भारतीय परिप्रेक्ष्य में समाजवाद हमेशा एक व्यापक और गतिशील सिद्धान्त रहा है। यहाँ के लोकजीवन की प्राणवायु समाजवाद है। 20वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध से अब तक का विश्लेषणात्मक विवेचना की जाय तो हर दौर में एक जमात ऐसी रही है जो स्वयं घोषित रूप से समाजवादी कहती रही है और समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाती रही है, 21वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में मुलायम सिंह यादव इसी जमात का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनका आज जन्मदिन है। 8-9 सितम्बर 1928 को चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू जैसे चिन्तनशील क्रांतिकारियों ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी बनाया ताकि भारत को आजाद कराकर यहाँ समाजवाद की स्थापना की जाय। 1931 तक क्रांतिकारियों ने समाजवाद व स्वतंत्रता को भारतीय जनमानस का सुखद स्वप्न बना दिया, इसे सैद्ध ान्तिक आधार व धरातल आचार्य नरेन्द्रदेव, राममनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश नारायण, सदृश सोशलिस्ट पार्टी के महान नेताओं ने दिया। मुलायम सिंह ने समाजवाद की लोहियावादी धारा की नई व्यवहारिक दृष्टि देते हुए समसायिक बनाया तथा पूरे देश विशेषकर उत्तर प्रदेश में समाजवाद की लौ जलाए रखा। उदारीकरण के पश्चात् व साम्प्रदायिकता की आँध्ाी में 1992 में जब लगने लगा था कि अब समाजवादी विचारधारा विलुप्त हो जायेगी, ऐसे मुलायम सिंह जी ने छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र, बिहार के समाजवादी चिन्तक बाबू कपिलदेव सिंह, आंध्र प्रदेश के बदरी विशाल वित्ती, बंगाल के प्रमोद सिन्हा व किरणमय नंदा, रामशरण दास तथा आजम खा जैसे प्रतिबद्ध व प्रखर समाजवादियों को एकत्र कर समाजवादी पार्टी का गठन किया, जिसका ध्येय लोहिया की समाजवादी अवधारणाओं के अनुरूप शोषणविहीन समता मूलक समृद्ध भारत का नवनिर्माण है। नेताजी ने लोहिया के हिन्दी अभियान को गति दी और देशज शैली तथा कार्य प्रणाली की महत्ता को स्थापित किया। रक्षामंत्री के रूप उन्होंने मंत्रालय के पत्रव्यवहार हिन्दी में करवाया और उत्तर प्रदेश लोक सेवा की परीक्षाओं में अंग्रेजी की अनिवार्यता समाप्त कर गाव तथा गरीब परिवार के बच्चों को भी लोक सेवा की परीक्षाओं में बैठने का हौसला दिया। हिन्दी को रोजी-रोटी व प्रतिष्ठा में जोड़ा जैसा लोहिया चाहते थे। लोहिया ने भारत-पाक महासंघ की वकालत की थी, उनके शिष्य मुलायम सिंह ने भारत-पाक-बांग्लादेश के महासंघ की खुली पैरवी की और अपनी इस सोच को सार्वजनिक मंचों से प्रकट किया। 4 नवम्बर 1994 को सपा के स्थापना अधिवेशन में बोलते हुए उन्होंने कहा, ‘‘भारतीय उपमहाद्वीप में असंतोष और हिंसा को समाप्त करने का हम आवाहन करते हैं। हम चाहते हैं कि हम भाई-भाई की तरह रहें, तीनों देश तरक्की करें और अपने-अपने देश में फैली गैर-बराबरी, भुखमरी, हिंसा व आतंक के माहौल को समाप्त कर दें।’’ तीनों देशों में तनाव कम करने का इससे बेहतर रास्ता नहीं है। समाजवादी उपागम एक देश द्वारा दूसरे देश की सीमा के अतिक्रमण के खिलाफ है। चीन के खिलाफ डा0 लोहिया ने नेहरू को चेताया था किन्तु वे सजग नहीं हुए। चीन ने भारत पर हमला किया और बड़े भूभाग पर कब्जा जमा लिया और अभी भी लगभग 42 हजार वर्ग किलोमीटर पर काबिज है। लोहिया ने मानसरोवर को चीनी कब्जे से मुक्त कराने की मांग की और ‘हिमालय बताओ’ कार्यक्रम दिया। वर्तमान समय सिर्फ मुलायम सिंह यादव ही अग्रिम पंक्ति के एक मात्र ऐसे नेता हैं जो चीन की उपनिवेशवादी नीतियों की खुले शब्दों में आलोचना करते हैं और उसे भारत का ‘‘शत्रु नम्बर एक’’ भी कहने से नहीं हिचकते। 