भारत का जाज्वल्यमान इतिहास साक्षी है कि 23 मार्च, 1931 को 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह ने देश रक्षा के लिए अपन प्राणों को त्यागा था। वहीं वर्ष 1910 में इसी तिथि पर क्रान्तिधर्मी व चिंतक राममनोहर लोहिया ने गांधीवादी हीरालाल और चंदा देवी के घर में पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इन दोनों महापुरुषों के व्यक्तित्व, कार्य-प्रणाली, सोच एवं जीवन-दर्शन में कई समानताएं दृष्टिगत होती हैं। दोनों का सैद्धान्तिक लक्ष्य एक ऐसे शोषणविहीन, समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का था, जिसमें कोई व्यक्ति किसी का शोषण न कर सके और किसी प्रकार का अप्राकृतिक अथवा अमानवीय विभेद न हो। लोहिया, भगत सिंह को अपना आदर्श मानते थे, जब उन्हें फांसी हुई तो लोहिया ने इसका प्रतिकार लीग ऑफ नेशन्स की बैठक के दौरान सत्याग्रह कर किया था। भगत सिंह के कारण ही लोहिया 23 मार्च को अपना जन्मदिन मनाने से अनुयायियों को मना करते थे। भगत सिंह व लोहिया दोनों मूलतः चिंतनशील और पुस्तकों के प्रेमी थे। भगत सिंह ने जहां चन्द्रशेखर आजाद की अगुवाई में ‘हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन’ का गठन किया था, वहीं लोहिया आचार्य जी की अगुवाई में गठित 1934 में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के सूत्रधार बने। दोनों ने समाजवाद की व्याख्या स्वयं को समाजवादी घोषित करते हुए किया। दोनों अपने विचारों को लोगों तक पहुंचाने के लिए छोटी पुस्तिकाओं, पर्चे, परिपत्रों एवं अखबारों में लेखों के प्रकाशन का प्रयोग करते थे। भगत सिंह ने कुछ समय पत्रकारिता भी की। वे लाहौर से निकलने वाली पत्रिका दि पीपुल, कीरती, प्रताप, मतवाला, महारथी, चांद जैसी पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े रहे और अपने विचारों से लोगों को अवगत कराने के लिए इन पत्र-पत्रिकाओं में अग्रलेख लिखते रहे।भगत सिंह ने बलवंत व विद्रोही के नाम से अकाली व की