महान समाजवाद चिन्तक व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के दिन 12 अक्टूबर, 1938 को जन्मे उर्दू के नवप्रवर्तनकारी शायरों में अग्रगण्य निदा फाज़ली ने लिखा है
“हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी,
जिसको भी देखना हो कई बार देखना,
दरिया के उस किनारे सितारे भी फूल भी,
दरिया चढ़ा हो तो उस पार देखना,
दो-चार गाम राह को हमवार देखना“
ये पंक्तियां उन्होंने जिसके लिए भी चाहे जिस संदर्भ में लिखी हों किन्तु जिस वर्ष राममनोहर लोहिया ने हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी, उसी वर्ष 1955 के वसंत पंचमी के पवित्र दिन संवेदनशील सुघर सिंह व करुणा की मूरत मूर्ति देवी के पुत्र तथा 21वीं सदी में भारतीय समाजवाद के शिखर पुरुष मुलायम सिंह के अनुज के रूप में जन्मे शिवपाल के प्ररिप्रेक्ष्य में सटीक व शब्दशः सही प्रतीत होती हैं। हृदय की चित्र-विथिका में उनकी अनेकानेक तस्वीरें विद्यमान हैं, हर तस्वीर उनकी अलग-अलग भूमिकाओं का प्रतिनिधित्व करती हैं। अनाथालयों व यतीमखानों में ईद, होली, दीवाली जैसे त्योहारों को मनाने वाले शिवपाल, तानाशाह सरकारों से निरन्तर पंजा लड़ाने वाले सतत् योद्धा शिवपाल, अक्सर घण्टों कवि सम्मेलनों, मुशायरों व काव्यगोष्ठियों में बैठकर कलमकारों की रचना-धर्मिता को प्रोत्साहित करने वाले शिवपाल एक, झटके में नेता प्रतिपक्ष जैसे बड़े पद को छोड़ने की पेशकश कर सबको अचम्भित करने वाले शिवपाल, सरकार में होने पर बतौर मंत्री कई निर्माण कार्यों की झड़ी लगाने वाले शिवपाल, शहीदों-महापुरुषों की स्मृति में विविध आयोजनों को आयोजित करने व करवाने वाले शिवपाल, भारत को वीटो पावर तथा हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए वैश्विक महाभियान का सूत्रपात्र करने वाले शिवपाल एक, रूप अनेक।
सर्वप्रथम स्पष्ट करना आवश्यक है कि अपने कालखण्ड के समाजवादी नेतृत्व, आन्दोलन, वैचारिकी एवं राजनीति के कई मोड़ों के साक्षी, खांटी व खरे समाजवादी लोहिया के अनन्य अनुयायी मुलायम सिंह यादव के “लक्ष्मण“ व “हनुमान“ शिवपाल सिंह यादव पर केन्द्रित यह “शब्द-चित्र“ न तो उनकी आधिकारिक जीवनी या जीवन-वृत्तिका है, न ही उनके योगदान, योग्यता, महत्ता व अवदान को रेखांकित करने के लिए लिखी गई कोई पुस्तक है।
वस्तुतः, यह लक्षणा में दिया गया इस लघु प्रश्न का दीर्घाकाय उत्तर है कि मैं उन्हें क्यों पसंद करता हूँ? साथियों के शब्दों कहूँ तो मैं उनके साथ सयुजा-सखाया की भाँति हूँ? यह प्रश्न है जो अक्सर संगी व सहयोगी पूछ लिया करते हैं। “शब्द-चित्र“ साहित्य की यह विधा जिससे किसी भी घटना, व्यक्ति अथवा स्थान का चित्रण होता है, यों कह लीजिए कि यह शब्दों से बनाई गई तस्वीर होती है।
मेरी तरफ से यह वदसपदम शब्द-चित्र www.shivpal.in अपने अभिभावक को उनके जन्म दिन पर दी गयी एक तुच्छ-भेंट है। यह पूर्णतया नितांत-निजी संस्मरणों, साझा संवादों, घटनाओं एवं गतिविधियों को ही आधार बनाकर मात्र पाँच घण्टे की अल्पावधि में लिखा और प्रकाशित किया गया है। इसके माध्यम से मैंने शिवपाल जी के व्यक्तित्व को चित्रित और रेखांकित करने की अकिंचन कोशिश की है। प्रकारान्तर से इसके जरिए शिवपाल सिंह के पाठकगण को समकालीन समाजवादी विचारधारा, आन्दोलन, नेतृत्व व कार्यप्रणाली के विविध आयामों व सैद्धांतिक तथा व्यवहारिक पक्षों एवं पहलुओं से भी अवगत कराने का अकिंचित्कर प्रयास हुआ है। इसका शीर्षक “शिवपाल मेरी व समकालीनों की नजर या दृष्टि में“ भी होता तो भी समीचीन होता।
सहज, सरल व संवेदनशील समाजवादी शिवपाल सिंह से मै कब, कैसे और क्यों प्रभावित हुआ इसका सीधा-सपाट, तथ्य व तिथिपरक उत्तर मैं स्वयं को या किसी को भी दे पाने में पूर्णतया असमर्थ हूँ लेकिन इतना तो स्पष्ट है कि वे आज मेरे मन-मस्तिष्क में वहाँ पर विराजे हैं जहाँ शब्द नहीं पहुँच सकते। उनके प्रति सम्मानभाव व लगाव शब्दातीत अथवा अभिव्यक्ति के दृष्टिकोण से शब्दों की परिधि से परे है। इसके पीछे कई कारण हैं जिनमें सत्ता, संसाधन व सुविधाओं का मोह तो कदापि नहीं है। उत्तर प्रदेश का व समाजवादी होने के कारण अपने समवय साथियों की तरह उनसे मेरा परिचय काफी पुराना है किन्तु परिचय, आत्मीयता में लोहिया जन्म शताब्दी वर्ष (2010) में परिवर्तित हुआ। जहाँ तक मैंने उन्हें देखा व महसूस किया है वे एक साथ कई भूमिकाओं को पूरी प्रतिबद्धता से जीने वाले अप्रतिम व्यक्ति हैं।
रमज़ान के आखिरी दिन (2013) की बात है। लखनऊ चैक में मैं किसी काम से गया था, ईद का दिन था। सारे लोग खरीदारी में मशगूल थे, मुझे अचानक फुचका खाने का मन किया, फुचका का अभिप्राय पानी बताशा से है। खाते खाते नजर एक 8-9 साल के बच्चे पर पड़ी जो बड़ी मायूस निगाहों से खरीदारी कर रहे एक बच्चे और उसके पिता को देख रहा था। मैनें उस बच्चे को बुलाया और पूछा कि इतना उदास क्यों हो? वो भभक कर रोने लगा। मैंने उसे फुचका खिलाया और काफी कुरेदने पर उसने बताया कि वो अनाथ है, ईद के दिन सारे बच्चे नए कपड़े पहनकर सड़कों पर निकलेंगे और मेरे पास पहनने के लिए कपड़े तक नहीं हैं। उसने सिसकते हुए गमज़दा लफ़्जों में यह भी कहा कि ईद के रोज वह कमरे में ही रहेगा। मुझे उसकी बातें सुनकर बड़ा अजीब सा लगा। उसकी उदासी ने मुझे भी उदास कर दिया। मैंने अपनी स्कूटी से उसे यतीम खाने पहुँचाया, जेब में पाँच सौ रुपये थे तीन सौ रुपये में उसके लिए कुर्ता पायजामा खरीदा। मुझे अनायास ही किसी शायर की पक्तियाँ याद आ गईं-
“मस्जिद की तंग गली में एक मुफलिस बेवा रोती है,
उसका बच्चा ये पूछ बैठा, ईद महलों में ही क्यों होती है।“
लौटकर यह वाकया और बच्चे की व्यथा शिवपाल सिंह जी को बताई। आमतौर पर सदैव मुस्कराने वाले शिवपाल संजीदा हो गए, फिर कुछ सोच कर बोले, कल सुबह आओ, फिर बात करेंगे, यह कहते हुए घर के अंदर चले गए। मैंने उनकी आँखों में हल्की सी नमी महसूस की।
दूसरे दिन सुबह नौ-सवा नौ बजे के करीब शिवपाल जी के 7, कालीदास मार्ग स्थित सरकारी आवास पहुंचा तो देखा कपड़ों के पैकेट, मिठाई आदि एक जगह बड़ी मात्रा में रखी हुई है। उनके निजी सचिव धर्मेन्द्र भाई ने बताया कि यह सब आप ही के लिए है। मैंने सोचा मजाक कर रहे हैं। भंडारी काका चाय लेकर आए, चाय खत्म भी नहीं हुई कि शिवपाल जी ने बाहर निकलते ही कहा कि कल वाले यतीम बच्चों को कपड़े वगैरह देने अनाथालय चलना है। उस दिन हल्की फुल्की बारिश भी हो रही थी। मैंने नवाब अली अकबर को भी बुला लिया। कुछ फाइलें शिवपाल निपटाकर यतीमखाने पहुंचे। सारे बच्चों को एक-एक कर कपड़े, मिठाई, किताबें स्नेह के रैपर में बांधकर दिया। बच्चे उनसे ईदी की भी जिद करने लगे, वो बच्चों में ऐसे हिलमिल गए जैसे पुराना परिचय हो। कभी बारिश होती तो कभी सूर्य देवता मुस्कराते। मैंने उस दिन शिवपाल का सहज मानवीय रूप देखा। सत्तावन वर्षीय कद्दावर काबीना मंत्री उस दिन सात से लेकर सत्तरह साल के बालक लग रहे थे। यतीम खाने के निजामिया ने उनके नाश्ते का अलग से प्रबंध किया था। एक जावेद या फैज नाम के लड़के ने उनसे गंदे बिस्तर की शिकायत की, बतलाया कि जिस बिस्तर पर वह सोता है, वह बेहद खराब व खटमल भरा है। तभी एक सईद अख्तर नाम के लड़के ने छोटी सी कविता सुनाई जो इस प्रकार थी।
शिवपाल चचा हमारे हैं, हम यतीमों के सहारे हैं,
जैसा सुन्दर नाम है, बिल्कुल वैसा काम है
सीधे भोले-भाले हैं, दुनिया से निराले हैं
हमको करते प्यार बहुत, खुद भी बहुत प्यारे हैं
शिवपाल चाचा हमारे हैं .......
सच्ची बातें कहते हैं, अच्छी बात सिखते हैं
जब गम हमें रुलाते हैं, वे आँसू पोंछने आते हैं
एक से एक हैं दुनिया में, लेकिन वो सबसे प्यारे हैं
शिवपाल चाचा हमारे हैं .......
