कभी-कभी जीवन के स्मृति पटल पर कुछ घटनायें, कुछ चेहरे और कुछ अविस्मरणीय क्षण स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं जिनकी अनुभूतियों, चुभन व स्पंदन को शब्दों में व्यक्त करना दुष्कर होता है। ‘‘मूकास्वाद्नवत्’’ बातें हृदय में तरंगों की तरह आती हैं, एक छटपटाहट व कसीली कसमसाहट सी छोड़कर जाने कहाँ चली जाती हैं। उसके बाद बचती है सिर्फ निस्तब्ध खामोशी की अनुगूँज जिसे मैं सुन तो सकता हूँ पर सुना नहीं सकता। उस जगमगाती रात की स्याह सुबह आज भी याद है, ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। पहली बार जीवन में महसूस किया कि ‘‘सच’’ कितना निष्ठुर, निर्मम, निहंग, निरीह और निर्लज्ज होता है? अपनी लाश आप उठाकर जीने की जिजीविषा क्या होती है? इन्सान निर्मित नर्क का स्वरूप कैसा होता है?

‘‘ये मेरा मुल्क औरत के लिए ऐसी रसोई है, बनाने वाला जिसमें चैन से कुछ खा नहीं सकता’’

यह शेर आम स्त्रियों की व्यथा को रेखांकित करता है। सही है कि दिन भर अनथक श्रम करने वाली आम महिला खाना बनाने के बाद अपने ही हाथों से बनाये गये स्वादिष्ट भोजन को आराम से नहीं खा सकती, सास का ताना, ननद की झिड़की, घर के काम, बेटे-बेटी का रुदन, कोई न कोई उसके आराम को बाधित कर ही देता है। उस चिड़चिड़ाहट में अक्सर घरेलू औरतें या तो खाना फेंक देती हैं या भुनभुनाते हुए थोड़ा-बहुत खाकर पानी पीकर सो जाती हैं। यदि कोई औरत गणिका या रूपजीवी हुई तो उसके लिए हमारा मुल्क ‘‘रसोई’’ नहीं नर्क से भी बदतर होता है।

31 दिसम्बर 2005 की बात है, मैं उस समय सिलीगुड़ी के एक प्रतिष्ठित दैनिक अखबार के संपादकीय विभाग में जिम्मेदार पद पर था। मेरे एक दोस्त (जो बंगला फिल्मों के मशहूर नायक हैं) ने नये साल के आमद की खुशी में पार्टी दी थी, रात्रि को नौ बजे सारा काम निपटा कर पार्टी के लिए दफ्तर से निकला। बाहर की आतिशबाजी और चमक-दमक देखने योग्य थी। दार्जिलिंग के निकट का शहर होने के कारण सिलीगुड़ी पर उसका असर साफ-साफ दिख रहा था, लग रहा था कि दीपावली इतराकर लौट आई हो। आमतौर पर सर्दी के दिनों में खाली रहने वाली सड़क पर काफी चहल-पहल थी। मेरे साथ एक और मित्र थे जो मेरे हम-पेशा और पड़ोसी भी थे। हम लोगों के बीच अतिरिक्त लगाव का एक प्रमुख कारण एक ही प्रदेश का होना था। उन्होंने कहा कि मुझे होटल छोड़कर अपने घर चले जायेंगे, पत्नी और बच्चों के साथ ‘‘न्यू ईयर’’ सेलिबे्रट करने, उनके लिए पत्नी का आग्रह भी ‘‘वारंट’’ सरीखा होता था। हम लोग कभी-कभी उनका मजाक भी उड़ाते थे पर उनका पत्नी-प्रेम कभी न कम होने वाले द्रोपदी के चीर की तरह बना रहा। वे मुझे होटल छोड़कर चले गए। तीन-सितारा होटल उस दिन दुल्हन की तरह सज-धज कर स्वागत कर रहा था। मुख्य द्वार पर