6 अगस्त 1913 में लोकसभा में एक बहस के दौरान 12 अक्टूबर 1913 को लोहिया जी की पुण्यतिथि के अवसर पर आयोजित लखनऊ में एक सभा को संबोधित करते हुए मुलायम ने चीन को आगाह किया। विदेश व सामरिक मामलों के जानकारों का मत है कि यदि मुलायम ने बहस न चलाई होती तो चीन अब तक पूरा अरुणांचल प्रदेश व लद्दाख हड़प चुका होता। लोहिया विदेश पूँजी कर्ज अथवा विदेशी पूँजी पर आधारित अर्थ व्यवस्था के खिलाफ था, वे मानते थे कि देश का सतत विकास सिर्फ देशी संसाधनों से सम्भव है, विदेशी अभिकल्प, विदेशी पूँजी निवेश पर केन्द्रित विकास एकांगी और अमीरी गरीबी की खाई को बढ़ाने वाला होगा। लोहिया के इस माडल की चर्चा सिवाय मुलायम और समाजवादी पार्टी के कोई नहीं करता । जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के मुद्दे से सभी दल सहमत हो गये, हर कोई खुलकर बोलने से बच रहा था, मुलायम ने संसद में इसे किसान व गरीब विरोधी संज्ञा से नवाजा। मुलायम लोहिया व चरण सिंह की तरह कृषि आधारित अर्थ व्यवस्था के पक्षधर हैं और ऐसी नीतियाँ चाहते हैं जिसे गरीबों, कमजोरों, बेरोजगारों तथा किसानों के हाथ में क्रयशक्ति आए। इस समय देश के बजट का 18 फीसदी अंश ब्याज में विदेश चला जाता है। आज भी शिक्षा, सड़क व स्वास्थ्य जैसी सुविधाओं की व्यवस्था के लिए यूरोपीय देशों, अमरीका व जापान की ओर देखना पड़ रहा है। हिन्दी दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी भाषा होकर भी संयुक्त राष्ट्र संघ की अधिकारिक भाषा के सम्मान से वंचित हैं और भारत को सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता (वीटो पाॅवर) के लिए कभी भी निर्णायक प्रयास कांग्रेस और भाजपा की सरकारों द्वारा नहीं किया गया। भारतीय विदेश नीति और आर्थिक नीति कभी-कभी लगता है कि दिल्ली की बजाय न्यूयार्क स्थित यूएनओ और विश्व व्यापार संगठन के दफ्तरों में बनती है, मुलायम सिंह की गर्जना कि, ‘‘देश की विदेश नीति देश के हितों के अनुसार होनी चाहिए अमरीका के नहीं, ऐसे में राहत देती है।’’ देश को आज समाजवादी सोच और देशज शैली के नेतृत्व की आवश्यकता है, जहा यहाँ की सामाजिक आर्थिक सांस्कृतिक व राजनीतिक जटिलताओं तथा समस्याओं को समझता हो और उनके समाधान हेतु दृढ़संकल्प शक्ति रखता हो। निःसंदेह वह नेतृत्व मुलायम सिंह यादव को ही हो सकते हैं, जो लाहिया की समाजवादी विचारध् ाारा तथा चरण सिंह की राजनीतिक शैली का वास्तविक वारिस हैैं। लोहिया और चरण सिंह पर पुस्तक लिखने वाले अमरीका के वाशिंगटन विश्वविद्य ालय में राजनीति शास्त्र तथा अन्तर्राष्ट्रीय अध्ययन के प्रोफेसर पाल आर ब्रास ने मुलायम को चरण सिंह का वारिस बताया है तो पूर्व राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी ने उनमें लोहिया व चरण सिंह का अद्भुत समन्वय देखा। खुद चैधरी चरण सिंह ने बस्ती में आयोजित एक रैली में मुलायम सिंह जी को अपना वास्तविक राजनैतिक वारिस घोषित किया था। लोहिया की विकेन्द्रीकरण, सप्तक्रान्ति, दाम बांधों नीति, समाज शिक्षा नीति, सीताराम राज्य, भारत-पाक महासंघ व विशेष अवसर के सिद्धान्त जैसी अवध् ाारणाओं और कार्यक्रमों को मुलायम ंिसह ही आगे बढ़ा रहे हैं। यही नहीं चरण सिंह के द्वारा उठाये गये खेती और किसानी की समस्याओं को आज उन्हीं के द्वारा स्वर मिल रहा है। कैफी आजमी, हरकिशन सिंह सुरजीत, जनेश्वर मिश्र से लेकर सुदूर नन्हकू नाई, फुल्लर कोहार तक के हृदय को स्पंदित करने वाले मुलायम का जीवन दर्शन सतत संघ् ार्ष व वैचारिक प्रतिबद्धता की प्रेरणा देता है। वे भारतीय राजनीति की जीवित किवदन्ती और प्रेरणादायी किरदार हैं जो अपने बहुआयामी योगदानों के लिए रेखांकित होते हैं।
(लेखक समाजवादी चिन्तक व चिन्तन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं)