकी विकलता तुझे तनिक भी चंचल नहीं करती ? यह लेख उनके छद्मनाम बलवंत के नाम से छपा था। वे जानते थे कि धार्मिक किरदारों का लोक मानस पर क्या प्रभाव है। यही नहीं, रंगभेद के विरुद्ध और विश्वप्रेम को रेखांकित करने वाले एक लेख में राम और कृष्ण को उन्होंने विश्वबंधुत्व का प्रतीक बताया। डा0 राम मनोहर लोहिया ने भी राम, कृष्ण और शिव और इनसे जुड़ी किंवदंतियों तथा कथानकों के माध्यम से आदर्श समाज के नव निर्माण के लिए आधारभूत तर्कों की व्याख्या की।
रंगभेद के विरुद्ध डा0 लोहिया ने मई 1964 में अमरीका में ही सत्याग्रह किया। लोहिया की गिरफ्तारी भी हुई। संयुक्त राष्ट्र संघ में अमरीकी प्रतिनिधि स्टीवेंशन को खेद प्रकट करना पड़ा था। वर्ण एवं नस्लभेद के खिलाफ लोहिया के संघर्ष की पृष्ठभूमि में वही सोच है। जो भगत सिंह के लेख ‘‘विश्वप्रेम’’ में प्रतिबिम्बित होता है, जिसमें भगत सिंह ने ऐसे अमरीकी समाज का स्वप्न देखा था, जहां काले। लोगों को कोई जला नहीं सकेगा। इसी लेख में भगत सिंह ने लिखा। है कि जब तक ‘‘काला-गोरा’’ का ‘‘सभ्य-असभ्य’’ ‘‘शासक-शासित’’, ‘‘धनी-निर्धन’’, ‘‘छूत-अछूत’’ आदि शब्दों का प्रयोग होता रहेगा, विश्वबंधुत्व और विश्वप्रेम बेमानी रहेगी। विभेद की इन्हीं दीवारों को गिराने तथा मानसिक खाई को पाटने के लिए लोहिया सदैव संघर्षरत रहे। वे एक ऐसी दुनिया के स्वप्नदृष्टा थे जिसमें पासपोर्ट की। आवश्यकता न हो उन्मुक्त आवागमन हो।
भाषा के मामले में भी लोहिया और भगत सिंह की सोच एक जैसी थी। भाषा और लिपि के संदर्भ में भगत के विचार का पता 28 फरवरी 1933 में हिन्दी सन्देश में प्रकाशित उस लेख से चलता है। जिसे उन्होंने 1924 में लिखा था। इसमें उन्होंने पंजाबी लिपि पर गहरा शोध करते हुए साफ-साफ शब्दों में लिखा है कि एक राष्ट्र के लिए एक भाषा का होना आवश्यक है। भगत सिंह के अनुसार समस्त देश में एक भाषा, एक लिपि, एक साहित्य, एक आदर्श और एक राष्ट्र बनाना पड़ेगा, परन्तु समस्त एकताओं से पहले एक भाषा होना जरूरी है ताकि हम एक दूसरे को भलीभांति समझ सकें। उन्होंने पंजाबी और मद्रासी के बीच संवाद के लिए अंग्रेजी की जगह हिन्दी को बेहतर माना। डा0 लोहिया 1956 में मैनकाइंड में भाषा, लिपि और भाषा नीति पर कई लेख लिखे। 50-60 के दशक में डा0 लोहिया ने हिन्दी को राष्ट्र भाषा का वास्तविक सम्मान दिलाने और भारतीय भाषाओं को मजबूत करने के लिए राष्ट्रव्यापी अभियान चलाया। ‘‘फिर से देश गुलाम न होगा, अंग्रेजी में काम न होगा’’, ‘‘डा0 लोहिया की अभिलाषा-चले देश में देशी भाषा’’ से पूरा भारत गूंज उठा। हिन्दी के प्रचार में जब लोहिया मद्रास पहुंचे तो उन पर पथराव भी हुआ, लेकिन लोहिया अजातशत्रु की तरह अडिग रहे। भाषा आधारित शोषण के खिलाफ लोहिया का वक्तव्यों में भगत सिंह का दर्द झलकता है।
मानसिक तथा आर्थिक गुलामी पर भी डा0 लोहिया और भगत सिंह के विचार कहीं न कहीं एक दूसरे के पूरक प्रतीक होते हैं। भगत सिंह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादे गये भेदभाव को दुनिया के उथल पुथल का सबसे बड़ा कारण मानते हुए अन्याय पर आधारित व्यवस्था में आमूल-चूल परिवर्तन के हिमायती थे, आजादी के बाद डा0 लोहिया इसी कार्य में लगे रहे।
