भारतीय राजनीति की ऋषि-परम्परा को पूरी दुनिया बड़े ही श्रद्धा व सम्मान से देखा जाता है। यह परम्परा प्रहृलाद-राम-कृष्ण से प्रारम्भ होती है और वाया तिलक-गोखले-महात्मा गांधी, लोहिया व दीनदयाल तक पहुँचाती है। लोहिया व दीनदयाल भले ही दो अलग विचारधाराओं के कीर्ति-कलश एवं प्रतिमान-पुरुष हों किन्तु दोनों में कई सादृश्यतायें मिलती हैं। कहीं-कहीं दोनों एक दूसरे के पूरक व पर्याय भी प्रतीत होते हैं। उन्हें एक पथ के दो परंतप व परमाथभर्् पथिक कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

डा0 लोहिया से पंडित दीनदयाल 7 वर्ष छोटे थे। लोहिया की मृत्यु 1967 में हुई तो पंडित जी ने 1968 में महाप्रयाण किया। इस दृष्टिकोण से दोनों समकालीन व समवय हैं। दोनों एक समान सामाजिक विड़म्बनाओं व राजनीतिक विकृतियों यहाँ तक धार्मिक वैरूप्य से लड़े। लोहिया व दीनदयाल राजर्षि परम्परा के दो दैदीप्यमान अनमोल मोती हैं जिनकी साझा विरासत एवं सादृश्यताओं पर व्यापक विमर्श तथा सतत व सघन अध्ययन-बहस नितांत आवश्यक है। समग्र रूप से देखा जाय तो दोनों शोषण-विहीन समता मूलक विकेन्द्रित समाज के स्वप्नद्रष्टा थे जिसमें व्यक्ति को उसके मानवीय मूल्यों के कारण यथोचित् मान मिले। दोनों ने सत्ता व सियासत को कभी साध्य नहीं माना। गांधी व जेपी की भांति बेहतर समाज के नवनिर्माण का साधन के रूप में प्रयोग किया। दोनों ने जब भी अवसर आया तो सत्ता व सत्ताजनित शक्तियों तदनुसार सुविधाओं की तुलना में सिंद्धान्त एवं सतत लोकसंघर्ष को अधिक महत्व दिया।

गांधी के बाद लोहिया एवं दीनदयाल के ही चिन्तन ने भारतीय लोकमानस को सर्वाधिक प्रभावित किया और समर्थकों की भारी फौज खड़ी की जिन्होंने बाद में राजनीति के नियामक पदों को सुशोभित किया। लोहिया व दीनदयाल में समानतायें तलाश कर पंक्तिबद्ध किया जाय तो हजारों पृष्ठों की कई पुस्तकें भी कम पड़ेगी। दोनों मेधावी व बहुआयामी प्रतिभा सम्पन्न छात्र थे। चाहते तो अर्जित विद्या व बुद्धि बल पर अच्छी नौकरी कर सुखमय जीवन बिता सकते थे किन्तु दोनों ने राष्ट्रभक्ति व देश-सेवा का कंटकाकीर्ण पथ चुना और जीवन-पर्यन्त अविचल चलते रहे। लोहिया जर्मनी से पीएचडी कर भारत लौटने के बाद स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ गए तो पंडित दीनदयाल उच्च डिग्री हासिल कर संघ के माध्यम से राष्ट्र-सेवा से संलग्न हो गए। दोनों ने अपने को सम्पत्ति व संतति के मोह से परे रखा। दोनों जीवन भर अनिकेतन, यायावर व अविवाहित रहे ताकि देश-समाज को नई दिशा प्रदान करने के महायज्ञ में कोई बाधा न हो। दोनों बिना कुटी के योगी की तरह जिए और अन्ततोगत्वा अपनी चिन्तन की जाज्वल्यमान थाती देकर अनंत यात्रा पर चले गए।

