वर्तमान दौर वैश्वीकरण और उदारीकरण का है। पूरी दुनिया के देशों के हित एक दूसरे से बड़ी ही सूक्ष्म तथा जटिल तरीके से जुड़ चुके हैं। विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका संप्रभु देशों की सरकारों के समानान्तर प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण हो चुकी है। 19वीं और 20वीं सदी वाले सैनिक तथा राजनीतिक उपनिवेशवाद का स्थान सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने ले लिया है। 21वीं सदी में यदि भारत को अंग्रेजी का उपनिवेश कहा जाय तो गलत न होगा। देश में अंग्रेजी का शासन ब्रिटानियाँ हुकूमत के जमाने में जितनी थी, आज उससे कम नहीं है, कभी-कभी तो प्रतीत होता है कि यहाँ वास्तविक राष्ट्रभाषा हिन्दी, बांग्ला, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम नहीं अपितु अंग्रेजी है। दुनिया में कोई ऐसा देश नहीं है जहाँ कोई विदेशी भाषा इतनी प्रभावशाली और प्रतिष्ठित है जितनी भारत में आंग्ल-भाषा। फ्रांस के राजनीति शास्त्री रेमो आरो का मत है कि उपनिवेशवाद में शासन देश के अल्पसंख्यक व्यक्ति सम्राज्यवादी सत्ता के प्रतिनिधित्व के रूप में शासन चलाते हैं। एक अन्य अभिमत के अनुसार उपनिवेशवाद उन आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक नीतियों का नाम है जिन पर चलकर, कोई साम्राज्यवादी शक्ति दूसरे क्षेत्रों अथवा लोगों पर अपना नियंत्रण बनाएं रखना अथवा उनका विस्तार करना चाहती है। सैनिक उपनिवेशवाद की समाप्ति के पश्चात् यूरोपीय एवं अमरीकी देशों ने अपने अर्थतंत्र की समृद्धि के लिए तथा एशियाई एवं अफ्रीकी देशों की अर्थव्यवस्था पर परोक्ष रूप से काबिज रहने के लिए नए तरीकों को तलाशा। संयुक्त राष्ट्र संघ, विश्वबैंक व विश्व व्यापार संगठन के माध्यम से ऐसी नीतियां बनाकर लागू की गईं जिससे एशियाई और अफ्रीकी देश अपने आपको स्वालम्बी न बना सके। भारत में यूरोपीय अथवा अंग्रेजी के उपनिवेशवाद की नींव लार्ड विलियम बेटिंग के समय 1828 के बाद पड़ी जब बेटिंग ने फारसी की जगह अंग्रेजी को राज-काज की भाषा घोषित किया। 05 जुलाई 1853 को इतिहास लेखक प्रोफेसर एच0एच0 विल्सन ने अंग्रेजी के प्रभाव की मीमांसा करते हुए कहा कि वास्तव में हमने अंग्रेजी पढ़े-लिखों की एक पृथक जाति बना दी है, जिन्हें कि अपने देशवासियों के साथ या तो जरा भी सहानुभूति नहीं है और यदि है तो बहुत कम। यह वही वर्ग था जो अंग्रेजी हुकूमत को चलाने में अंग्रेजों की मदद करता था। सर चाल्र्स टैवेलियन ने पार्लियामेंट्री कमिटी के आगे उपनिवेशवाद के लिए अंग्रेजी को अपरिहार्य बताते हुए 1853 में ही कहा था कि अंग्रेजी के चयन से हिन्दोस्तानियत कम होती है। अंग्रेजी पढ़ने और बोलने वालों का लगाव अपनी मिट्टी व मातृभाषा और लोक संस्कृति के प्रति नहीं होता है। बीसवीं शताब्दी में अंग्रेजी यूनाइटेड किंगडम के शासन का माध्यम थी, इस सदी में बहुराष्ट्रीय कम्पनियों और संस्थानों की लाठी बनी हुई है। अंग्रेजी के प्रभाव के कारण भारतीय मेधा यूरोप की पिछलग्गू बन के रह गई, हमारा मौलिक चिन्तन व कल्पना-शक्ति अंग्रेजी के ककहरे और व्याकरण में उलझ कर अपनी प्रखरता खो बैठा। हमारे शहीदों का देश को स्वालम्बी और सर्वोपरि बनाने का सपना अभी भी सपना बना हुआ है।
उरुज़-ए-कामयाबी पर मेरा हिन्दोस्तां होगा,
रिहा सय्याद के हाथों से अपना आशियां होगा,
चखाएंगे मजा फिर वादी-ए-गुलशन का गुलचीं को,
बहार आ जायेगी उस दिन जब अपना बागवां होगा।
इन पंक्तियों की तामीर आज भी वहीं खड़ी है, जब व जहाँ लिखी गई थी। 17.5 फीसदी से अधिक आबादी वाले भारत का वैश्विक व्यापार में पूरा अंशदान 2 फीसदी से भी कम है। जीवनमान, रहन-सहन के स्तर, सेवा व वस्तुओें की प्रति व्यक्ति उपलब्धता में भारत यूरोपीय देशों से मीलों पीछे है। पड़ोसी देशों जहाँ चीन के पास 3181.1 मिलियन डालर और जापान के पास 1326.1 मिलियन डालर तो वहीं भारत के पास मात्र 296.7 मिलियन डालर विदेशी मुद्रा है। भारतीय मानसिक क्षमता शनैः-शनैः कुंद होती जा रही है। अंग्रेजी ने सभी भारतीय भाषाओं को कमजोर कर दिया है। संयुक्त राष्ट्र की भाषा नीति सांस्कृतिक उपनिवेशवाद को बढ़ा रही है। जब संयुक्त राष्ट्रसंघ की स्थापना हुई थी तब अंग्रेजी, मंदारिन, स्पेनी, रूसी, अरबी, व फ्रेंच को ही आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त था, आज भी यह विशेषाधिकार इन्हीं भाषाओं के पास है, जबकि विश्व भाषा पंचाट के अनुसार हिन्दी मंदारिन के बाद सबसे बड़े भूभाग में बोली जाने वाली दूसरी सबसे बड़ी भाषा है। सुनकर ही अटपटा सा लगता है कि 6-7 दशक पूर्व यू0एन0ओ0 के सदस्यों की संख्या 51 पर भी आधिकारिक भाषाओं की संख्या 6 थी, सदस्य देशों की गणना में 142 की वृद्धि के बावजूद आधिकारिक भाषाओं की गिनती में रंच मात्र भी बढ़ोत्तरी नहीं की गयी। 6800 में मात्र 6 भाषाओं की ही महत्ता को रेखांकित करना न केवल दुःखद अधिक कि 120 मिलियन लोगों की भाषा फ्रेंच को यह दर्जा प्राप्त है लेकिन इसकी तीन गुनी बड़ी भाषा हिन्दुस्तानी उपेक्षित व अवहेलित है। इस अवहेलना व अवमूल्यन का कारण समझ से परे है, फिर भी कयास लगाया जा सकता है कि हिन्दी को लेकर दो प्रकार की भ्रांन्तियाँ वैश्विक पटल पर विद्यमान हैं। प्रथम हिन्दी स्थानीय (वर्नाक्यूलर) भाषा है, द्वितीय भारत में ही हिन्दी का विरोध है। ये दोनों बातें गलत व पूर्वाग्रहग्रसित हैं। हिन्दी को वर्नाक्यूलर मानना सन् 1878 का दृष्टिकोण है, जो आज अपने आप अव्यवहारिक व अप्रासांगिक हो चुका है। हिन्दी की बोली भोजपुरी को ही अन्तर्राष्ट्रीय स्वीकृति हासिल है, इसे बोलने वालों की संख्या दर्जनों देशों में तकरीबन 40 मिलियन है। दूसरा, हिन्दी का विरोध गैर हिन्दी भाषी भारतीय क्षेत्रों में नहीं के बराबर है। आजादी के पूर्व ब्रिटानिया हुकूमत द्वारा स्वार्थवश कराये गये गतिरोधों को छोड़ दिया जाय तो हिन्दी का कभी व्यापक विरोध नहीं हुआ। वे कभी जाति, तो कभी भाषा के नाम पर हिन्दुस्तान को बांटकर रखते थे, बांटो व राज करो’,(Divide and Rule) उनकी नीति ही थी। सच्चाई इसके ठीक विपरीत है। हिन्दी को राष्ट्र भाषा के रूप में प्रतिष्ठापित करवाने और इसे पूरे देश में प्रतिष्ठित करने वाले महान नेताओं में अग्रगण्य लोकमान्य बालगंगाधर तिलक व गोपाल कृष्ण गोखले महाराष्ट्र (मराठी क्षेत्र), नेताजी सुभाष चन्द्र बोस बंगाल (बंगला क्षेत्र), महात्मा गांधी गुजरात (गुजराती क्षेत्र) के थे। हिन्दी को राष्ट्र भाषा बनाने की मांग पहली बार गुजराती कवि नर्मद ने की थी। दक्षिण भारत के बड़े नेता निंगलिजप्पा व बद्री विशाल पित्ती का हिन्दी प्रेम जगजाहिर है। हिन्दुस्तानी अथवा हिन्दी यदि यूएनओ की आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त तो वैश्विक ज्ञान-विज्ञान एवं जानकारी में भारत अन्य देशों विशेषकर अमरीका व यूरोपीय राष्ट्रों से पीछे न होता। उल्लेखनीय है कि भारत आबादी में दूसरा और क्षेत्रफल में सातवां सबसे बड़ा देश होने के बावजूद समग्र विकास में 133 एवं प्रति व्यक्ति आय में 159 देशों से पीछे है। यूएनओ की दुराग्रहपूर्ण भाषा नीति के कारण 2500 से अधिक भाषायें खत्म होने के कगार पर हैं, 324 दुर्लभ श्रेणी में आ चुकी हैं व स्पेन की 1850, आस्ट्रेलिया की 135, फ्रांस की 14 बोलियों का कोई नाम लेवा नहीं बचा। भारत, चीन व अफ्रीकी देशों की स्थिति और भी भयावह है। स्वयंसिद्ध कथन है कि एक बोली अथवा भाषा की मृत्यु का अर्थ पीढ़ी-दर-पीढ़ी संचित लोक संस्कृति और व विरासत की अकाल मौत है। इसे महज संयोग नहीं समझना नहीं चाहिए कि वैश्वीकरण में वह देश आर्थिक-सामाजिक विकास में उतना ही पीछे है जितनी उसकी प्रतिनिधि भाषा। यही कारण है कि साठ के दशक में महान चिंतक डॉ0 लोहिया ने हिन्दी के पक्ष में व्यापक अभियान चलाया था जिसकी प्रासंगिकता और आवश्यकता आज और अधिक बढ़ चुकी है। हमारा विरोध सूरज को मुट्ठी में बंदकर उजालों का विसंगतिपूर्ण व विड़म्बनामय वितरण करने वाली मानसिकता व कार्य प्रणाली से है। हमारी मांग है कि हिन्दुस्तानी (हिन्दी) को आधिकारिक भाषा का दर्जा देने के साथ-साथ बंगला (250 मिलियन), पुर्तगाली (193 मिलियन), जापानी (123 मिलियन), तथा जर्मन (118 मिलियन) पर भी यूएनओ और विश्व समुदाय विचार करे इससे न केवल यूएनओ की स्वीकारिता बढ़ेगी अपितु वैश्विक लोकतंत्र को भी मजबूती मिलेगी। महामना मदन मोहन मालवीय ने कहा था भारतीय एकता अक्षुण्ण है क्योंकि भारतीय संस्कृति की धारा निरन्तर बहती रही है और बहेगी। अंग्रेजी ने भारतीय संस्कृति की निरंतरता को प्रभावित किया है इसीलिए अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हर उस महान विभूति ने अंग्रेजों और अंग्रेजी का विरोध किया जो विश्व-ज्ञान से अवगत था, चाहे वे अरविन्द घोष जैसे आध्यात्मिक व्यक्तित्व हों या मदन लाल धींगड़ा जैसे क्रान्तिकारी हों अथवा महात्मा गांधी व डा0 लोहिया जैसे चिंतक तथा सत्याग्रही हो। डॉ0 लोहिया ने आजादी के उपरान्त हिन्दी के लिए आन्दोलन का सूत्रपात किया। उन्होंने 2000 सालों के भारत समीक्षा करते हुए सामंती व उपनिवेशवादी भाषाओं संस्कृत, अरबी, फारसी व अंग्रेजी की जगह पाली, प्राकृत, उर्दू, हिन्दी को तरजीह थी। सामंती व लोक भाषा के अंतर को लोकतंत्र के लिए विष के समान प्राणघातक बताया। उनका मानना था कि अंग्रेजी के हटने कई करोड़ों प्रतिभाशाली और योग्य लोगों को अवसर मिलेगा। उनका मत द्रष्टव्य है, छोटी सी तादाद के शासक शासितों पर अपना राज जितना गोली से चलाते है, उससे ज्यादा बोली से कायम रखते है। डॉ0 लोहिया की वाणी और अवधारणाओं की अवहेलना का दंश पूरा देश झेल रहा है। अभी भी वक्त है, आइए, लोहिया का अध्ययन-मनन व अनुगमन करें, यदि हम नहीं सम्भले तो...... ”आज तूफान से बचने की कोई राह तो है, कल न तदबीर चलेगी न मुकद्दर होगा।“