भगत सिंह की तरह डा0 लोहिया ने भी अपना युवावस्था देश की आजादी की प्राप्ति के लिए होम पर दिया और तो वे आजादी के बाद भी समाजवादी व्यवस्था और सोच को धरती पर उतारने में लगे। रहे। वे गुलाम भारत में जितनी बार गिरफ्तार हुये उससे अधिक स्वतंत्रता के बाद भी हुये। उन्हें चार बार ब्रिटानिया हुकूमत, एक बार पुर्तगाली सरकार और बारह बार भारत की कांग्रेसी सरकार ने बंदी बनाया। लेकिन भगत सिंह और लोहिया के विचारों के आगे सरकारी बंदीग हों की प्राचीरें बौनी साबित हुईं। फांसी के एक दिन पूर्व साथियों के नाम भगत सिंह ने अपने अंतिम पत्र में लिखा था कि उनकी शहादत के बाद देश की आजादी के लिए कुर्बानी देने वालों की तादाद इतनी बढ़ जोयेगी कि क्रांति को रोकना साम्राज्यवाद या । तमाम शक्तियों के बूते की बात नहीं होगी। हुआ भी वही, जो भगत सिंह ने कहा था। शहादत के सत्रह साल के भीतर देश को आजादी मिल गई। साम्राज्यवादी ताकतों को घुटने टेंकना पड़ा। डा0 राम मनोहर लोहिया ने ठीक ही कहा कि आप अपने समकालीनों से कहीं ऊंचा भगत अपने समय से आगे थे। उन्होंने भारत भविष्य की परिकल्पना शताब्दी पूर्व कर ली थी।
डा0 लोहिया औपनिवेशिक आजादी के बाद आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक आजादी (जिसे भगत सिंह ‘असली आजादी’ कहा करते थे) के लिए अभियान चलाते रहे। लोहिया के अनुसार जब विपन्नता और अमीरी-गरीबी की गहरी खाई देश में रहेगी, आजादी बेमानी है। भगत सिंह के शब्दों में, ‘‘आजादी के मायने यह नहीं होता कि सत्ता गोरे हाथों से काले हाथों में आ जाए, यह तो सत्ता का हस्तांतरण हुआ। असली आजादी तो तब होगी जब वह आदमी जो अनाज बोता है, भूखा नहीं सोयेगा, वह आदमी जो कपड़े बुनता है, स्वयं नंगा नहीं रहेगा, वो आदमी जो मकान बनाता है, खुद बेघर नहीं रहेगा।’’ भगत सिंह व्यवस्था परिवर्तन चाहते थे जिसके सबसे बड़े हामी आजाद भारत में डा0 राम मनोहर लोहिया माने जाते हैं। भगत सिंह आम शिक्षा के प्रबल पैरोकार थे, जिसे डा0 लोहिया ने अपने आन्दोलनों का मुख्य मुद्दा बनाया। लोहिया की प्रेरणा से ही ‘‘भंगी का बेटा हो या राष्ट्रपति की संतान, सबकी शिक्षा एक समान’’ सोशलिस्टों का प्रमुख उद्घोष बना।
तथ्यों एवं घटना के प्रकाश में पता चलता है कि भगत सिंह और डा0 राम मनोहर लोहिया के क्रियाकलापों एवं गतिविधियों में काफी समानता रही है। मूर्त रूप से आदमी वही काम करता है जो उसकी अमूर्त मानसिकता या मनोवृत्ति होती है। दोनों ‘‘नरौः वा कुंजरौः वा’’ शैली से परे अपनी बात साफगोई से रखते थे। सिद्धान्त और आदर्श की रक्षा के लिए बड़े से बड़ा खतरा उठाने और उसकी कीमत चुकाने के लिए दोनों सदैव तत्पर रहे। आजादी के पहले की डा0 लोहिया की गतिविधियां भगत सिंह से काफी मिलती हैं। दोनों में सिर्फ हत्या और बम का लाक्षणिक अंतर है, तात्विक रूप से भगत सिंह व लोहिया के विचारों को अलग नहीं किया जा सकता। दोनों पूंजीवाद से अभिप्रेरित साम्राज्यवाद के घोर विरोधी तथा समाजवाद के अप्रतिम योद्धा थे।