लोहिया हिन्दी, भारतीय भाषाओं एवं लोकभूषा के प्रबल पैरोकार थे। हिन्दी-अभियान के कारण लोहिया पर तमिलनाडु में पथराव भी हुआ। उन्हांेने हिन्दी के प्रति अपना दृष्टिकोण व समर्थन-भाव नहीं बदला, यदि ऐसा कर देते तो तमिलनाडु लोहिया की पार्टी स्थापित हो जाती। लेकिन लोहिया ने पार्टी की जगह हिन्दी को अधिक महत्व दिया। उन्हीं की तरह दीनदयाल जी ने भी हिन्दी के समर्थन में व्यापक अभियान चलाया। हिन्दी की महत्ता बढ़ाने के लिए उन्होंने कई उद्बोधन दिए और यात्रायें की। एक तरफ लोहिया जहां सामंती भाषाआंे की जकड़न को कमजोर करने में लगे रहे तो दूसरी तरफ दीनदयाल लोकभाषा के गुरुत्व को बढ़ाते रहे। इस प्रकार दोनों भाषा-विमर्श की कसौटी पर ‘‘समानधर्मा’’ हैं। दोनों की भूषा भारतीयता का प्रतिनिधित्व करती है। दोनों साधारण कुर्ता व धोती दोनों पहनते थे बहुत हुआ तो सर्दियों में सदरी व मफलर का प्रयोग कर लिया। दोनों की लोकजीवन में प्रवेश के उपरान्त एक भी तस्वीर पश्चिमी पहनावे अथवा सूट-बूट में नहीं मिलती। न केवल आर्थिक अपितु राजनीतिक शक्तियों के विकेन्द्रीकरण को दोनों अपने लोकजीवन व लोकसंघर्षों का अभीष्ट मानते थे। दीनदयाल उपाध्याय की पुस्तक ‘‘राष्ट्रचिन्तन’’ के पृष्ठ संख्या 80 के पैरा-3 में स्पष्ट शब्दांे में लिखा है, ‘‘सच्चे प्रजातंत्र का आधार आर्थिक विकेन्द्रीकरण ही हो सकता है। अतः सिद्धान्तः हमें छोटे-छोटे उद्योगों को ही अपनाना चाहिए।’’ विकेन्द्रीकरण बिना कुटीर-उद्योगों के सम्भव नहीं है। यह लोहिया के अर्थ-चिन्तन का सार-तत्व है। राष्ट्र-चिन्तन में ही पृष्ठ-82 के पैरा-3 में पंडित जी ने लिखा है, ‘‘यदि अधिक आदमियों का उपयोग करने वाले छोटे-छोटे कुटीर उद्योग अपनाये गये तो कम पूँजी तथा मशीनों की आवश्यकता पड़ेगी जिससे नौकरशाही का बोझ कम होगा, विदेशी ऋण भी नहीं लेना पड़ेगा, देश की सच्ची प्रगति होगी तथा प्रजातंत्र की नींव पक्की हो सकेगी। राममनोहर लोहिया के आर्थिक दर्शन से पूरा विश्व परिचित है कि वे भारत के लिए श्रम-गहन (संइवनत.वतपमदजमक) तथा लघु व कुटीर उद्योगों को बेहतर मानते थे जो देशज तकनीकी व पूँजी पर केन्द्रित हो। समाजवादी युवक सभा के पुरी-सम्मेलन-1955 में लोहिया ने वैचारिक उद्बोधन दिया था जो ‘‘कांचन-मुक्ति’’ शीर्षक से प्रकाशित हो चुकी है। इसकी पृष्ठ संख्या-11 के पैरा-2 में लिखा है, ‘‘समानता, अहिंसा, विकेन्द्रीकरण, लोकतंत्र और समाजवाद-ये पाँचों भारत की समग्र राजनीति के अन्तिम लक्ष्य दिखाई पड़ते हैं। इन सभी के निरूपण में निर्गुण और सगुण का सक्रिय सहयोग प्रयुक्त होना चाहिए।’’