पहुँचते ही दरबान ने बड़े अदब के साथ दरवाजा खोला। उसके सलाम का प्रत्युत्तर देते हुए मैं अंदर प्रविष्ट हुआ, रिसेप्शन पर पूछने पर पता चला कि पार्टी अंडरग्राउण्ड हाल में है। बड़ी तेज भूख लगी थी, सोचा कि खाना खाकर सीधे लौट आउँगा, सुबह से काफी दौड़-भाग के कारण थकान से शरीर बोझिल सा लग रहा था। हाल में पहुँचने के बाद मेरी स्थिति बड़ी असहज हो गई। तेज बैकग्राउण्ड म्यूजिक की धुन पर लड़के-लड़कियाँ नाच रहे थे। शायद ही कोई लड़का स्वेटर पहना हो, कई लड़कियों के शरीर पर कपड़े नाम-मात्र थे। इंसान स्वभाव से उत्सवधर्मी होता है। उसे इस दर्द भरी दुनिया में जहाँ भी कुछ मुस्कराहट देने वाला एक भी क्षण मिलता है, पहुँच जाता है। किन्तु वहाँ तो उत्सव के नाम पर संस्कृति के साथ क्रूर मजाक हो रहा था।

चरागों के बदले ‘‘मकाँ’’ जल रहे हैं, नया है जमाना, नई रोशनी है।

नये दौर की रोशनी में संस्कृति के स्थापित ‘‘मकानों’’ को उजड़ते हुए देखना मेरे लिये अप्रिय था। मेरे पाँव ठिठक गए, इसके पहले वापस लौटता कि पार्टी के आयोजक ने देख लिया। पास आकर हाथ पकड़कर बार के पास ले गया, उसे नहीं पता था कि मैं शराब नहीं पीता हूँ। मुझे वेटर के हवाले कर थांसिंग-जोन में चला गया। मुझे भूख लगी थी और खाने के लिए मात्र बर्फ था जो शराब में सोडा आदि के साथ डाला जाता है। सोचा बाहर निकल कर कुछ खा आऊँ, जैसे ही उठा वो फिर आ गया, ‘‘बिना पार्टी खत्म हुए मत जाना’’ कह कर मेहमानों विशेषकर अपनी सातवीं और नई प्रेमिका में व्यस्त हो गया। पार्टी लगभग 1 बजे के करीब खत्म हुई। पार्टी में खाने को कुछ मिला नहीं, एक-दो काॅकलेट से पेट नहीं भरता। उस समय मेरी स्थिति उस बीमार जैसी थी जिसकी दवा रोटी थी और वैद्य सेहत की गोलियाँ दे रहा था। मैं मन ही मन कुनकुनाते हुये बाहर निकला। सड़क पर आया तो होश उड़ गये, दूर-दूर तक ऑटो न रिक्शा। सर्दी के कारण पूरा बदन काँपने लगा, पैदल थोड़ी दूर चला ही कि देखा एक नेपाली अधेड़ गिरा पड़ा है उसे किसी कार ने टक्कर मार दी थी। उसकी कराह ने पाँव रोक लिए। मैं उसके पास गया तो पाया वह बुरी तरह जख़्मी है, सर और पैर से खून बह रहा है। मैंने तत्काल अपने पूरे बाँह के स्वेटर को निकाला और उसके एक बाँह से उस घायल अधेड़ के सर को बाँध दिया। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करुँ? तभी एक कार आती हुई दिखाई दी, कार चलाने वाले मेरे परिचित थे। वे एक बड़े चिकित्सक के रूप में परिख्यात् थे। मुझे लगा कि ईश्वर ने उन्हें मेरी और उस चोटिल व्यक्ति के सहयोगार्थ भेजा है। उन्होंने मुझे देखकर गाड़ी रोकी, कहा ‘‘चलो, घर छोड़ देता हूँ।’’ मैंने उनसे उस घायल को कार में बैठाकर अस्पताल ले चलने की पैरवी की। वे नहीं माने, बोले कि यह तो ‘‘राई’’ है, ये सब दारु पीकर ऐसे ही लुढ़कते हैं, सुबह तक यह खुद ही ठीक हो जायेगा। राई-सिलीगुड़ी में सामान्यतः उन लोगों को कहा जाता है जो नेपाली पृष्ठभूमि और आर्थिक रूप से कमजोर और मुख्य धारा से कटे हुए होते हैं। उन्होंने मुझे भी सलाह दिया कि इस चक्कर में न पडूँ। मैंने उनकी बात नहीं मानी और वे मेरी। डाक्टर धरती पर ईश्वर का प्रतिरूप होता है, मेरी यह अवधारणा उस दिन बिखर गई। गरीबों की मदद जब ईश्वर ही नहीं करता तो उसके प्रतिरूप से उम्मीद करना निरर्थक है। ऐसे ही किसी घटनाक्रम का साक्षी होकर विप्लवी कवि ने लिखा होगा- ‘‘नगर सेठ का भाग्य-विधाता, तू! मेरा भगवान नहीं है’’ लगभग 5-10 मिनट बाद मैंने सोचा कि उसे यहीं छोड़कर दौड़ते हुए अस्पताल चलता हूँ, वहाँ से एम्बुलेन्स लेकर आऊँगा, फिर ख्याल आया कि उसको उठाकर ले चलता हूँ, कितना भारी होगा? उसको हौसला देते हुए कहा कि घबराओ मत सब ठीक हो जायेगा। उसे उठाकर मुश्किल से 20-25 कदम भी चले हुए नहीं हुए होंगे कि एक रिक्शा वाला आता दिखाई दिया। पास आकर रिक्शे वाले ने रुककर पूछा किधर जाना है लेकिन अस्पताल ले जाने में असमर्थता जाहिर की, क्योंकि उस समय वह सवारी लेकर नक्सलबाड़ी-रोड पर स्थित किसी मोहल्ले में जा रहा था। उसने आश्वस्त किया कि वहाँ से वापस लौटकर आयेगा। मैं समझता था कि रिक्शा वाला नहीं आयेगा। सवारी उतारने के बाद या तो अपने घर जायेगा या फिर अगली सवारी के लिए रेलवे स्टेशन। मुझे लगभग 10-15 मिनट बाद बड़ी सुखद अनुभूति हुई कि वो वापस आया और हम लोगों को अस्पताल पहुँचाकर रेलवे स्टेशन की ओर मुड़ा। मैंने उसे 50 रुपये दिये, रिक्शे वाले ने 10 काटकर बाकी 40 रुपये वापस करते हुए कहा कि साहब यही रोजी-रोटी है नहीं तो मुझे यह भी नहीं लेना चाहिए। मैंने देखा कि उसकी खुद की उम्र 65-66 साल होगी और उसके एक हाथ में प्लास्टर चढ़ा था। मैरे यह कहने पर कि हाथ टूटा हुआ है, आराम करना चाहिए, वैसे भी यह उम्र रिक्शा चलाने की नहीं है। उसने कहा कि पेट की आग में जलकर मरने से रिक्शा चलाते हुए मरना ठीक होगा। साहब, जब तक पेट है, रिक्शा चलेगा। मेरे जेहन में धूमिल की पंक्तियाँ गूँज उठीं।

सुनो! आज मैं तुम्हें वह सत्य बतलाता हूँ, जिसके आगे हर सच्चाई छोटी है, इस दुनिया में भूखे आदमी का सबसे बड़ा तर्क रोटी है।

सुबह के चार बज रहे थे, उस बुजुर्ग को भर्ती कराने के बाद मैं एक बेंच पर बैठ गया। पता नहीं कब नींद आ गई। साढ़े सात-आठ बजे आँख खुली। अपने मरीज को देखने पहुँचा, उसने अपनी भाषा (नेपाली) में कई बातें कहीं, मैं कुछ समझा, कुछ नहीं समझा। दो तीन वाक्य याद है, ‘‘मेरो नाम शंकर राई। ..हुजूर को शुभ नाम..। तपाई रामरौ छे। मेरो छोरा-छोरी.... पता नहीं क्या-क्या। मुझे इतना समझ में आया कि वह मुझे धन्यवाद दे रहा है, उसका नाम शंकर है, वह मुझे पुलिस का आदमी समझकर हुजूर-हुजूर कह रहा है, और उसका कयास है कि मेरा नाम राम है। बाद में पता चला कि राई लोग सम्मान में हुजूर कहते हैं और ‘‘तपाई रामरौ छै का अर्थ ‘‘आप फरिश्ते हैं’’ होता है। अस्पताल से निकलते-निकलते 8 बज गये। अनुमान से एक गली पकड़ा शायद वो मेरे निवास वाले मुख्य मार्ग पर पहुँचा दे। मुझे इसलिए भी जल्दी थी कि साल के पहले ही दिन कार्यालय विलम्ब से नहीं जाना चाहता था। टेढ़ी-मेढ़ी गलियों ने जाने कहाँ पहुँचा दिया? तभी एक महिला ने आवाज दी, ‘‘ये बाबू, तुमि कोताय जाच्चो, ये खाने आय (ये बाबू तुम कहाँ जा रहे हो, इधर आओ) मुझे अजीब लगा, फिर भी उसके बुलावे पर चला गया। वो हाथ पकड़कर एक निहायत गंदे घर में ले गई, आँगन के पास चार-पाँच कम उम्र की लड़कियाँ बैठी थीं। मुझे समझते देर न लगी, मैं वेश्याओं की गली ही नहीं उनके घर में हूँ। मेरा हाथ-पैर फूलने लगा। मन ऊहापोह में उलझ गया। वहाँ न रुक सकता था न भाग सकता था। उसमें से एक लड़की जो बहुत सुन्दर और मासूम लगी थी, मेरे पास आई, आते ही बोली ‘‘100 टका’’। मैंने ऊपर वाले पाॅकेट से सौ रुपये निकाले और भी हाथ में कुछ रुपये आ गये, उसे सभी छीन लिये। ‘‘मैं अभी आई’’ कहकर सीढ़ी से ऊपर चली गई। मैं यंत्रवत् खड़ा रहा। प्यास लगी थी, मैंने उस महिला से पीने के लिए पानी माँगा। शायद मेरी सादगी व सहजता के कारण उस महिला के मन में मेरे प्रति स्नेहासिक्त सम्मान भाव जगा हो। उसने कहा कि ‘‘आमार जोल अशुद्ध आचे, आपनार अशुद्ध होई जाबे, तूमि जानबे ने आमि की?’’ (आप नहीं जानते हम लोग कौन हैं? हमारा पानी अशुद्ध है और आप भी अशुद्ध हो जायेंगे।) मैंने उसे टोका ‘‘पानी साफ या गंदा होता है, शुद्ध या अशुद्ध नहीं। घर बुलाया है, कम से कम पानी तो पिलाइये। उसने इशारा कि दूसरी लड़की मेरे सामने गिलास धोकर पानी लाई, मैंने दो-तीन गिलास पानी पिया। मैं पानी पी ही रहा था कि छत से वो लड़की आ गई जिसने पैसे लिये थे। मुझे एक कमरे में ले गई। छोटा सा घुटन व सीलन भरा कमरा था। मैं अन्दर पहुँचते ही बोला थोड़ा सफाई रखा करो, नहीं तो बीमार हो जाओगी, मुझे जाने दो मैं पहले से ही देर हो चुका हूँ। उसने प्रश्नवाचक निगाहों से मेरी तरफ देखा, बोली कुछ नहीं। मैं भी चुप था, फिर वो धीरे से बोली, ‘‘तूमि भालो लोग आच्यो, ए खाने केसो एलेचो।’’ (तू भला आदमी लग रहा है, इधर कैसे आ गया?)। मैंने बताया कि जल्दी आने के चक्कर में उसके चक्कर में आ गया। ‘‘चक्कर’’ शब्द के प्रयोग या फिर मेरे हाव-भाव के कारण उसे अचानक हँसी आ गई। उसके चेहरे की ओर देखकर मुझे महसूस हुआ जैसे कोई संगमरमर की तराशी हुई प्रस्तर-प्रतिमा सदियों बाद मुस्कुराई हो। मैंने नाम पूछा, उसने गेड़ी बताया। फिर खुद ही बोली कि असली नाम प्रोतिमा गांगुली है पर यहाँ गेड़ी कहते हैं, अब यही पहचान है। मैं कमरे से उसे नमस्कार करते हुए बाहर निकला, आँगन तक पहुँचा ही था कि वापस उसके पास लौट आया। वह उसी कमरे में बिस्तर पर लेटी हुई थी। मेरे वापस आने पर उसे जरा भी आश्चर्य नहीं हुआ, वह बिस्तर पर लेटी ही रही। लेटे-लेटे ही बोली, तारातरि एसो, आमार अनेक काज आचे (आ जल्दी आ, मुझे और भी काम है।) मैंने उसके पास जाकर पूछा, प्रोतिमा, ये बताओ जब इन रास्तों से कोई बारात गुजरती है, तब तुम्हारे मन में क्या भाव आते हैं? तुम्हें कैसा लगता है? प्रश्न सुनकर उसका उबलते हुए गन्ने के झाग जैसा साफ गेहुंवा रंग पीला पड़ गया। गौरांगिनी पीत-वर्णिका हो गई। उसका चेहरा तमतमा उठा, मुझे लगा कि अभी वो पीट देगी। उसके आँखों में आँसू आ गये। आँखों से हृदय की पीड़ा छलक उठी। लरजते हुए होठों से सिर्फ इतना बोली, बाबू हम लोगों से जिंदगी के सवाल नहीं पूछा करते। मैं सवाल पूछकर खुद को शर्मसार पा रहा था। जब सवाल में इतनी चुभन थी तो भगवान जाने, इसके उत्तर में कितना दंश होगा। मैं बाहर निकलने लगा तो वो हिन्दी में बोली ‘रुको बाबू मैं मुहल्ला पार करा देती हूँ। दरवाजे तक आने के बाद फिर वापस मुड़ी, दुपट्टा लिया, ओढ़ा और तेजी से मुझसे आगे निकल गई। शायद थकने के कारण मैं स्वाभाविक गति से नहीं चल पा रहा था। मैंने उससे कहा कि साथ चलें, मैं इतना तेज नहीं चल सकता। उसने बंगला में कहा ‘ए बाबू आमि गणिका, अमार संगे गेले तोमार बदनामि होबे।’ (ये बाबू मैं तवायफ हूँ, मेरे साथ चलोगे तो लोग क्या कहेंगे, मेरी बदनामी का दाग तुम्हारा भी दामन गंदा कर देगा।) फिर इसके पहले मैं कुछ पूछता खुद ही हिन्दी में बोल पड़ी तू इस दुनिया का आदमी नहीं, कहाँ से यहाँ आ गया? मैं भी कहाँ पीछे रहता। उत्तर देने की बजाय सवाल पूछ बैठा तुम इस बस्ती में कैसे आ गई? एक सर्द मौसम में यह एक सुलगता हुआ सवाल था। उसने एक निगाह मेरी ओर देखा फिर बोली ‘‘जोखुन जीवने मोरून आसे, तोखुन मृत्यु आमा के बचाते पारे ना’’ बाबू जब जिंदगी मारती है तो मौत भी नहीं बचा पाती। मेरी भाषायी समस्या देखते हुये वो फिर हिन्दी में ही बोलने लगी ‘‘मैं एक अच्छे परिवार में पैदा हुई। माँ का देहान्त तभी हो गया जब मैं सात-आठ साल की थी। पिता ने ही हम तीनों भाई-बहन को पाला। छोटे भाईयों को पढ़ाने-लिखाने में बहुत पैसा खर्च होता था, इसलिये मैंने हाईस्कूल में ही पढ़ाई छोड़ दी, मैं पढ़कर क्या करती? कम से कम भाई तो पढ़ लेते। बड़ा वाला पढ़ने में तेज था, नौकरी भी पा गया। मैंने अपनी पूरी दुनिया और सारी खुशियों को घर की चहारदीवारी में समेट लिया था। भाईयों के लिए जो हो सकता था किया।’’ उसकी बातें सुनते ही अनायास ही दिमाग में एक शेर उभर आया............

‘‘ख़्वाहिशें छुपाती हैं आँसुओं के आँगन में, घर की मुफलिसी लोगों, बेटियाँ समझती हैं’’

वो अपनी राम-कहानी सुनाये जा रही थी ‘फिर मेरी शादी हो गई, शादी के 15 दिन बाद मेरे पिता का देहान्त हो गया। पति अय्याश किस्म का था। उसने मुझे मौज-मस्ती का सामान बना दिया, कभी-कभी दोस्तों के आगे भी मुझे परोस देता था। शराब पीकर पिटाई भी करता। एक दिन मैं भागकर मायके आ गई। भाईयों ने मुझे वापस जाने को कहा। मैं क्या करती? वापस जा नहीं सकती। भाईयों से अपना हिस्सा माँगा तो मार मिली। थाने गई तो किसी ने सुना नहीं। एक झोपड़ी बना कर गाँव के बाहर रहने लगी। कभी किसी घर झाड़ू-पोंछा या मजदूरी कर किसी प्रकार पेट भरती। एक दिन एक सेठ के यहाँ पोंछा लगा रही थी, उसके घर में कोई नहीं था। पत्नी मायके गई थी, उसने मेरे साथ जबदरस्ती करने की कोशिश की, किसी तरह अपने को बचाकर झोपड़ी पहुँची। रात को चार पुलिस वाले आये, जीप में उठाकर थाने लाये। रात-भर थाने के पीछे किसी पुलिस वाले के घर में पुलिसकर्मियों ने मेरे साथ निर्ममतापूर्वक सामूहिक बलात्कार किया। उनके साथ सेठ भी था। उसकी तहरीर पर मुझे जेल भेज दिया गया। 6-7 महीने बाद जब छूटी तो पूरी दुनिया लुट चुकी थी। फिर जिन्दगी ने भटकाते हुए, इस बस्ती में पहुँचा दिया। यहाँ कम से कम गुनाह पर सजा मिलती है, बेगुनाही पर नहीं।’ वो बोलती जा रही थी, मैं सुनता जा रहा था। सोच रहा था साँसों की डोर कायम रखने के लिए कितना कुछ सहना पड़ता है। उसी ने बताया कि उसके पूर्वज कन्नौज के उपाध्याय थे जो यहाँ आकर गंगा की घाटी में बस गये। इस नाते गंगोपाध्याय कहलाये, अंग्रेजों को गंगोपाध्याय बोलने में दिक्कत होती थी तो उन्होंने गंगोपाध्याय को गांगुली बना दिया। मुझे उस पर दया आ रही थी लेकिन जब उसने बताया कि उसकी 8 महीने की बेटी है जिसे बोर्डिग स्कूल में डाल रखा है। उसे खूब पढ़ायेगी और इस लायक बनायेगी कि वह पैरों पर खड़ा होकर समाज से आँख मिलाकर बात कर सके, दया सम्मानभाव में बदल गया। मुख्य मार्ग पर पहुँचाने के बाद अलग से होने से पहले शायराना व सूफियाना अंदाज को अखि़्तयार करते हुए उसने कहा कि बाबू मद्दतों बाद इसी गली में कोई ऐसा आया है जो आदमी है ग्राहक नहीं, जिसकी निगाह में हमें इंसान समझा, वस्तु नहीं। मेरे हिस्से की भी जिन्दगी व खुशी मेरा भगवान तुझे दे दे। साथ ही साथ उसने एक हिदायत भी दी कि कभी दोबारा इन गलियों में मत आना। मैं आॅटो में बैठा और निवास की ओर चल पड़ा। घर पहुँच कर सबसे पहले नहाया, फिर बिस्तर पर पड़ कर सोचने लगा। अपने आपको बहुत ज्यादा दिग्भ्रमित और निर्वातवत् पा रहा था। होटल में अर्द्धनग्न अवस्था में नृत्य करती शरीफजादियों के साथ दुपट्टा ओढ़ती हुई वेश्या, मुझे अकेला छोड़कर भागता हुआ डाक्टर और दोबारा लौटकर आया रिक्शा वाला, दोनों छोटे भाई, पुलिस वाले, सेठ और उनसे जुड़े सारे दृश्य एक के बाद एक आज भी चल-चित्र की तरह आँखों के सामने नृत्य करते हैं। सोचता हूँ कि क्या विडम्बना है कि जिस इंसानियत की हम दुहाई देते हैं, वह मुुझे वहाँ मिली जहाँ दिन के उजाले में तथाकथित शरीफ जाना पसन्द नहीं करते। आदमीयत उन्हीं में दिखी जिन्हें आदमी नहीं समझा जाता। प्रोतिमा की सिसक मेें एक सवाल निहित था कि वो भी इंसान है फिर उसे अस्पृश्य व हेय, क्यों समझा जाता है ? क्यों उसे वेश्या बनने के लिए अभिशप्त होना पड़ा। उसकी ‘‘सुबह’’ भी ‘‘रात जैसे ही’’ क्यों है? निःसंदेह इन सुलगते सवालों का कोई उत्तर नहीं, सिवाय खेद प्रकट करने के अलावा सभ्य समाज कुछ नहीं कर सकता। इन यक्ष प्रश्नों का उत्तर आज का युधिष्ठिर नहीं दे पायेगा, देगा भी तो ‘नरौः वा कुजरौः वा’’ ही बोलेगा। साहिर लुधियानवी ने इन्हीं सवालों को केन्द्र में रखते हुए लिखा है:

ये कूचे, ये नीलामघर दिलकशी के, ये लुटते हुए कारवाँ जिन्दगी के कहाँ हैं, कहाँ है, मुहाफिज खुदी के, सना-ख़्वाने-तकदीसे-मशरिक कहाँ हैं ? मदद चाहती है ये हव्वा की बेटी, यशोधा की हम जिन्स, राधा की बेटी पयम्बर की उम्मत, जुलैखा की बेटी, सना-ख़्वाने-तकदीसे-मशरिक कहाँ हैं ? बुलाओ खुदायने-दीं को बुलाओ, ये कूचे, ये गलियाँ, ये मंजर दिखाओ सना-ख़्वाने-तकदीसे-मशरिक को लाओ, सना-ख़्वाने-तकदीसे-मशरिक कहाँ हैं ?

जिस समाज में उसकी सबसे सुन्दर, मधुर व कोमल इकाई (स्त्री) के आँखों में स्वर्णिम सपनों के स्थान पर आँसू हो, चेहरे पर सुनहरी आभा की जगह शर्मिन्दगी हो, क्या उसे सभ्य व सशक्त समाज कहा जा सकता है? उसकी तरसती, तड़पती और तर्जित, अवहेलित, उपेक्षित, वंचित, जर्जरित, उत्पीडि़त, जिन्दगी के यक्ष-प्रश्नों का उत्तर आज के धर्मराज को देने ही होंगे। कोई भी दौर हो, दाँव पर द्रोपदी ही क्यों लगाई जाती है, अपहरण सीता का ही होता है, फिर उसके बाद घर-निकाला भी उसे ही मिलता है। प्रस्तर-प्रतिमा अहिल्या को ही बनना पड़ता है। प्रोतिमा की आँखंे आज भी यही पुकारती हैं, क्या हम इंसान नहीं हैं, इंसान सिर्फ आप लोग हो।

(तूमि मानुष हो बो, आमि के आचि, कि आमि मानुष ना।)