दोनों की वैचारिक समानताओं पर विस्तार से चर्चा होनी चाहिए। आज के वर्तमान परिप्रेक्ष्य में भगत सिंह और डा0 राम मनोहर लोहिया की प्रासंगिकता पहले से कहीं अधिक बढ़ी है। शोषण-विहीन-समतामूलक समृद्ध-समाजवादी भारत का स्वप्न अभी अधूरा है। भगत व लोहिया के विचारों की मशाल लेकर ही वर्तमान में व्याप्त स्याह विद्रूपताओं, विकृतियों एवं विडम्बनाओं से संघर्ष किया जा सकता है। भगत सिंह और लोहिया की लोकप्रियता उनके विचारों की स्वीकारिता की परिचायक है। तत्कालीन कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने स्वयं स्वीकारा है कि भगत सिंह महात्मा गांधी के बराबर लोकप्रिय थे, आजादी के बाद लोकप्रियता के शिखर पर डा0 लोहिया को यहां की आम जनता ने बैठाया। दोनों राजनीति में वीर और संत परम्परा के सर्वोच्च प्रतीक व सेतुपुरुष हैं, जिन्होंने न केवल अपने दौर को प्रभावित किया, अपितु कालजयी चिंतन की एक ऐसी अनमोल विरासत छोड़ गये जो मानव जाति की अतुलनीय, अनुग्रहणीय तथा अनुकरणीय थाती है।
निष्कर्षतः, हम कह सकते हैं कि भगत सिंह और लोहिया समान मानसिक धरातल व भावभूमि के दो ऐसे योद्धा थे जिनकी जीवटता और जिजीविषा अद्भुत थी। 1928 में जिस ‘समाजवाद’ को लाने के लिए भगत ने चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी बनाया था, उसी समाजवादी विचारधारा को लोहिया आजाद व भगत सिंह के बाद अपने सहयोगियों के साथ मिलकर लोहिया बल प्रदान करते रहे। 1958 में शेरघाटी में बोलते हुए लोहिया ने कहा ‘जितने भी दिन जीना है, मुझे इतना धीरज है कि समाजवाद के लिए काम करता रहूंगा।’ आलस्य और मुंह से अपने को बचाते हुए लोहिया देश के मन को सदैव गरमाते रहे। भगत सिंह की तरह वे भी चाहते थे कि वे अन्याय और अत्याचार का प्रतिकार यहां कि लोगों की आदत बन जाये और लोग भाग्य के भरोसे रहना छोड़कर खुद अपने भाग्यविधाता बने। भगत के प्रभाव के कारण जहां कांग्रेस ने पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता की मांग 1929 में की, फिर 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्वराज दिवस मनाते हुए पूर्ण स्वराज की मांग दोहराई। भगत सिंह के अभ्युदय के पहले तक कांग्रेस की राजनीति भिक्षावृत्ति की राजनीति थी। 1954 में लोहिया की बढ़ती लोकप्रियता और प्रभाव से घबराकर ही कांग्रेस ने जनवरी 1955 में आवड़ी (तमिलनाडु) अधिवेशन में अपना उद्देश्य ‘‘समाजवादी संघात के समाज की रचना’’ घोषित किया।
भगत सिंह अक्सर कहते थे कि गैर-बराबर लोगों के बीच बराबरी का व्यवहार गैर बराबरी बढ़ायेगा। डा0 लोहिया की विशेष अवसर के सिद्धान्त की अवधारणा भी यही है। डा0 लोहिया ने समान अवसर की सोच को खारिज करते हुए कहा कि पहले कमजोर वर्ग को, मानसिक रूप से पिछड़े लोगों को विशेष अवसर देकर ऊपर उठाओ फिर समान अवसर देने का औचित्य है वरना कमजोर आदमी अवसर का लाभ नहीं उठा पायेगा, स्थिति और भी अधिक भयावह हो जायेगी।
इस प्रकार सम्यक अध्ययन से पता चलता है कि भगत सिंह और डा0 राम मनोहर लोहिया एक ही स्वप्न के दृभटा और बुनियादी रूप से एक ही मनोभूमि तथा सांवेगिक संघात के व्यक्ति थे। दोनों समाजवाद के दो ऐसे प्रतीक और प्रकाशपुंज हैं जिनकी रौशनी एक सी है। जब तक देश वास्तविक स्वतंत्र, स्वावलम्बी एवं शोषण विहीन समतामूलक समाजवादी समाज नहीं बन जाता इनकी प्रासंगिकता बनी रहेगी।