लोहिया व दीनदयाल आर्थिक विकेन्द्रीकरण तथा राजनीतिक व्यवस्था के रूप में लोक अथवा प्रजातंत्र के प्रतिबद्ध हिमायती थे। दोनों मानते थे कि राष्ट्रीय आय बढ़ने से देश का समग्र विकास नहीं होगा। आर्थिक विषमता को कम करने पर विशेष ध्यान होगा। दोनों के निर्गुण ध्येय में कोई अंतर नहीं है, लोहिया मानते थे कि न्यूनतम आय वर्ग और अधिकतम आय समूह में एक और दश का अनुपात होना चाहिए जबकि पंडित दीनदयाल एक अनुपाते बीस से भी सहमत थे। भारत के प्रधानमंत्री रहे भारत-रत्न अटल बिहारी बाजपेयी जितने निकट लोहिया के थे उतने ही दीनदयाल उपाध्याय के भी। उन्होंने संसद में सबसे अधिक लोहिया को उद्धरित किया है। लोहिया पर अटल जी द्वारा 13 नवम्बर 1967 को दिया गया ऐतिहासिक भाषण उनकी लोहिया के प्रति सम्मानभाव व निकटता परिचायक है। अटल जी 1968 से 1984 तक पंडित दीनदयाल उपाध्याय स्मारक समिति के अध्यक्ष रहे हैं। दीनदयाल जी के उपरान्त अटल ही जनसंघ के अध्यक्ष बनाए गए थे। अटल व पद्मविभूषण नानाजी देशमुख लोहिया व दीनदयाल के मध्य सेतु का काम करते थे। अटल जी द्वारा 8 अगस्त 1960 को लोकसभा में दिए गए भाषण का एक अंश द्रष्टव्य है। ‘‘अगर सरकार मानती है कि एक कर्मचारी का न्यूनतम वेतन 80 रुपए होना चाहिए तो मेरा कहना है कि अधिक से अधिक वेतन 800 रूपये होना चाहिए। क्या सभी पार्टियाँ इस बात से सहमत नहीं हैं कि न्यूनतम-अधिकतम आमदनी का अंतर 1 और 10 के बीच में होना चाहिए और अगर आप मान लेते हैं कि आमदनी में 1 और 10 का अंतर न होकर आज की परिस्थितियों में 1 और 20 के बीच में होना चाहिए तो अधिक से अधिक आप न्यूनतम वेतन 80 रुपया मानते हैं तो अधिकतम वेतन रुपए से ज्यादा नहीं हो सकता। इस वक्तव्य से स्पष्ट है कि लोहिया व दीनदयाल के आर्थिक चिन्तन की भावभूमि तात्विक रूप से एक समान है, अंतर केवल मात्रात्मक है। एक सवाल उठना स्वाभाविक है कि समकालीन होने के कारण लोहिया दीनदयाल अवश्य मिले होंगे। 1963 के पहले दोनों के मिलने और साथ चलने का कोई रेखांकित करने योग्य दृष्टान्त नहीं मिलता। साठ के दशक के पूर्वाद्ध तक ऐसे समीकरण बन चुके थे कि देश-राष्ट्र व समाज के सर्वतोन्मुखी सकारात्मक विकास व बेहतरी दोनों साथ आए। 1963 में हुए लोकसभा के उपचुनावों ने प्रस्ताव-बिन्दु का काम किया। लोहिया समाजवादी पक्ष की तरफ से फर्रूखाबाद और दीनदयाल उपाध्याय जौनपुर से जनसंघ के प्रत्याशी थे। लोहिया के विरुद्ध कांग्रेस व नेहरू ने केन्द्रीय सूचना व प्रसारण मंत्री रहे बालकृष्ण विश्वनाथ केसकर को चुनावी मैदान मंे उतारा। लोहिया को कांग्रेस किसी भी कीमत में जीतने से रोकना चाहती थी। न केवल उत्तर प्रदेश अपितु पूरे देश व दुनिया की दृष्टि फर्रूखाबाद व जौनपुर के उपचुनावों पर थी। पंडित दीनदयाल के सम्मुख बाबू राजदेव सिंह चुनौती दे रहे थे। नेहरू मंत्रालय के सदस्य व केरल के गवर्नर रहे अजीत प्रसाद जैन राजदेव जी के सहयोग के लिए डेरा जमा चुके थे। ऐसे में नानाजी देशमुख व अटल जी ने डा0 लोहिया से पंडित जी के लिए दो सभा नहीं तो कम से कम एक सभा करने का आग्रह किया। लोहिया जी ने अपना कठिन व प्रतिष्ठापरक चुनाव छोड़कर जौनपुर आए और एक-दो नहीं चार सभायें और दो दर्जन बैठकें की।

वैचारिक साम्य व नैतिक तकाजे न होते तो डा0 लोहिया कदापि पंडित जी के प्रचारार्थ नहीं जाते। अमरोहा से प्रसोपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष व आजादी के वक्त कांग्रेसाध्यक्ष रहे आचार्य जीवटराम भगवानदास कृपलानी तथा राजकोट (गुजरात) से लोहिया के साथी कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी संस्थापक-सदस्य व स्वतंत्र पार्टी के नेता व ‘‘सोशलिज्म रीकंसीडर्ड’’ के लेखक मिनोचेर रुस्तम उर्फ मीनू मसानी चुनावी-युद्ध का सिंहनाद कर रहे थे। आचार्य कृपलानी, मीनू मसानी व स्वयं अपना चुनाव छोड़कर दीनदयाल जी के प्रचार मंे जाना, लोहिया जी का पंडित जी के प्रति आत्मीयभाव की कहानी जग-जाहिर करती है। 1963 में पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी अमरीका, इंग्लैण्ड, जर्मनी व केन्या की प्रवासीय यात्रा पर गए। अमरीका, इंग्लैण्ड व जर्मनी में लोहिया के सहयोगियों ने पंडित जी के कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। अमरीका में उन्होंने आस्टिन स्थित नीग्रो डिग्री काॅलेज में अध्यापकों को संबोधित करते हुए रंग-भेद विरोधी तार्किक व मार्मिक उद्बोधन दिया जिसमें स्वामी विवेकानन्द महात्मा गांधी व लोहिया को उद्धरित किया।

