अरबपतियों के मामले में तीसरे स्थान पर सुशोभित सबसे अधिक कुपोषितों वाले हमारे देश में आज भी इंसान इंसान को जानवर की तरह ढ़ोने के लिए अभिशप्त है । कोलकाता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आवास से निकल कर पोद्दार छात्रावास की ओर पैदल बढ़ा , यह वही छात्रावास है जहां लोहिया रहते थे । सोचा की रिक्शा कर लूँ । एक बीमार बुजुर्ग को रिक्शा चलाते देख संशयवश पूछ बैठा कि इस उम्र में इतनी कमजोर शरीर कैसे रिक्शा खींच पायेगी । ‘रिक्शे को भूख खींचती है बाबू’ रिक्शे वाले के जवाब ने मुझे निस्तब्ध कर दिया । दुविधा में था, न बैठूँ तो उसे कमाई से वंचित करुंगा और रिक्शे पर बैठूँगा तो सिद्धांत और आत्मा को तकलीफ़ पहुँचेगी । उन्हें कुछ रुपए देना चाहा तो लेने से मना कर दिया । वे मेरी सम्मान-राशि को भीख समझ रहे थे । ज़िद की तो आशीर्वाद देते हुए पैसे ले लिए । थोड़ी दूर दूसरे रिक्शाचालक मिले । उन्हीं से कहा ‘ पहुँचा दो’ । हथ-रिक्शा पर बैठ कर मन ग्लानि से भर गया । इंसान होकर इंसान से ख़ुद को ढोवाना ठीक नहीं लग रहा था । अकस्मात् याद आया कि लोहिया हथरिक्शा को अमानवीय मानते थे । रिक्शे से उतर गया और उससे सवारी की जगह बैठने का आग्रह किया । उसने मुझे अजीब निगाह से देखा गोया मैंने ऐसी फ़रमाइश कर दी जो दीन-धरम के ख़िलाफ़ हो ।यहाँ उसे रुवाब में लेकर सवारी बनाया और कुछ दूर तक रिक्शा खींचा । बस इतना ही कहूँगा बहुत कठिन है, इंसान होकर इंसान को ढोना । हम-आप एक हथ-रिक्शा वाले के दर्द को न समझ सकते हैं, न ही स्वर दे सकते हैं, उनके लिए जिनके लिए किश्तों में जीने का मतलब मौत को टालते जाना है ।
जिनसे ज़िंदगी जी नहीं जाती,
व कमबख़्त मौत भी नहीं आती