इंग्लैण्ड प्रवास के दौरान महान समाजवादी नेता व सीनेटर रेजिनाल्ड सोरेनसेन से पंडित जी का संवाद एक महत्वपूर्ण थाती है। हाउस आफ काॅमन्स मंे पंडित का स्वागत सोरेनसेन ने ही किया। बहुत कम लोगों को पता है कि लेबर पार्टी के सीनेटर श्री सोरेनसेन भारत की आजादी के प्रबल पैरोकार रहे हैं। उन्होंने इंडिया लीग की यथाशक्ति मदद की। जब डा0 लोहिया व जयप्रकाश नारायण आगरा जेल में निरुद्ध थे तो वे लोहिया से मिलने ब्रिटानिया हुकूमत के विरोध के बावजूद आगरा जेल आए थे। अपनी विदेश यात्राओं में विशेषकर अमरीका व इंग्लैण्ड में दीनदयाल ने उन्हीं सवालों को उठाया जिन्हें लोहिया अन्र्तराष्ट्रीय मंचों पर उठाते रहे। इसका अभिप्राय स्पष्ट है कि शरीर भले दो हो किन्तु दोनों की वैचारिक आत्मा एक थी।

अप्रैल 12, 1964 को लोहिया एवं दीनदयाल ने संयुक्त वक्तव्य निर्गत किया जिसे 13 अप्रैल 1964 को सभी समाचार पत्रों ने प्रमुखता से प्रकाशित किया। लगभग 427 शब्दों के संयुक्त वक्तव्य से स्पष्ट है कि दोनों की परराष्ट्र नीति समान अवयवों वाली थी। दोनों भारत-पाक महासंघ के समर्थक थे। रक्षाबंधन, श्रावण पूर्णिमा तदनुसार 5 अगस्त, 1963 में जनसंघ का 5 दिवसीय चिन्तन व स्वाध्याय शिविर का आयोजन हुआ। उस समय जनसंघ के अध्यक्ष प्रख्यात गणितज्ञ, भाषाविद् व शिक्षाशास्त्री आचार्य देबप्रसाद घोष व महामंत्री पंडित दीनदयाल जी थे। इन पांच दिनों में तीसरा दिन पूरी तरह राममनोहर लोहिया के लिए नियत था। नानाजी देखमुख ने अपने एक लेख में लिखा है कि लोहिया प्रातः पौने 9 बजे आए और रात पौने ग्यारह बजे शिविर में गए। उपरोक्त घटनाओं से लोहिया व दीनदयाल का आपसी लगाव व सद्भाव प्रतिबिम्बित होती है।

दोनों कोरे राजनीतिज्ञ नहीं थे। लेखन व पत्रकारिता में भी दोनो सिद्धहस्त थे। लोहिया ने जहाँ ‘इंकलाब’, ‘कृषक’, ‘कांग्रेस सोशलिस्ट’, ‘जन’ व ‘मैनकाइण्ड’ जैसी पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन व संपादन किया तो पंडित जी ‘राष्ट्रधर्म’, ‘स्वदेश’ व ‘पां॰जन्य’ के प्रकाशन व संचालन आधार-पुरुष थे। दोनों का जीवन ही नहीं मृत्यु भी एक समाज थी। लोहिया अस्पताल में दुःखद मृत्यु को प्राप्त हुए तो दीनदयाल रेलवे-ट्रैक पर अवांछनीय व अप्रत्याशित दशा में मृत मिले।

दोनों भारतीय राजनीति के ऐसे प्रकाश-स्तम्भ हैं जिनसे युगों-युगों तक आने वाली पीढ़ियाँ प्रकाश लंेगी और तत्प्राप्त रोशनी से ‘स्याह अंधेरों’ से सतत संघर्ष करती रहेंगी। दोनों की सादृश्यताओं व साझा विरासत पर व्यापक एवं सघन मंथन से जो विचारामृत निकलेगा, वह जड़ समाज को नवजीवन देगा किन्तु इस दिशा में गंभीरतापूर्वक कार्य न होना दुःखद व दुर्भाग्यपूर्ण है।

(लेखक समाजवादी चिन्तन सभा के अध्यक्ष है व इंटरनेशन सोशलिस्ट काउंसिल के सचिव हैं।)