यह कविता क्या बाल सुलभ मन की सहज अभिव्यक्ति थी जो तुकबंदी के रूप में निकल गई। साथ में गए एक विधायक जी ने अख्तर को 500 रुपये इनाम स्वरूप निकाल कर दिए। बताना आवश्यक समझता हूँ कि अख्तर ने पैसे लेने से मना कर दिया, जब सबने कहा कि बड़े का आशीर्वाद या ईदी समझ कर रखो, तब उसने काफी संकुचाते हुए पैसे लिए। पूरा दोपहर भर मंत्री जी यतीम बच्चों के बीच रहे। उस दिन बच्चों को मानो अलादीन का चिराग मिल गया था। वहाँ के प्रबन्धक ने बताया कि काज़मैन स्थित इस यतीम खाने में बड़े नेताओं में आने वाले शिवपाल सिंह यादव दूसरे बड़े नेता है, पहले नेता हम सभी के आदर्श आजादी की लड़ाई के जाज्वल्यमान रणतूर्य सुभाषचन्द्र बोस थे जो 10 अक्टूबर 1939 को यहाँ पधारे थे। मुझे यह बात प्रबन्धक ने, मैंने शिवपाल जी को बताई। उन्होंने इतना ही कहा, सुभाष बोस महान विभूति थे, उनसे मेरी क्या तुलना। हम लोग यतीम खाने से निकलने के लिए गाड़ी में बैठ चुके थे, तभी मंत्री जी की दृष्टि शिकायत करने वाले बालक पर पड़ी, उन्होंने गाड़ी रोककर उसे अपना बिस्तर दिखाने के लिए कहा। सभी बच्चों का बिस्तर दूसरे तल्ले पर बिछता था। पुरानी बिल्डिंग की छत बेहद कमजोर थी। सबके हाथ-पैर फूल गए, बच्चों का भार कम होता है। यदि मंत्री जी और 15-16 लोग छत पर गए और छत गिर गई तो क्या होगा? यह सोचकर सबके हाथ-पाँव फूल गए, पर उन्हें रोके कौन? जब तक हम लोग समझ पाते वे सीढ़ियों पर बच्चों के साथ चढ़ चुके थे। सुरक्षाकर्मियों को रोक दिया गया, जब वे वापस लौटे तब सबके जान में जान आई, बच्चों के होठों पर मुस्कान देने के लिए यह जानते हुए भी छत बहुत कमजोर है शिवपाल सिंह छत पर चढ़ गये, एक तरह से अपनी जान तक जोखिम में डाल दी। ऐसा नहीं कि एक बार ईद मन गई तो मन गई, उसी वर्ष दीवाली में भी यही कार्य हुआ। उन्होंने ढेर सारे पटाखे, फुलझड़ियाँ व मिठाइयाँ दीवाली से एक दिन पहले ही मंगवा कर रख लिया। मैं दीपावली की सुबह पूर्वांहन 9 बजे उनके यहाँ पहुंचा तो देख कर दंग रह गया। सबसे मंहगी दुकान की मिठाई और अव्वल दर्जे की फुलझड़ियां थीं। वो ऐसे सम्भाल कर रखी हुई थीं, जैसे पुराने दौर के राजा खजाना रखते थे। मंत्री जी ने कहा कि यह सब अनाथ बच्चों में बाँटना है। बात-चीत के दौरान मैंने शिवपाल जी से कहा कि इतनी मंहगी मिठाई की क्या आवश्यकता थी, अनाथों में बाँटनी ही तो है। उन्होंने बड़ी सहजता से बिना कुछ सोचे प्रत्युत्तर दिया कि जब देना ही है तो खराब क्यों दें? यह समाजवादियों की पुरानी रीति रही है। 1965 की सर्दियों की घटना है। राममनोहर लोहिया जी व जनेश्वर जी लखनऊ से दिल्ली लौट रहे थे। फिरोजाबाद के पास उन्हें एक बूढ़ा गरीब सर्दी से कांपता हुआ दिखा। लोहिया जी ने जनेश्वर जी से अटैची से रखे दो स्वेटरों में से एक स्वेटर निकाल कर देने को कहा। जनेश्वर जी हाफ स्वेटर जो थोड़ा पुराना भी था, निकाल कर देने लगे इस पर लोहिया जी ने डांटा और पूरे बांह का नया वाला स्वेटर देने को कहा, साथ ही हिदायत भी दी जिसे भी देना चाहिए अपनी अच्छी चीज़ देना चाहिए। मैंने मंत्री जी से आग्रह किया कि वे वितरित करने न जाए उनके रहने से एक तो समय बहुत लग जाता है, दूसरे भीड़ व प्रोटोकाल की भी समस्या अनावश्यक खड़ी हो जाती है। उन्होंने हम लोगों का आग्रह स्वीकार कर लिया लेकिन स्पष्ट शब्दों में हिदायत दी कि मिठाई व फुलझड़िंयां सिर्फ हिन्दू बच्चों में ही नहीं बल्कि मुस्लिम बच्चों में भी बांटना। बकौल शिवपाल “बच्चे भगवान का रूप होते हैं, उन्हें धर्म या जाति के चश्में से नहीं देखना चाहिए।“ मैंने यतीमखाने में फोन किया तो वहाँ के मुंशी ने कहा कि मिठाई तो ठीक है लेकिन पटाखे व फुलझड़ियां नहीं बांट सकते, यह मजहब के खिलाफ़ है। मेरी समझ में नहीं आया कि फुलझड़ियां जो खुशी व मुस्कान लाने के लिए सप्रेम दी जा रही हो, उनसे कोई मज़हब कैसे बिगड़ सकता है। मेरे साथ समाजवादी बौद्धिक सभा के महासचिव अभय यादव, समाजवादी पार्टी के तत्कालीन प्रदेश सचिव अजय त्रिपाठी “मुन्ना“ व अखिल भारतीय अग्रवाल समाज सभा के अध्यक्ष राजेश अग्रवाल भी थे। हम लोग दुविधा और अनिर्णय की स्थिति में थे। मैंने संवेदनशील पत्रकार भाई परवेज़ अहमद को फोन किया, उनकी राय थी कि यतीमखाने में मिठाई व फुलझड़ियां बांटना किसी भी सूरत में इस्लाम विरोधी नहीं, ऐसी ही सोच काबिल सहाफी फैजल फरीदी की भी थी, उन्होंने एक यतीमखाने का पता भी बताया जहाँ जरूर बांटने की सिफ़ारिश की। अजय त्रिपाठी ने मुंशी को दोबारा फोन किया कि शिवपाल जी ने बच्चों के लिए मिठाई व फुलझड़ियां भेजी हैं। उनके नाम का असर था या त्रिपाठी के फोन का, बांटने की अनुमति मिल गई। बच्चों ने मिठाई तो तुरंत खा ली लेकिन फुलझड़ी रख ली। एक लगभग सात साल का बच्चा मुट्ठी बंद किए हुए था, वह मुट्ठी खोले तो उसके हाथ में लड्डू रखा जाए। दो लड़के जबरदस्ती बंद मुट्ठी खुलवाने में लग गए, बंद मुट्ठी खुलने पर उसके हाथ से दो रुपए का सिक्का निकला। मैंने बच्चे को गोद में उठाकर पूछा इस पैसे का क्या करोगे, उसने तपाक से कहा कि पटाखा व फुलझड़ी खरीदूंगा, आज दीवाली है न। मैने मुंशी साहब की ओर देखा, वे झेंप से गए। हमारे उनके बीच एक मूक संवाद हो गया। उस बच्चे को और पटाखे और फुलझड़ियां देकर हम लोग दूसरे अनाथालयों की ओर प्रस्थान कर गये। एक रेशमा नाम की बच्ची ने बताया कि आज पांच साल बाद दीपावली मनाएगी क्योंकि पांच साल पहले जब उसके पिता जिन्दा थे तो वे पटाखे व मिठाई लातेे थे, तब दीपावली मनाती थी। मैंने मंत्री जी से अखबारों में खबर भेजने की अनुमति मांगी, उन्होंने यह कहते हुए साफ मना कर दिया कि परोपकार छुपाकर करना चाहिए। लेकिन मैं ठहरा समाजवादी, वह भी सत्याग्रह व सविनय अवज्ञा वाला, यहाँ मैंने साधिकार उनकी अवज्ञा की, अखबारों को समाचार बनाकर भेज दिया। मेरी स्पष्ट मान्यता है कि अच्छे काम ढोल बजाकर व बहस चलाकर करना चाहिए। बंद कमरे में इबादत कैसी? कबीर बाबा चाहे जो कहें लेकिन अजान माइक लगाकर और पूजा घण्टी बजाकर ही करना उचित है और आमतौर पर ऐसा होता भी है, दूसरे दिन सभी अखबारों में यह खबर छपी कि “समाजवादियों ने अनाथ बच्चों के संग दीवाली मनाई“। शिवपाल जी ने कुछ बोला नहीं पर मुझे एक-दो बार घूरा जरूर। अब तो हर बड़ा त्यौहार अनाथों एवं यतीमों के साथ मनाने की रवायत बन गई। हम लोगों की देखी-देखा कई लोग अनाथालयों एवं यतीमखानों में त्योहार मनाने लगे हैं।
समाजवादियों की “बादली परम्परा“ बहुत पुरानी है जिस तरह बादल सुमन्दर से पानी लेकर मरूस्थल और सूखे खेतों पर बरसता हुआ आगे बढ़ जाता है अपने पास कुछ भी नहीं रखता, इसी तरह का व्यवहार समाजवादियों की कुल परम्परा रही है। लोहिया जी इस कड़ी के शिखर पुरूष थे, मुलायम सिंह जी ने यथासम्भव इस विरासत को आगे बढ़ाया है, शिवपाल जी को भी मैंने हमेशा इसी पथ पर चलते हुए देखा है कि जैसे भी हो गरीबों की मदद का कोई अवसर न छूटे। मुझे भली भांति याद है, पार्टी दफ्तर में शिवपाल जी बैठे हुए थे। सर्दी के दिन थे, बाहर लाॅन में प्लास्टिक की कुर्सियाँ गोलाकार में लगाकर सभी लोग बैठकर आपस में गपशप कर रहे थे। एक विद्यार्थी आया और पैर छूकर फीस न दे पाने की व्यथा कहने लगा। कई बार उसकी आँख से आँसू भी निकलेे, शिवपाल जी ने अपने कमरे में जाकर बैठने को कहा और थोड़ी देर बाद खुद भी कमरे में चले गए। उनके निजी सचिव ने एक धनाढ्य पदाधिकारी को बुलाया, अंदर क्या हुआ होगा इसका अनुमान हम सभी को लग चुका था। मुश्किल से 5 मिनट लड़का हँसते हुए निकला। उसकी आंखों में आंसुओं के खारे समुंदर की जगह उम्मीद की हरियाली लहरा रही थी। उसी ने बताया कि फीस के पैसे शिवपाल चाचा ने दे दिये और किताबें आदि खरीदने के पैसे उन्होंने मोटे वाले अंकल (पदाधिकारी) से दिला दिए। शिवपाल जी, मधुलिमए व किशन पटनायक की तरह समाजवाद के व्याख्याता भले ही न हों किन्तु अपने उद्बोधनों में अक्सर समाजवाद को पारिभाषित करते हुए एक वाक्य कहते हैं कि “गरीबों के आंसू पोंछना ही समाजवाद है।“ समाजवाद की इस परिभाषा को वे यथासम्भव जीते भी हैं। यही कारण है कि गरीब, कमजोर व वंचित वर्ग के लोग शिवपाल पर उनके समवय नेताओं में सबसे अधिक भरोसा करते हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवाद की रीढ़ उन्हें इसी गुण के कारण माना जाता है जो वे हैं भी। मेरे निकटवर्ती साथी जानते है कि मैं विद्यार्थी जीवन से सामाजिक गतिविधियों में गहरी रूचि रखता हूँ, अपने सामाजिक क्रिया-कलापों से ही छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र के निकट पहुंचा। मैंने लोकभाषा भोजपुरी में समाचार बुलेटिन के प्रसारण के लिए 2002 में आंदोलन छेड़ा था, इसमें उन्होंने काफी मदद की थी। वे अकसर शिवपाल जी संवेदनशीलता, भलेपन व भोलेपन की तारीफ़ करते थे। हम लोगों के दिमाग में शिवपाल जी की दूसरी छवि थी। मेरी जब भी कोई पुस्तक, बुकलेट या लेख प्रकाशित करता। छोटे लोहिया को जरूर देता, वे पढ़ते व सुधारते थे। एक दिन उनके 8, राजेन्द्र प्रसाद मार्ग, नई दिल्ली स्थित आवास पर शिवपाल जी आये हुए थे, मैं समय आंध्र प्रदेश में नौकरी करता था, दिल्ली आता तो जनेश्वर जी के यहाँ ही रुकता था, उनके यहां खाने व रहने की व्यवस्था हर समाजवादी के लिए सदैव खुली रहती थी। जनेश्वर जी ने मुझे बुलाकर प्रकाशित पुस्तकों का एक सेट शिवपाल जी को दिलवाया, उन्होंने पुस्तकों को पलटकर देखा, धन्यवाद दिया और बात-चीत में पूर्ववत् लग गए। मुझे कहीं जाना था मैं चला गया। शाम को 8 बजे लौटकर आया तो देखा पुस्तके उसी सोफे पर पड़ी हुई हैं जहाँ शिवपाल जी बैठे हुए थे। मैंने अवधारणा बना ली कि शिवपाल जी को पठन पाठन और पढ़ने-लिखने वालों से खास सरोकार नहीं है। आज बिना किसी हिचक के मैं स्वीकार करता हूँ कि मैं उस समय गलत था, शिवपाल जी पढ़ने लिखने वालों को न केवल अतिरिक्त स्नेह करते हैं अपितु उनकी बातों को सामान्यतया सापेक्षिक रूप से अधिक महत्व देते हंै। लेखकों, कवियों, कलमकारों व विद्वानों के प्रति उनका लगाव व सम्मानभाव जगजाहिर है। वे गीतों के ऋषि कहे जाने वाले गोपाल दास “नीरज“, शायर कुंवर जावेद, वरिष्ठ पत्रकार कोट्टम विक्रम राव से लेकर साहित्य के नवांकुरों के भी प्रिय-पात्र अपने साहित्य-प्रेम के कारण ही हैं। सन्दर्भवश एक घटना बताता बढूं लखनऊ महोत्सव 2017 के कवि समेलन में शिवपाल जी को बतौर मुख्य अतिथि बुलाया गया था। कार्यक्रम यह बना कि वे सांयकाल 7 बजे से 10 बजे मध्यरात्रि तक कवि-सममेलन में सम्मिलित होंगे क्योंकि उन्हें ही दीप प्रज्जवलित कर काव्य गोष्ठी का शुभारम्भ करना था। ठीक 6 बजे 7 कालीदास मार्ग से हम लोग निकले, कार्यक्रम तय हुआ कि 6 से 7 बजे बैडमिन्टन अकादमी परिसर में पार्टी के कोषाध्यक्ष व बुजुर्ग नेता पंडित राजकिशोर मिश्र के पुत्र की शादी के रिसेप्शन में रहेंगे, आयोजकों ने मंत्री जी से 2 घंटे बाद आने का आग्रह किया क्योंकि बुजुर्ग कवि नहीं आ पाये थे। हम लोग वापस आवास आ गए। ठीक 9 बजे कवि सममेलन के लिए प्रस्थान किया। तत्कालीन विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय व काबीना मंत्री बलराम यादव भी साथ थे। कवि सममेलन 10 बजे प्रारम्भ हुआ, शिवपाल जी ने अपने भाषण में केन्द्र सरकार से कवियों और शायरों को भी भारत रत्न देने की मांग की। उन्होंने बाकायदा “कारवां गुजर गया“ जैसी कालजयी रचना लिखने वाले 93 वर्षीय कवि गोपाल दास नीरज का नाम “भारत-रत्न“ सम्मान के लिए प्रस्तावित किया, न केवल मंचस्थ कवियों एवं साहित्यकारों अपितु पंडाल में स्थित हजारों सुधी श्रोताओं तथा साहित्यप्रेमियों ने करतल ध्वनि से शिवपाल जी के इस प्रस्ताव का स्वागत व समर्थन किया। रेखांकित करने योग्य तथ्य है कि 1954 से “भारत रत्न“ विभूषण दिया जा रहा है, लेकिन अभी तक हिन्दी व उर्दू के किसी भी साहित्यकार को नहीं दिया गया। इस विसंगति से यकीनन तुलसी, सूर, कबीर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, गालिब, मीर, जज़्बी, मोमिन, कैफी समेत महान कवियों व कलाकारों की आत्मा दुःखी होगी।
लगभग 12 बजे के करीब मैंने उनसे पूछा कि कब तक कविता सुनेंगे, उन्होंने कहा बालकवि वैरागी को सुन कर ही चलेंगे। सुबह तीन बजे तक कविता चली, वे सुबह तक बैठे रहे। ईश्वर जाने कब सोए होंगे और दिल्ली जाने की तैयारी की होगी। समाचार चैनलों से पता चला कि प्रातः काल 10 बजे तक वो दिल्ली धरना स्थल पर पहुँच चुके थे। उनके जीवटता की जितनी तारीफ की जाये कम है। ऐसा नहीं कि उनका लगाव सिर्फ कविता के प्रति है। मार्च 09, 2013 को प्रेस क्लब में तकरीबन 11 बजे पत्रकार व लोकतंत्र सेनानी के० विक्रम राव की पुस्तक का विमोचन होना था, कार्यक्रम में पद्मश्री गिरीराज किशोर व जनसत्ता के संपादक ओम थानवी को आना था। उस दिन पूरे प्रदेश का सियासी तापमान काफी ऊँचा था, वह आरोहारोव का दिन था। किसी को उममीद नहीं थी कि मंत्री जी उस कार्यक्रम में आ पायेंगे। मैं स्वयं ऊहापोह में था कि विमोचन समारोह में जाऊँ या न जाऊँ, न जाता तो वचनभंग का अपराधी होता और राव साहब की नाराजगी का खतरा अलग। जाता तो लोग शिवपाल जी को पूछते, वे सुबह नौ बजे से गहन बैठकों के लिए निकल चुके थे, उनके निजी सचिव व निकटस्थ सहयोगी श्री एस०एन० सिंह भी कुछ बता पाने में असमर्थ थे कि मंत्री जी पुस्तक विमोचन व गोष्ठी में शामिल हो पायेंगे या नहीं। मैं पौने ग्यारह बजे प्रेस क्लब पहुंच गया, आयोजकों ने मंत्री जी आमदगी के बारे में पूछा तो मैंने गोल मटोल जवाब देकर टाल दिया। ठीक 11 बजकर 5 मिनट पर देखा कि हलचल बढ़ गई और अपनी चिर-परिचित मनोहरी मुस्कान के साथ वे प्रेस क्लब में आ रहे हैं। आते ही उन्होंने सबका अभिवादन किया, आयोजकों ने उन्हें सीधे मंच पर बैठ दिया, जैसे ही उनकी नज़र दर्शक दीर्घा में बैठे एक बुजुर्ग पर पड़ी वे उठकर नीचे आ गये पैर छूकर उनका आशीर्वाद लिया फिर मंचासीन हुए। विमोचन समारोह में उन्होंने एक पते की बात कही जिसे बाद में कई विद्वान वक्ताओं ने उद्धरित किया कि पहले अखबार कम पन्नों के होते थे, तब उनमें पठनीय सामग्री अधिक होती थी, लोग पूछते थे ‘आज का अखबार पढ़ा?’ अब कई पन्नों के अखबार प्रकाशित होते हैं, फिर भी उन्हें पढ़ने में समय नहीं लगता है, कहा जाता है कि ‘आज का अखबार देख लिया’। दरअसल यह उनका अनुभवाश्रित निष्कर्ष था। पुस्तक मेले वाला वाकया भी इससे मिलता जुलता है। उपन्यासकार रोशन प्रेमयोगी के उपन्यास “आजादी टूटी-फूटी का“ विमोचन 24 सितम्बर, 2014 को लखनऊ पुस्तक मेले में होना था, इस उपन्यास में उन्होंने लोहिया को भी पात्र बनाकर दर्शाया है कि लखनऊ में यदि आज लोहिया होते तो वर्तमान परिप्रेक्ष्य को किस नजरिए से देखते और क्या सोचते। विमोचन के दौरान गोष्ठी भी होनी थी। अमेरिका के प्रो० राजा वशिष्ठ, हिन्दी के समालोचक वीरेन्द्र यादव के साथ-साथ लोहिया के शिष्य के०सी० मिश्र जी ने अपने विचार रखे। शिवपाल जी ने बड़े गौर से सबकी बातें सुनी। जब बोलने की उनकी बारी आई तो बड़ी विनम्रता से स्वीकार किया कि लोहिया के साथ काम किये और “रामायण मेला“ लगवाने वाले मिश्रा जी की मौजूदगी में लोहिया व समाजवाद मथा वीरेन्द्र की उपस्थिति में साहित्य पर उनका बोलना उचित नहीं इनसे सीखने आया हूँ, सीखने दीजिए। कार्यक्रम समाप्त होने के पश्चात् वहाँ उपस्थित सभी साहित्यानुरागियों से मिले और पूरे तीन घण्टे पुस्तक मेले का भ्रमण किया। यहाँ एक मजेदार घटना घटी, कि वे टहलते हुए सम्यक प्रकाशन के स्टाल पर पहुँच गये, वहाँ दलित व अम्बेडकर साहित्य के अलावा मान्यवर कांशीराम की भी पुस्तक थी। स्टाल पर बैठा एक लड़का दोनों पुस्तके छुपाने लगा, तो मंत्रीजी ने उसे टोकते हुए कहा कि पुस्तकों को छुपाना नहीं चाहिए। मेला घूमते समय एक पत्रकार सामने पड़ गए, उन्होंने पूछा कि शिवपाल जी आप पुस्तक मेले में क्या कर रहे हैं? मुस्कुराते हुए उन्होंने प्रत्युत्तर दिया कि जो आप कर रहे हैं। फिर सहजता से पत्रकार से पूछा कि पुस्तक मेला में कोई क्या करने आता है। पत्रकार ने कहा कि पुस्तकें खरीदनें, उन्होंने हँसते हुए पुनः उत्तर दिया कि वही कर रहा हूँ। पत्रकार महोदय कि मंशा शिवपाल जी को घेरने की थी, शिवपाल जी उनके वाग्जाल में फँसे बिना निकल गए। दूसरे दिन एक अखबार ने खबर छापी और शीर्षक दिया “मेले में शिवपाल“ इस खबर की सब हेड थी “शिवपाल ने मेला देखा और मेले ने शिवपाल को।“
मैंने शिवपाल जी का यही पुस्तक प्रेम ऋषिकेश में पत्रकारों के राष्ट्रीय सम्मेलन में भी देखा था। जब पत्रकारों के अखिल भारतीय सम्मेलन में निकलते समय उनकी नजर वाणी प्रकाशन ज्यादातर समाजवादी साहित्य को प्रकाशित करता है, “लोहिया समग्र“ भी इसी प्रकाशन ने निकाला है, जो आठ खण्डों में है, इसका संपादन मस्तराम कपूर ने किया है। वाणी के स्टाल पर उन्होंने लोहिया, लिमए, रविराय द्वारा लिखी पुस्तकें खरीदी। अपने सरकारी आवास के लाॅन में उन्होंने एक झोपड़ी बना रखी थी, जिसमें छोटी सी लाइब्रेरी स्थापित थी। हालांकि सार्वजनिक मंचों से और निजी बातचीत में भी वे कई बार स्वीकारने से जरा भी नहीं हिचकते कि रोज की व्यस्तता, अस्त-व्यस्तता तथा काम का अतिरिक्त बोझ पढ़ने-लिखने का अवसर नहीं देता। ऐसी कई घटनाएं व दृश्य मेरी स्मृतियों की सीपी में मोती बन पल रही हैं जो शिवपाल के साहित्यानुराग, पुस्तक प्रेम व कवियों तथा लेखकों के प्रति सम्मान भाव को प्रदर्शित करती है। मेरे प्रति उनके अतिरिक्त स्नेह और मेरा उनके प्रति अतिरंजित सम्मान का कारण पुस्तकों एवं अध्ययन के प्रति झुकाव भी है। जनेश्वर जी मुझे अक्सर किताबें खरीदने के लिए पैसे देते थे क्योंकि वे मेरा फक्कड़ स्वभाव जानते थे और जानते थे कि मैं कभी धनार्जन व अर्थ संचय के चक्कर में नहीं पड़ा। यदि कहीं से पैसे आ गए तो अपने अत्यधिक गरीब व जरूरतमंद साथियों में बांटकर खत्म कर देता हूँ, कई किताबे पढ़ने की इच्छा रखने के बावजूद मैं इसलिए नहीं पढ़ सका क्योंकि उन्हें खरीदने की कीमत नहीं जुटा पाया। “लोहिया समग्र“ खरीदने की इच्छा मेरे मन में 2010 से थी, इसकी कीमत 6300 रुपये मैं एक मुश्त नहीं जुटा पाया। जब जुटाता तो कोई न कोई अपरिहार्य खर्च अड़चन बनकर आ जाता। एक बार यूनीवर्सल बुक डिपो में पूरा सेट पैक करवा चुका था, पैसे देने के लिए पर्स तक निकाल लिया तभी फोन की घण्टी बजी, स्क्रीन पर देखा तो कन्नौज के रिंकू यादव का फोन था, उधर से वह बोलने की बजाय रो रहा था, रोते हुए ही बताया कि उसके पिता का देहांत हो गया है और लाश गाड़ी वाला 4 हजार रुपये माँग रहा है। फोन से बात करते-करते मैं बाहर आया और साथ गए देवी प्रसाद यादव की मोटर साइकिल पर बैठकर सीधे पी०जी०आई० की ओर चल दिया। वहाँ रिंकू को पैसे दिए, उसके पिता को अंतिम प्रणाम किया, जब भी मैं कन्नौज जाता उसके पिता मुझे खूब खिलाते-पिलाते थे। पिलाने का अभिप्राय दूध व मट्ठा पिलाने से है। जब विदा करते तो पैर छूकर कभी 51 कभी 21 रुपये जरूर देते थे। मैं रोकता कि बाबा आप बुजुर्ग हो पैर न छुआ करे तो डपटने लगते और मुझे “ब्राहमण देवता“ कहते। उनकी यादें आँख भिगो गई, रोते हुए रिंकू को मैंने अपनत्व मिश्रित डाँट पिलाई कि तुम्ही धीरज खो बैठोगे तो घर को कौन सम्भालेगा? उससे यह भी कहा कि कहीं समाजवादी रोते हैं? पार्थिव शरीर को विदा करने के बाद मैं पी०जी०आई० से निवास पहुंचने तक रोता रहा। सच कहूं तो समाजवादी ही रोता है पर उसकी आँखों में आंसू भी दूसरे के दर्द में बहे आँसू होते हैं।
“पत्थर मुझे कहता है, मेरा चाहने वाला,
मैं मोम हूँ उसने मुझे छूकर नहीं देखा,
यह शोहरत मुझे कोई विरासत में मिली है,
तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा।“
निःसंदेह समाजवाद का पथ कंटककीर्ण होता है तो इस पथ पर चलने वाले पथिकों का बिस्तर भी कांटों भरा होता है। मजे की बात है कि इस राह व सेज का चयन वह स्वयं करता है। यही समाजवादियों की गौरवगाथा है।
उस समय “लोहिया समग्र“ खरीद तो नहीं पाया, लेकिन इस समय मेरे पास उसका दो सेट उपलब्ध है। एक मेरे जन्मदिन पर शिवपाल जी ने भेंट किया था, दूसरा प्रकाशक ने स्पेसीमैन काॅपी भिजवाया था। किताबों, कलमकारों और विद्वानों के प्रति उनका सम्मान भाव देखकर ही गोपाल दास नीरज उन्हें “ऋषि“ कहा था। नीरज ने यह संज्ञा या उपाधि उत्तर प्रदेश के कद्दावर काबीना मंत्री के लिए नहीं अपितु ऋषित्व के गुणों के पोषक व प्रशंसक परोपकारी शिवपाल जी के लिए दी थी। वे 23 दिसम्बर चैधरी चरण सिंह जयंती के दिन हर वर्ष बिना नागा कवि सम्मेलन कराते हैं। उनका फोन देश-प्रदेश के कवियों व साहित्यकारों की निर्देशिका है। भारत ही नहीं नेपाल, मारीशस, लंका तक के साहित्यकार व कलमकार शिवपाल के और शिवपाल उनके मुरीद हैं। मारीशस के मैथिली शरण गुप्त कहे जाने वाले लेखक, विद्वान प्रहलाद रामशरण जब भारत आए तो उन्होंने शिवपाल जी से मिलने की इच्छा व्यक्त की, शिवपाल जी ने भी उनका अपने आवास पर स्वागत किया। रामशरण जी ने उन्हें “इन्द्रधनुष“ की प्रतियाँ और महात्मा गाँधी पर आधारित स्व-लिखित पुस्तक तो शिवपाल जी ने उन्हें लोहिया व समाजवादी साहित्य भेंट किया। “इन्द्रधनुष“ एक मात्र वैचारिक पत्रिका है जो हिन्दी, फ्रेंच व अंग्रेजी में निकलती है, रामशरण जी महात्मा गांधी, अरविन्द घोष व पंडित नेहरू पर विशेषांक निकाल चुके है, जिसकी प्रतियां उन्होंने शिवपाल जी को दी, उनका अवलोकन कर मंत्री जी ने एक अंक लोहिया पर भी निकालने का आग्रह किया। मुझे पता चला है कि शीघ्र ही मारीशस से लोहिया पर विशेषांक प्रकाशित करने की तैयारी चल रही है। नेपाल के विद्वान प्रो० बराल व उद्धव, जर्मनी की क्रिस्टीना, भूटान के उग्येन, लंका के प्रो० इन्द्रजीत, स्विटजरलैण्ड के वान ऐश्च, इंग्लैण्ड के जाॅन ग्रमिट जैसे अनेकानेक कलमनवीस जिनसे शिवपाल जी का रोज का राब्ता है। यदि लिम्का बुक आॅफ रिकार्ड वाले ऐसी कोई सूची बनायें तो सबसे अधिक कवि सम्मेलन व मुशायरों में भाग लेने वाले और कवियों के प्रिय राजनेता शिवपाल सिंह का नाम उनकी सूची में दर्ज होगा।
शिवपाल को करीब से जानने वाले लोग जानते हैं कि उन्हें बुजुर्गों के पास बैठने और उनकी बातों से सीखने का अमल है। मैंने तो देखा है कि पार्टी के जितने भी बुजुर्ग नेता बदरी विशाल पित्ती, जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह, ब्रजभूषण तिवारी, रमाशंकर कौशिक आदि को कोई बात कहनी होती थी तो वे शिवपाल को तलाशते थे। रामशरण दास जी के साथ उन्होंने वे प्रदेश कार्यसमिति में पहले प्रमुख महासचिव फिर कार्यकारी अध्यक्ष के रूप में लगभग एक दशक तक कार्य किया शायद ही उन्होंने कभी दास जी की अवज्ञा की हो। महाराष्ट्र के गृहमंत्री रहे पुराने समाजवादी नेता भाई बैद्य के शब्दों में “बुजुर्गों को इतना सम्मान देने वाला नेता मैंने नहीं देखा, इनके सहजता कि मैं प्रशंसा करता हूँ।“ महापुरुषों के प्रति उनका सम्मान किसी उल्लेख का मोहताज नहीं है। मुझे भली-भाँति याद है, मार्च 2011 में मैंने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन के सेनानियों चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू आदि से संबंधित पुस्तकें पढ़ना शुरू किया। मुझे यह जानने में ज्यादा दिलचस्पी थी कि क्यों चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह ने अपने 8 सितम्बर 1928 को अपने संगठन हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन में सोशलिस्ट (समाजवादी) शब्द जोड़ा। इसी दरम्यान समाजवादी पार्टी ने 7-8-9 मार्च 2011 को प्रदेश बचाओ आन्दोलन की घोषणा कर दी। मुझे कसमण्डा अपार्टमेंट्स से 06 तारीख की रात को हजरतगंज पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। रात भर बदबू भरे हवालात में रखने के बाद सुबह जेल भेज दिया। सर्द रात से बचाव के लिए बिछौने के नाम पर अखबार और ओढ़ने के लिए जो कम्बल दिया गया था, उसे ओढ़ने के बाद सांस लेना मुश्किल था क्योंकि सांस लेने के बाद आक्सीजन के साथ-साथ धूल के सूक्ष्म कण और बदबू भी फेफ़ड़ों को परेशान करने पहुंच जाते थे। सांस लेना तक दुश्वार था। हवालात में पूरी रात चन्द्रशेखर आजाद पर केन्द्रित उपन्यास “अग्निपुंज“ पढ़ने में गुज़र गई। उपन्यास पढ़ते समय एहसास-ए-कमतरी आ गई कि मेरी जानकारी बहुत कम है, इस हीन-भाव को मैंने अपनी सहनशीलता व जीवटता के इस एहसास से बराबर किया कि मैं भी आंदोलन की सफलता के असहनीय यातनाएं सह सकता हूँ। 7 मार्च शिवपाल जी लखनऊ आन्दोलन की अगुवाई करते हुए गिरफ्तार हुए। 7 तारीख की शाम को मुझे लगा कि जेल समाजवादियों के दफ्तर या शिविर में तब्दील हो चुका है। जिससे हृदय का संबंध होता है उसकी उपस्थिति से सुखद कुछ भी नहीं होता, 6 की रात जो जेल नरकनुमा या भुतही हवेली जैसी लगता था, 7 की रात को वही कारागार स्वर्गिक सुख देने लगा। शिवपाल जी भोजन के बाद सभी के बैरक में घूमे और कार्यकर्ताओं का हाल-चाल पूछा। शिवपाल जी उस समय उत्तर प्रदेश के नेता प्रतिपक्ष थे, लेकिन जेल में जिस सहजता के साथ सबसे मिल रहे थे, लेकिन जेल में जिस सहजता के साथ सबसे मिल रहे थे, लग ही नहीं रहा था कि इतने उच्च पदस्थ व्यक्ति हैं। एक सोनू नाम का लड़का अपनी माँ की दवा लेने के लिए घर से निकला था, पुलिस उसे भी आन्दोलनकारी व समाजवादी बनाकर हवालात में उठा लाई, उसका रो-रो कर बुरा हाल था। मैंने उसे शिवपाल जी से मिलवाया, उन्होंने बड़े प्यार से उसके सर हाथ फेरा और दवा तथा दवा की पर्ची ली, ढांढस बंधाया तथा माँ के इलाज की जिम्मेदारी ली। शिवपाल जी के समझाने का तरीका कारगर साबित हुआ, या रोते-रोते सोनू के आंसू सूख चुके थे, कारण जो भी हो सोनू के चेहरे पर सकूँ के भाव हम लोगों ने कई घंटों के बाद देखे। शाम को जेलर अथवा डिप्टी जेलर शिवपाल जी के पास आए और बतलाया कि उनके प्रोटोकाल तथा कद के हिसाब से अलग व्यवस्था की गई है, लेकिन उन्होंने स्पष्ट शब्दों में मना कर दिया और वे वहीं जमीन पर लेटे जहाँ सभी कार्यकर्ताओं की व्यवस्था थी। मुझे करीब आठ बजे अपने पास बुलाया और खाना वगैरह पूछने के बाद मेरे हाथ से किताब लेकर पन्ने पलटने लगे। पुस्तक की कोई पंक्ति उन्हें अच्छी लगी तो बगल में बैठे एक व्यक्ति को भी पढ़ाया। पुस्तक मुझे लौटाते हुए बोले पूरा पढ़ लेना तो मुझे भी बताना इसमें क्या खास बात है। मुझे लगा कि वे पूरी पुस्तक पढ़ना चाहते हैं, उस पुस्तक में लिखी हुई जानकारियों को जानना चाहते है लेकिन भीड़ और अन्य व्यस्तताओं के कारण ऐसा नहीं कर पा रहे। सुबह मैंने उन्हें बताया कि रात में पूरी पुस्तक पढ़ ली। उन्होंने आजाद के संस्मरण बड़े चाव से सुने। मेरे मन में आया कि जेल में गोष्ठी तो हो ही सकती है। मैंने मंत्री जी से जैसे ही गोष्ठी कराने का आग्रह किया, वहाँ कई लोगों ने मेरी बात काट दी। दोपहर के भोजन के बाद सभी ने दो तीन घण्टे आराम किया। नींद तो किसी को आई नहीं होगी, ज्यादातर लोग गप्पबाजी में मशरूफ़ दिखे। लगभग तीन बजे करीब एक साथी ने मुझे बताया कि शिवपाल जी बुला रहे हैं। उनके बैरक में पहुंचा तो देखा कि जमीन पर फल, बिस्कुट, मिठाई सजी हुई है, लोग खा रहे हैं और बहस अपने उरूज पर है। मुझे शिवपाल जी ने सेब खाने को दिया और पूछा कि गोष्ठी का क्या हुआ? मैंने कहा कि आपने स्पष्ट निर्देश नहीं दिया, मुझे लगा कि गोष्ठी का औचित्य नहीं है इसलिए...... मेरी बात समाप्त भी नहीं हुई कि बाबू भगवती सिंह ने कहा कि सबको बुला लीजिए, गोष्ठी में कितना समय लगता है। दो प्लास्टिक कुर्सी लग गई, बैरक के मैदान में दरी बिछ गई। तय हुआ कि विषय प्रवर्तन मैं करूंगा, मुख्य अतिथि शिवपाल सिंह यादव जी होंगे और अध्यक्षता बाबू भगवती सिंह जी करेंगे। बाकायदा कुर्सियों पर मुख्य अतिथि और अध्यक्ष महोदय बैठे, दोनों का स्वागत गेंदे का फूल देकर किया गया, वहां और कुछ तो था नहीं। गोष्ठी के दौरान मकबूल शायर मंजर भोपाली साहब आ गए, उनसे कुछ सुनाने का आग्रह हुआ, उन्होंने तरन्नुम में दो तीन गज़ल सुनाई, एक गज़ल के मतले के शेर पर बड़ी ताली बजी
“हमने ये बात बुजुर्गों से सुनी है मंजर
जुल्म ढायेगी तो ये सरकार भी गिर जायेगी।“
मकते के शेर का अभिप्राय उस शेर होता है जिसमेें शायर अपने नाम का उल्लेख करता है। मंजर साहब ने गोष्ठी का मंजर ही बदल दिया, पूरा माहौल शायराना हो गया। बुजुर्गों के हवाले से जो बात मंजर साहब ने कही थी, वह बाद में सही साबित हुई, बहुमत की मायावती सरकार बहुमत के साथ ही चली गई, 15 मार्च 2012 को समाजवादी सरकार ने शपथग्रहण किया। अखिलेश यादव प्रदेश के बीसवें मुख्यमंत्री बने तथा सोलहवीं विधानसभा में सपा बहुमत से आई। मंजर साहब की शायरी के बाद मेरा भाषण हुआ पूरे भाषण का उल्लेख मैं अपनी पुस्तक “सितम के और चार दिन“ में कर चुका हूँ। अपने जेल उद्बोधन की कुछ बातें जरूर दोहराना चाहूंगा,
- क) भारतीय समाजवादियों का जेल से गहरा रिश्ता है, प्रथम समाजवादी संगठन हिन्दुस्तान सोशलिस्ट एसोसिएशन के सभी पदाधिकारी (चन्द्रशेखर आजाद को छोड़कर) जेल से ही महाप्रयाण को गए। दूसरे समाजवादी संगठन कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी की नींव 1934 में नासिक जेल में रखी गयी थी। सीएसपी को समाजवादी पार्टी की मातृ संस्था की संज्ञा दिया जाय तो गलत न होगा।
- ख) माया सरकार की पुलिस ने क्रूरता में लार्ड मेयो की पुलिस को पीछे छोड़ दिया था, थाने तक में बलात्कार होने लगे थे।
- ग) मनमोहन सरकार की आर्थिक नीतियों की बदौलत देश में ऋणग्रस्ता बढ़ी है और बसपा के भ्रष्टाचार के नाते उत्तर प्रदेश में प्रतिव्यक्ति कर्ज 10255 रुपये हो गया है।
- घ) हजारों योग्य व्यक्तियों की मृत्यु से भी देश व समाज का उतना नुकसान नहीं होता है जितना एक अयोग्य व्यक्ति के सत्तासीन होने से होता है।
मंजर साहब ने वातावरण शायराना बना दिया था इसलिए मैंने भी कुछ अशआर उद्धरित किए जो इस प्रकार हैं .........
“ये गम के और चार दिन, सितम के और चार दिन,
ये दिन भी जायेंगे गुजर, गुजर गए हजार दिन।।
गिरेंगे जुल्म के महल, बनेंगे फिर नवीन घर,
तू जिन्दगी की जीत में यकीन कर,
अगर कहीं पे स्वर्ग है उतार ला जमीन पर।“
“तोड़ शोषकों के मनसूबे गिन न दिनों की घड़ियाँ।
बुला रही हैं तुझे देश की कोटि-कोटि झोपड़ियाँ।।“
शिवपाल जी यदि व्यक्तिगत अभिरूचि न लेते तो यह गोष्ठी सम्भव नहीं था। सारे बड़े नेताओं के जेल में होने से 9 मार्च को आन्दोलन की कमान अखिलेश जी ने संभाली। पुलिस की तगड़ी बैरिकेटिंग समाजवादियों को घरों से निकलने से ही नहीं रोक सकी और प्रताणना के भय की बेड़ी पूरे प्रदेश में अघोषित आपातकाल जैसी स्थिति थी। अखिलेश जी भी लखनऊ में गिरफ्तार हुए। प्रदेश के कारागारों में जगह नहीं बची लखनऊ का जेल तो पूरी तरह से भर चुका था। समाजवादियों ने “न दैन्यम्, न पलायनम्“ को चरितार्थ कर दिया। शाम पाँच बजे जेल प्रशासन ने पहले गिरफ्तार सत्याग्रहियों को रिहा करने को कहा, लेकिन 9 मार्च को गिरफ्तार लोगों के छोड़ने को लेकर अनिर्णय की स्थिति थी। तकनीकि कारणों से उन्हें छोड़ा नहीं जा सकता था। शिवपाल जी ने संशयावस्था का पटाक्षेप यह कह कर दिया कि कोई जेल से बाहर कदम नहीं रखेगा, जेल से सभी साथ छूटेंगे या सभी जेल में ही रहेंगे। सोनू से मैंने कहा तुम तो घर चले जाओ, माँ बीमार है, अब तक मजबूरी थी, अब तो रिहा हो, तुम न तो समाजवादी हो न ही आन्दोलनकारी हो......। प्रत्याशा के प्रतिकूल सोनू ने कहा कि सबके साथ ही जेल से बाहर जाऊँगा। जब जेल आया था तब समाजवादी नहीं था अब पक्का समाजवादी हो गया हूँ।
एक दिन शिवपाल जी से मिलने स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनरेश कुशवाहा आए। बातचीत के दौरान स्वतंत्रता संग्राम व समाजवादी आंदोलन का उल्लेख आया। सुयोग से मैं भी उपस्थित था, बात यह 10 मई 2013 की है, 10 मई को ही 1857 में प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की शुरूआत हुई थी। भगत सिंह के संपादन में अप्रैल 1928 के “किरती“ अंक में “दस मई का शुभ दिन“ के शीर्षक से लेख छपा था जिसका केन्द्रीय मूल विचार यह था कि हर भारतीय को 10 मई को पर्व की तरह मनाना चाहिए। इसी लेख से पता चलता है कि 1907 में बैरिस्टर सावरकर की पहल पर इंग्लैण्ड में “अभिनव भारत“ संगठन ने 10 मई को त्योहार की तरह मनाया था। छोटे-छोटे पैम्पलेट “ओ-शहीदों“ शीर्षक से छपवा कर भारत व यूनाइटेड किंगडम में बांटा गया था। यही नहीं कैम्ब्रिज आक्सफोर्ड जैसे विश्वविद्यालय में भारतीय अपने सीने पर “1857 के शहीदों के इज़्ज़त के लिए“ लिखा बैज पहन कर अपने क्लासों में गए। रामनरेश कुशवाहा जी के समक्ष 10 मई मनाने का प्रस्ताव रखा गया, वे अति प्रसन्न हुए। शिवपाल जी के मन में पीड़ा थी कि नई पीढ़ी के समाजवादी चन्द्रशेखर आजाद के समाजवादी पक्ष के बारे में नहीं जानते। उन्हें महान इतिहास से अवगत कराने के लिए तय हुआ कि 23 जुलाई को चन्द्रशेखर आजाद की जयंती मनाई जायेगी। 23 जुलाई 2011 समाजवादी पार्टी दफ्तर में शिवपाल जी के संरक्षण में आजाद व लोकमान्य तिलक जयंती भव्य तरीके से मनाई गई। इस कार्यक्रम में पूर्व सांसद, प्रतिबद्ध समाजवादी एवं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामनरेश कुशवाहा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जयसिंह, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोविन्द प्रसाद द्विवेदी समेत 8 आजादी के योद्धाओं का सम्मान किया गया। जयसिंह जी तो सम्मान पाने के बाद प्रसन्नता से रोने लगे। एक स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को उठने में दिक्कत हो रही थी, उनका नाम संचालक द्वारा पुकारे जाने पर दो कार्यकर्ता साथी उन्हें उठाने लगे तो शिवपाल जी उनके पास उठ कर आए, सम्मान पत्र दिया और पैर छुआ। भावविह्वल बुजुर्ग आशीर्वाद स्वरूप पीठ पर हाथ थपथपाने लगे, हाथ कभी पीठ पर लगता तो कभी सर पर, शिवपाल जी स्नेहासिक्त “चोट“ तब तक खाते रहे जब तक उनके हाथ खुद नहीं रुके। तिलक जयन्ती को “उपनिवेशवाद विरोधी दिवस“ मनाया गया था, इस दिन भारत को वीटो पावर और हिन्दी को संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा का दर्जा दिलाने के लिए “पत्र लिखो“ व हस्ताक्षर अभियान चलाने का निर्णय लिया गया। कितनी बड़ी विडम्बना है कि दुनिया के दूसरे सबसे बड़े देश और तीसरी सबसे बड़ी भाषा संयुक्त राष्ट्र संघ में अपने अधिकार से वंचित है। 20वीं सदी के सैन्य और राजनीतिक उननिवेशवाद का स्थान 21वीं सदी में सांस्कृतिक व आर्थिक उपनिवेशवाद ने ले लिया है। एक और संकल्प लिया गया कि तिलक मार्ग का नाम दोबारा लोकमान्य तिलक के नाम पर कराने के लिए भी स्थानीय स्तर पर हस्ताक्षर अभियान चलाया जायगा। लखनऊ में जहाँ पुलिस निदेशालय और महानिदेशक का आवास है, उस सड़क का नाम तिलक मार्ग था, उसे बी०एन० लहरी मार्ग कर दिया गया। हमें लगा कि पता करना चाहिए कि लहरी कौन हैं? क्या तिलक से भी अधिक महान थे? पता चला कि बी०एन० लहरी का पूरा नाम विश्वनाथ लहरी था। वे आजादी के बाद उत्तर प्रदेश के पहले पुलिस महानिदेशक (आई०जी०) बने, तब डीजीपी का पद नहीं होता था। 1942 का आन्दोलन कुचलने के कारण ब्रिटानियाँ हुकूमत ने उन्हें “आउट आॅफ टर्न“ पदोन्नति दी थी, अशफाक और बिस्मिल को पकड़वाने में इनका हाथ था। शिवपाल जी के शब्दों में “आजादी के नायक लोकमान्य तिलक का इससे बड़ा अपमान नहीं हो सकता कि उनका नाम मिटाकर किसी अंग्रेज सरकार के नुमाइन्दे के नाम पर लिख दिया जाये।“ 2 दिन में 20 हजार हस्ताक्षर हुए। मैं आज तक नहीं समझ पाया कि यह तिलक महाराज के सम्मान के कारण हुआ कि शिवपाल जी की अभिरुचि के कारण या हम कार्यकर्ताओं के श्रम के कारण देखा जाये तो तीनों कारण एक दूसरे पर अन्योन्याश्रित हैं। मुझे इस बात की निजी पीड़ा हमेशा रहेगी कि छोटी-छोटी बातों को बड़े मुद्दे में तब्दील करने वाली मीडिया व अखबारों ने “केसरी“ व “मराठा“ के संपादक, देश के लिए पूरा जीवन समर्पित कर देने वाले तिलक के अपमान पर दो बूंद स्याही तक नहीं खर्ची, मैंने इस पीड़ा सार्वजनिक अभिव्यक्ति पत्रकारों के ऋषिकेश व लखनऊ सम्मेलन में किया। हम समाजवादी जब तक विपक्ष में रहे खूब स्वेद बहाया और सरकार में आते ही तिलक मार्ग को दोबारा तिलक मार्ग कर दिया। शिवपाल के अलावा जिस बड़े नेता का इसमें योगदान है वे हैं आज़म खान। बतौर नगर विकास मंत्री उन्होंने स्वयं बैठकर अपने नाम आग्रह पत्र लिखवाया और 21 जुलाई 2012 को तिलक मार्ग करने करने का निर्देश जारी किया। हमारा साथ ईश्वर ने भी खूब दिया, “न ऋते श्रांतस्य सख्याय देवा“ भगवान परिश्रमी को छोड़कर अन्य की सहायता नहीं करते हैं। तिलक का अपमान करने वाली सरकार अपमानित होकर गई, जिस व्यक्ति ने यह जघन्य दुष्कृत्य किया था उसकी खोज जारी है।
अक्सर लोग कहते हैं कि नेताओं और सियासी दलों को महान पुरूषों की याद तभी आती है जब वे विपक्ष में होते हैं, सत्ता आते ही सिद्ध पुरूष और सिद्धांत दोनों स्मृति पटल पर दृष्टिगत नहीं होते। शिवपाल जी के परिप्रेक्ष्य में यह कथन गलत साबित हुआ। ऊपर वर्णित घटनाक्रम 23 जुलाई 2011 दिन का था, जब सपा विपक्ष में थी। 23 जुलाई 2012 को सपा सरकार में आ चुकी थी, शिवपाल जी प्रदेश के मंत्री बन चुके थे। पार्टी दफ्तर के उसी हाल में एक बार पुनः आजाद व तिलक की जयंती आयोजित की गई। उसी दिन कैबिनेट बैठक भी पड़ गई। ज्यादातर लोगों का मत था कि शिवपाल नहीं आ पायेंगे क्योंकि कैबिनेट बैठक में उस दिन सिंचाई व लोक निर्माण विभाग की महत्वपूर्ण योजनाओं पर निर्णय होना था। कैबिनेट नोट फिर उसकी ब्रीफ़िंग, उसके बाद मीटिंग ऐसे में 10 बजे आजाद तिलक जयंती मनाने शिवपाल जी कैसे आ पायेंगे? यह सोचकर मैंने भी उन पर दबाव नहीं डाला। उन्होंने कहा कि 09.00 बजे कार्यक्रम शुरू करवा दीजिएगा। 9 बजे तक हम लोग पार्टी दफ्तर पहुंच गए, माला-फूल, आजाद-तिलक से जुड़े साहित्य वगैरह व्यवस्थित करने में साढ़े नौ बज गए। मंत्री जी के आवास पर फोन किया तो पता चला कि 05.00 बजे से ही वे फाइले निपटा रहे हैं, सात बजे से प्रमुख सचिवों से ब्रीफ हुए अभी-अभी कहीं गए हैं। फोन से बात हो ही रही थी कि सामने शिवपाल जी को आते देखा। “आजाद-तिलक अमर रहें“, “मुलायम-शिवपाल जिन्दाबाद“, “समाजवाद जिन्दाबाद“, “तिलक तेरे अरमानों को मंजिल तक पहुंचायेंगे“ जैसे नारों से पार्टी दफ्तर का कोना-कोना गूँज उठा।
शिवपाल जी ने बाकायद स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को सम्मानित किया, भाषण दिया और संगोष्ठी को सफलता के शिखर पर पहुंचा कर कैबिनेट मीटिंग के लिए प्रस्थान कर गए। शहीदों की स्मृति में लगे इस जमावड़े व मेले को देखकर पंडित रामप्रसाद बिस्मिल और अशफाक उल्ला खान की आत्मा को जरूर अच्छा लग रहा होगा जो अपने हाथ-पैर में लगी बेड़ियों को बजा-बजा कर गाते थे-
“शहीदों की चिताओं पर लगेंगे हर बरस मेले,
वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशां होगा।“
श्री शिवपाल जी की सदैव कोशिश रहती है कि नई पीढ़ी राष्ट्रनायकों और महापुरूषों के बारे में जाने। महानायकों की जयंती व पुण्यतिथि पर गोष्ठी, बैठक, उनकी प्रतिमा पर माल्यार्पण आदि के अलावा अखबारों और पत्रिकाओं में लेख लिखकर प्रकाशित करवा कर वितरित भी करते हैं ताकि नई पीढ़ी उनके त्याग व योगदान से अवगत होवे और प्रेरणा ले। चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, महात्मा गाँधी, राम मनोहर लोहिया, लोकनायक जयप्रकाश ही नहीं बाबू कपिलदेव सिंह, जनेश्वर मिश्र, बृजभूषण तिवारी, रामशरण दास पर भी उन्होंने लिखा। चैधरी चरण सिंह का अर्थशास्त्री वाला पक्ष छूट गया था, मेरी जिम्मेदारी लेख को टाइप कराकर अखबारों को मेल करने की होती है। रात 11 बजे उन्होंने फोन करके कहा यदि अखबारों में न भेजा हो तो लेख में एक पंक्ति बढ़ा दीजिए कि चरण सिंह जितने बड़े राजनेता थे उतने ही बड़े अर्थशास्त्री थे। लेख अखबारों को भेजा जा चुका था फिर भी परिवर्द्धित कर अखबारों ने अपने संपादकीय पृष्ठ में लेख को प्राथमिकता के साथ प्रकाशित किया। मोहन सिंह जी ने दिल्ली में लेख पढ़कर फोन पर आशीर्वाद और बधाई दी। मैं जब उनसे मिलने गया था तो उन्होंने मुझसे यह बात बताई और उम्मीद व्यक्त की कि उनके मरने के बाद उन्हें भी इसी तरह याद किया जायेगा। काल योग से मोहन सिंह का देहावसान 22 सितम्बर 2013 को हो गया। मैंने शिवपाल जी से मोहन सिंह जी से हुआ आखिरी संवाद बतलाया। उन्होंने मोहन सिंह जी की प्रथम पुण्यतिथि पर न केवल लेख लिखा अपितु उनके नाम पर एक पुल का भी उद्घाटन किया। मुझे शिवपाल जी की प्रत्युत्पन्नमति की भी सार्वजनिक प्रशंसा करने से गुरेज नहीं। पार्टी की प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक आहूत हुई। बैठक में प्रदेश की कार्यकारिणी के अलावा जिला व नगर इकाईयों के अध्यक्ष तथा महासचिव भी भाग लेने आए हुए थे। नेताजी ने शिवपाल सिंह जी को राजनीतिक आर्थिक प्रस्ताव रखने की जिम्मेदारी दे दी। मंच पर संशोधित प्रस्ताव की प्रतिलिपि थी जिसमें दो पैरा अधिक था लेकिन बाकियों के हाथ में मूल प्रस्ताव था जो उन्हें हस्ताक्षर करने के साथ मिली थी। शिवपाल जी ने वाचन करना शुरू किया तो कुछ पदाधिकारी शोर मचाने लगे कि उनके पास जो प्रस्ताव है उसमें इस कथन का उल्लेख नहीं है। शोर बढ़ता गया, संशोधित प्रस्ताव की दोबारा फोटोकापी होती और तब बंटती तो काफी समय लग जाता। कोलाहल के युक्त वातावरण में शिवपाल जी ने बड़ी चतुराई से पूछा कि जिनके पास संशोधित प्रस्ताव नहीं है, वो हाथ ऊपर उठायें, 60-65 लोगों ने हाथ ऊपर उठाये, उनसे उन्होंने कहा कि आप ध्यान से सुनिए, मैं माइक से संशोधित प्रस्ताव पुनः पढ़ देता हूँ, आवश्यक तथ्य अपने सादे कागज पर नोट कर लीजिए। कोलाहल शान्ति में बदल गई। उनके प्रत्युन्नमति का एक और दृष्टान्त नहीं भूल सकता। लखीमपुर के एक वकील की हत्या हो गयी थी, शिवपाल जी शोक व्यक्त करने व सांत्वना देने पहुंचे। यह वह समय था जब विधानसभा चुनाव-2012 के टिकट घोषित हो चुके थे, जिलाध्यक्ष व अन्य नेताओं ने एक गेस्ट हाउस में अलग से बैठक का कार्यक्रम बना दिया। समयाभाव के बावजूद शिवपाल जी बैठक में गए। एक नेता को टिकट नहीं मिला था, उसके 500-600 समर्थक नारेबाजी करने लगे, बीच-बीच में दरवाजा भी पीटते। जिलाध्यक्ष ने कहा कि पुलिस बुलाकर उन्हें शांत करवाता हूँ। समीप खड़े एक विधायक जी पुलिस कप्तान को फोन मिलाने लगे, शिवपाल जी ने दोनों को डपटा और बाहर शोर मचाती भीड़ में पहुंच गये। मुस्कुराते हुए सबसे बात की, उनकी बात सुनी और नेतृत्व की बात उन तक पहुंचायी। 500-600 आक्रोशित लोग और अकेले शिवपाल, मात्र दो सुरक्षाकर्मी वो थोड़ी दूर पर खड़े थे। लगभग 5 मिनट बाद रुख व रुत बदल चुका था। जो होंठ मुर्दाबाद के नारे लगा रहे थे, वो जिन्दाबाद करने लगे। सबसे ज्यादा उपद्रव करने वाला युवक सबसे ज्यादा विनम्र दिखने लगा। मैं सुना करता था शिवपाल बहुत बहादुर हैं, लेकिन उस दिन अपनी आंखों से देखा कि उनमें बहादुरी और प्रतिकूल परिस्थितियों से जूघ्ने की जीवटता कूट-कूट कर भरी हुई है। वे विपरीत हालात में बिखरने वाले नहीं अपितु और अधिक निखरने वाले नेता है यदि उस दिन वे धैर्य और साहस न दिखाते तो खूनी संघर्ष तय था। रास्ते में मैंने उनसे पूछा कि बिना किसी सुरक्षा के आप खिलाफ खड़ी भीड़ में उतर गए, कुछ हो जाता तो उन्होंने बड़े ही आत्म विश्वास से कहा कि हुआ तो नहीं कुछ, मैं ऐसी घटनाओं का आदी हूँ, यह तो सिर्फ 500-600 लोग थे, मैंने तो मरने और मारने पर उतारू हजारों लोगों की भीड़ को शांत किया है।
शिवपाल जी की देशभक्ति का मैं कायल हूँ। देश से जुड़े मुद्दों और सवालों एवं राष्ट्रीय प्रतीकों के परिप्रेक्ष्य में कभी भी उन्होंने निजी नफ़ा नुकसान नहीं देखा। 26 जनवरी 2012 की घटना है चुनावी आचार संहिता लग चुकी थी। हैवरा में चैधरी चरण सिंह डिग्री कालेज का प्रबन्धक होने के कारण शिवपाल जी हमेशा तिरंगा फहराते हैं और छात्रों व शिक्षकों को मिठाई व लड्डू बांटते हैं। इस बार भ्रम की स्थिति थी किसी ने बताया कि चुनाव आयोग का निर्देश है कि चुनाव के कारण जो प्रत्याशी हैं, वे अपने निर्वाचन क्षेत्र में तिरंगा नहीं फहरा सकेंगे। कालेज प्रशासन ने भी शिवपाल जी से यही आग्रह किया। मैं साथ में था, पहले यह तय हुआ कि प्रधानाचार्य जी झण्डा फहरायेंगे और मैं भाषण दूंगा। तिरंगा झण्डा देखते ही शिवपाल जी ने कहा कि झण्डा हर बार की तरह वे ही फहरायेंगे और तो कोई नहीं लेकिन मैंने टोका कि चुनाव आयोग का निर्देश..... इस पर वे बिना किसी हिचक के बोले “जिस झण्डे को फहराने के लिए शहीदों ने जान दे दी मैं उसके लिए विधायकी नहीं छोड़ सकता हूँ।“ उन्होंने झण्डा फहराया और भाषण भी दिया लेकिन अपने 20 मिनट के भाषण में 20 सेकेण्ड भी अपने चुनाव या वोट की बात नहीं की। वे पूरी तरह से मन बना चुका थे कि यदि चुनाव आयोग कोई नोटिस भेजेगा या तिरेगा फहराने से रोकेगा तो किसी और को चुनाव लड़ा देंगे लेकिन झण्डा की अस्मिता व सर्वोच्चता से कोई समझौता नहीं करेंगे। मैंने 20-25 साथियों को यह घटना बताई, धीरे-धीरे बात पूरे इलाके में फैल गई। शिवपाल यादव जसवन्तनगर विधानसभा का चुनाव रिकार्ड मतों से जीते। पिछले 5-6 साल से मैं देख रहा हूँ कि वे 26 जनवरी और 15 अगस्त को पूरा दिन सारे काम छोड़कर गण्तंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस ही मनाते है। 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन वे केवल भारत माँ के पुत्र होते हैं, अपने अन्य स्वरूपों यथा समाजवादी नेता, मंत्री, विधायक वाली भूमिकाओं को गौण कर देते हैं। दोनों दिन इनके भाषण सिर्फ व सिर्फ आजादी के योद्धाओं को ही समर्पित होते हैं। 15 अगस्त 2014 के दिन दिलचस्प वाकया हुआ। 15 अगस्त के भाषण की तैयारी करते हुए पता चला कि इसी दिन 1872 ई० तद्नुसार श्रवण शुक्लपक्ष एकादशी को महर्षि व महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी अरविन्द घोष का जन्म हुआ था जिन्होंने कैम्ब्रिज में पढ़ाई में पढ़ाई के दौरान “इण्डियन मजलिस“ बनाकर आजादी की लड़ाई का सिंहनाद किया, आई.सी.एस. की परीक्षा पास कर भारतीय मेधा का परचम लहराया और आई.सी.एस. का परित्याग कर भारत की त्याग परम्परा से दुनिया को अवगत कराकर देश लौटे। वे संत भी थे विद्वान भी और क्रान्तिदृष्टा भी। मंत्री जी से मैंने आग्रह किया कि 15 अगस्त के महत्व पर बोलिये मैं महर्षि अरविन्द घोष पर बोलूंगा। संगोष्ठी के बाद कवि सम्मेलन को कार्यक्रम था। भाषणोपरान्त मुझे अचानक याद आया कि महर्षि अरविन्द तो छूट ही गये। हूक सी हृदय में रह गई। मेरे बाद श्री शिवपाल जी को भाषण के लिए बुलाया गया। उन्होंने सबको धन्यवाद देते हुए कहा कि “सेतु मंत्री हैं कवियों और श्रोताओं के बीच सेतु का काम करेंगे दीवार का नहीं। अरविन्द घोष जी की आज जयंती भी है, तिरंगे के साथ-साथ सभी शहीदों विशेषकर अरविन्द घोष को नमन।“ मेरे हृदय का कांटा निकल गया।
मैंने पहले समाजवादियों और शिवपाल की उदात्त बादली परम्परा का उल्लेख किया है, एक मामले में वे समन्दर हैं, कभी सत्ता में वे अपने सार्वजनिक जीवन में कई बार सत्तासीन हुए फिर सत्ताच्युत हुए पुनः सरकार में अधिक ताकतवर होकर लौटे। लेकिन कभी मदांध नहीं हुए। उनके इस गुण से नई पीढ़ी के उन समाजवादियों को सीख लेनी चाहिए जिनका व्यवहार व चाल-चलन सतता आते ही बदल जाता है। जहाँ तक मैंने देखा है कि पहले भी एक जिप्सी और एक या दो गाड़ी से चलते थे, नेता प्रतिपक्ष थे, अब उनके बेड़े में सुरक्षाकर्मियों की एक जिप्सी और एक या दो गाड़ी से अधिक नहीं चलती और अब सरकार के कद्दावर कबीना मंत्री हैं।
“बरसात में तालाब ही हो जाते हैं कमजर्फ़,
आपसे बाहर कभी समन्दर नहीं होते।“
कोलकाता मंे आयोजित सम्मेलन में उन्होंने राजनीतिक कार्यकर्ताओं को सादगी की सी दी। नेताओं के शब्दों से ज्यादा उनके गुण व कार्य बोलते हैं। सादगी को आत्मसात करने के बाद दी गई उनकी नसीहत पर काफी चर्चा हुई मीडिया ने भी उनके सुझाव को सराहा। इसका असर भी दिखा। यह कहावत सच ही है कि कर्म की ध्वनि शब्दों से ऊँची होती है। (Action speaks louder than word.) शिवपाल जी ने पहले सादगी को अपने लोकजीवन का अपरिहार्य अंग बनाया फिर सादगी की सीख दी तो लोगों ने प्रशंसा की, अन्यथा आलोचक उनके इस कथन की कथनीयता पर ही प्रश्नचिन्ह लगा देते। यहाँ एक प्रेरक प्रसंग का उल्लेख समीचीन है, एक बार महात्मा गांधी के पास एक महिला आई उसका बेटा गुड़ बहुत खाता था, माँ चाहती थी कि उसके बेटे से बापू गुण न खाने को कहें। उसका विश्वास था कि महात्मा गांधी कसे कहने पर बेटा गुड़ खाना छोड़ देगा। बापू ने महिला को कई बार वापस लौटाया और बार-बार उससे यही कहते कि “कल कहूंगा“ । उनका कल कई दिनों तक नहीं आया। एक दिन बापू ने बच्चे से कहा कि “बेटा गुड़ खाना छोड़ दो।“ बच्चे ने वास्तव में गुड़ खाना छोड़ दिया। महिला ने बापू से पूछा कि उन्हें इतना ही कहना था तो एक महीने तक क्यों दौड़ाया, पहले बोल देते। गांधी जी ने कहा कि मैं खुद गुड़ बहुत खाता था, पहले मैंने छोड़ा फिर बच्चे से कहा, तब मेरी बात का असर हुआ।“ शिवपाल जी इस कसौटी पर गांधी के अनुयायी हैं, लोहिया गांधी की विरासत के वाहक थे, जिनके सिद्धांतों पर समाजवादी पार्टी का गठन हुआ है। सपा के संविधान में सच्ची निष्ठा और श्रद्धा है। महात्मा गांधी और राममनोहर लोहिया के आदर्शों से प्रेरणा लेकर समाजवादी पार्टी लोकतंत्र, धम-निरपेक्षता और समाजवाद में आस्था रखेगी। सुखद है कि शिवपाल कर्म व वाणी से गांधी व लोहिया के पथ पर चल रहे हैं।
सादगी के बाद वे जिस गुण को सर्वाधिक पसंद करते हैं, वह है ईमानदारी और सैद्धांतिक निष्ठा। सिद्धांतनिष्ठा और ईमानदारी भले ही दो अलग शब्द और दो अलग भाव लगते हों, लेकिन एक दूसरे के प्र्याय और पूरक है। महात्मा गांधी ने सात सामाजिक पाप गिनाए हैं, उसमें पहला सिद्धांतविहीन सियासत (राजनीति) गांधी के शब्दों में "Out of seven social dins, politics without principles is first and most remarkable" लोहिया भी मानते हैं कि बेईमानी सिर्फ रुपये पैसे की ही नहीं होती, अपितु सार्वजनिक जीवन में सिद्धांतों से भटकाव भी बेईमानी है, दसीलिए वे सिद्धांतों पर बहस चलाने पर बेहद जोर देते थे। मुझे लगता है कि शिवपाल जी से मेरी निकटता के तमाम कारणों में मेरी सादगी के साथ-साथ ईमानदारी व सैद्धांतिक प्रतिबद्धता की महत्वपूर्ण भूमिका है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में उन्होंने भ्रष्टाचार से सीधी लड़ाई मोल ली। सड़क पर सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार के खिलाफ़ 2007 से लेकर दिसम्बर 2011 तक वे लगभग 200 बार सड़क पर उतरे, धरना प्रदर्शन किया और कई बार जेल गए। “सूचना के अधिकार अधिनियम“ का भी इस्तेमाल किया। सरकार में आने के बाद उन्होंने अभियान चलाकर लोकनिर्माण व सिंचाई विभाग में लगभग 250 भ्रष्ट अभियंताओं व अधिकारियों पर कार्यवाही की। मंत्री के स्तर से यथासम्भव भ्रष्टाचार कम किया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में घोषणा की “डकैती बर्दाश्त नहीं होगी।“ उनकी घोषणा और कार्यवाही का असर भी दिखा। यह जरूर है कि वे सीधी सपाट राजनीति करते हैं। खबरों को मैनेज नहीं किया। एक दो शुभचिन्तक पत्रकारों ने भले ही अपने स्तर से “एंकर न्यूज“ बना दिया हो लेकिन शिवपाल जी ने अपने स्तर से कभी प्रयास नहीं किया, खुद की "Image branding" पर ध्यान नहीं दिया। मेरी उनसे यही निजी शिकायत है, लेकिन लोकतंत्र में कोई बात छुपती नहीं, उनकी संघर्ष क्षमता, श्रम के साथ-साथ ईमानदारी भी जेरे बहस है।
मैं शिवपाल जी के प्रारम्भिक दिनों का साथी व साक्षी नहीं हूँ, लेकिन उनके साथ बचपन बिताने वाले लोग बताते हैं कि वे बाल्यावस्था से ही काफी जुझारू और सहयोगी स्वभाव के थे। सुबह चार-पाँच बजे उठकर खेतों के काम करने के बाद एक दो घण्टे की पढ़ाई लिखाई फिर जनसेवा, यही उनकी दिनचर्या होती थी। वे खेल-कूद में अग्रणी और कुश्ती व पहलवानी में भी बड़े भाई के अनुगामी रहे हैं। समाजवादी पक्ष के बड़े नेता होने के कारण नेताजी के अन्य राज्यों और जिलों के दौरे ज्यादा लगते थे, ऐसे में क्षेत्र (जसवन्तनगर व इटावा) की सारी समस्याओं को सुलझाने की जिम्मेदारी उन्हीं की होती थी, सहज और संघर्षशील होने के कारण लोग इन्हें ही पकड़ते थे। वे शुरू से ही कमजोरों के पक्ष में लड़ने के लिए विख्यात रहे हैं। बीस-इक्कीस वर्ष की अवस्था से उन्होंने राजनीति में सीधे भाग लेना शुरू किया। पोस्टर चिपकाने, पर्ची बनाने और बूथ प्रबंधन आदि में उनका कोई सानी नहीं था। चैधरी चरण सिंह, रवि राय, जनेश्वर मिश्र जैसे नेता जब भी इटावा आते, उन्हें रेलवे स्टेशन से रिसीव कर उनकी मीटिंग कराने तक की जिम्मेदारी शिवपाल जी की ही होती थी। प्रतिकूल से प्रतिकूल परिस्थितियों में भी शिवपाल जी ने बड़ी सभाएं करवाई। उनकी लोकप्रियता जाति व उम्र की परिधि से परे रही है। वे जितने प्रिय बुजुर्गों के रहे हैं, उतने ही बच्चों के। वही लगाव आज बदस्तूर व बावकार यथावत बना हुआ है अपितु देखा जाए तो कई गुना बढ़ा है।
मैंने 2012 और 2017 के विधानसभा चुनाव में प्रचार के लिए जसवंतनगर विधानसभा की गलियों और गांवों में घूमते यमय महसूस किया कि शिवपाल का वहाँ के हर घर से एक ममत्व का आपरिभाषित सा रिश्ता है जो दशकों की अनथक श्रम व साधना से बना है, यही उनकी ताकत है जिसने जसवंतनगर में उन्हें “अजेय“ बना दिया।
शिवपाल जी को 2012 के विधानसभा चुनाव में 133563 वोट मिले जबकि इनके निकटतम विरोधी तत्कालीन सत्ताधारी बसपा के प्रत्याशी को इनको मिले मतों के मुकाबले आधे से भी कम 52479 मत मिले। जीत का अंतर 81084 मतों का रहा। अंक शास्त्री मानते है कि अन्त में चैरासी का अंक अत्यंत शुभ होता है। भारत के इतिहास में पहली बार सबसे बड़े सूबे में समाजवादी पक्ष की बहुमत की सरकार बनी। शिवपाल की लगातार चैथी जीत थी। उन्हें 1996 में समाजवादी पार्टी ने नेताजी मुलायम सिंह यादव को मैनपुरी से सांसद और केन्द्र में रक्षा मंत्री के बन जाने के बाद जसवंतनगर से प्रत्याशी बनाया। उनका पहला चुनाव आसान नहीं था। उस समय उत्तर प्रदेश में काबिज बसपा सरकार व मुख्यमंत्री मायावती किसी भी कीमत में शिवपाल को हराना चाहती थी। कांग्रेस ने कद्दावर और अनुभवी नेता दर्शन सिंह यादव को इनके मुकाबले खड़ा किया जो 1993 में नेताजी से सिर्फ 1161 मतों से हारे थे। मुकाबला बेहद कड़ा था पूरे उत्तर प्रदेश की निगाहें इस चुनाव पर थी। ऐसी चर्चा रही कि बसपा व बामसेफ ने अपना वोट भी कांग्रेस प्रत्याशी के खाते में गापनीय तरीके से डालने का निर्देश दिया था ताकि शिवपाल को हराकर समाजवादी पार्टी और मुलायम सिंह को उनके गढ़ में ही घेर लें, ऐसी ही रणनीति भाजपा व आर.एस.एस. ने भी बनाई थी। पूरी योजना शिवपाल को अभिमन्यु बनाने की थी लेकिन वो अर्जुन निकले। 68337 वोट प्राप्त करते हुए उन्होंने यह चुनाव लगभग 11 हजार वोटों से जीता। उसके बाद से अब तक वह जसवंतनगर के यश के वंत बने हुए हैं। 2014 में नेताजी मैनपुरी व आजमगढ़ से चुनाव लड़े, जसवंतनगर विधानसभा मैनपुरी लोकसभा का हिस्सा है। नेताजी लोकसभा चुनाव 364666 मतों से जीते जिसमें अकेले जसवंतनगर ने 160000 से अधिक की लीड दी। इसकी पुनरावृत्ति उन्होंने तेजप्रताप यादव के भी लोकसभा उनचुनाव में की। प्रतिकूल वातावरण के बावजूद 2017 के विधानसभा चुनाव में उनकी भारी मतों से जीत उनकी लोकप्रियता का परिचायक है।
शिवपाल जी में राजनीतिक धैर्य की कमी नहीं। वे जितने मारक प्रहारक हैं, उतने ही धैर्यवान और सुलझे हुए राजनीतिज्ञ हैं। वे “स्काईलैब“ की तरह राजनीति में नहीं आए। छात्र-जीवन से राजनीति प्रारम्भ कर दी थी। सत्तर के दशक के शुरूआत से ही उन्होंने जन सम्पर्क, पोस्टर आदि लगाना, बड़े नेताओं की सभा करवाना शुरू कर दिया था। आपातकाल के दौरान मुलायम सिंह यादव जी की गिरफ्तारी के बाद भी उन्होंने प्रतिकार के स्वर को कम नहीं होने दिया। वे बड़े भाई को जेल जाकर सारी घटनाओं से अवगत कराते थे, उन तक अखबार व साहित्य पहुंचाते थे और निर्देशानुसार गतिविधियों को मूर्तरूप देते थे। अस्सी के पूर्वाद्ध में उन्होंने के.के. डिग्री कालेज के छात्र संघ में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद को करारी मात देते हुए छात्र संघ अध्यक्ष पर बाबा रामनरेश को जितवाया। बाबा बिना हिचक स्वीकार करते हैं कि शिवपाल की कुशल रणनीति और मेहनत के कारण न केवल के.के. छात्र संघ अपितु बकेवर, अजीतमल समेत इटावा, औरैया के सभी कालेजों पर शिवपाल समर्थित पैनल की जीत हुई। इसी दौरान शरद यादव ने पदयात्रा निकाली जिसमें शिवपाल जी अपनी पूरी टोली के साथ दिल्ली की सीमा तक चले।
1974 में क्रिश्चियन कालेज से बीपीएड करने के बाद उनके सामने दो रास्ते थे या तो वे शिक्षक बनकर आराम की जिन्दगी बिताते या फिर बड़े भाई के पदचिन्ह पर चलते हुये राजनीति करते हुए लोगों के सुख-दुःख के सहयात्री बनते। तब राजनीति में नसुविधायें होती थी न पैसा। यह रास्ता जोखिम भरा और कष्टमय था, लेकिन शिवपाल ने आसान राह की बजाय दुरूह पथ का चयन किया और शिक्षक के रूप में आया “चयन पत्र“ धरा का धरा रह गया। नियति जिसे जहाँ पहुंचाना चाहती है उसका मार्ग स्वये प्रशस्त्र करती है। छात्र-राजनीति के वाया वे सहकारिता की राजनीति की ओर मुड़े। वे 1988 में जिला सहकारी बैंक के अध्यक्ष बने। जब वे अध्यक्ष बने थे तब सहकारी बैंक की कार्यशील पूंजी 40 करोड़ रुपये थी जो आज 400 करोड़ रुपये से अधिक है। वे एक साल 1995 से 1996 के दौरान इटावा जिला पंचायत के अधक्ष भी रहे हैं।
फरवरी 1994 में उत्तर प्रदेश सहकारी ग्राम विकास बैंक के अध्यक्ष निर्वाचित हुए और इस समय भी इसके माध्यम से गांव तथा किसानों के जीवन मात्र को सुधारने के साथ-साथ सहकारिता आंदोलन को मजबूत बनाने में लगे हुए हैं। शिवपाल जी की गणना उत्तर प्रदेश की सहकारिता के सबसे अधिक जानकारों में की जाती है। उन्हें बेहतर काम काज और पारदर्शिता के साथ बैंक की गतिविधियां संचालित करने के लिए सहकारी कृषि एवं विकास बैंक फेडरेशन (मुम्बई) द्वारा 3 वर्ष तक लगातार शील्ड दिया गया। 20 नवम्बर 2008 को उन्हें भारत के राष्ट्रपति रहे भारत-रत्न अबुल कलाम द्वारा “सहकारिता रत्न“ से सम्मानित किया गया। यह सम्मान वस्तुतः उनकी सेवाओं और योगदान को था। सही मायने में उत्तर प्रदेश सहकारिता के रत्न शिवपाल अब उततर प्रदेश के रत्न बन चुके हैं। वे राजनीति में क्रमशः आगे बढ़े हैं। पहले जिला प्रदेश में राजनीति की धुरी बने और राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में सक्रियता बढ़ा रहे हैं। वे 1996 में पहली बार बतौर विधायक विधानसभा में आए और अभी तक उन्होंने कई ऐसे कार्य किये हैं जिनसे उत्तर प्रदेश विधानसभा के इतिहास की चमक बढ़ी है। उनके कार्य व्यवहार और विधायी जानकारी के प्रशंसकों में विधानसभा को कवर करने वाले पत्रकारों के साथ-साथ पूर्व विधानसभा अध्यक्ष माता प्रसाद पाण्डेय भी हैं। विधानसभा कवर करने वाले एक वरिष्ठ पत्रकार के अनुसार वे शिवपाल की संकट मोचक वाली भूमिका के कायल हैं। वे तेरहवीं विधानसभा में 1997-1998 के दौरान अनुसूचित जातियों, जनजातियों तथा विमुक्त जातियों सम्बंधी संयुक्त समिति के सदस्य, चैदहवीं विधानसभा (2002-2007) में 2002-2003 के अंतराल में लोक लेखा समिति सार्वजनिक उपक्रम एवं निगम सम्बंधी समिति एवं 15वीं विधानसभा 2007-2012 में कार्य मंत्रणा समिति के सदस्य भी रहे। 2003 से मई 2007 तक उत्तर प्रदेश के कृषि, लोकनिर्माण, भूतत्व एवं खनिकर्म तथा ऊर्जा जैसे संवेदनशील मंत्रालयों के मुखिया रहें। इस दौरान इन्होंने श्री मुलायम सिंह जी के मार्गदर्शन में कई ऐसे नवप्रवर्तनकारी कार्य किये जिसके लिए उनकी प्रशेसा आज भी होती है। उन्हीं की देन है कि 27 नवम्बर 2006 को 15500 गांवों तक बिजली पहुंचाने वाले प्रदेश के रूप में उत्तर प्रदेश का नाम दर्ज हुआ। उन्होंने बैंकों से कृषि ऋण को और अधिक आसान बनाकर ग्रामोन्मुखी नीतियों को कार्यरूप में बदला। 15वीं विधानसभा के इतिहास में उनका नाम लोकबन्धु राजनारायण, चैधरी चरण सिंह व मुलायम सिंह की सार्थक प्रतिकार की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले नेता प्रतिपक्ष के रूप में सदैव दर्ज रहेगा। नेताजी के लोकसभा में होने और प्रखर वक्ता आज़म खान के 24 मई 2009 को समाजवादी पार्टी छोड़ने के पश्चात् भी इन्होंने विधानसभा में प्रतिपक्ष के रूप में बसपा की बहुमत वाली सरकार को कई बार बैक फुट पर जाने के लिये विवश किया। दिसम्बर 04, 2010 का दिन जब आज़म साहब पार्टी में वापस आए, हम सभी के साथ-साथ सपा के प्रांतीय कार्यालय की प्राचीरें साक्षी हैं कि शिवपाल जी ने नेता प्रतिपक्ष का पद छोड़ने में उतना ही समय लगाया जितना इस्तीफा लिखने में लगता है। उस दिन शिवपाल का कद लाल बत्तियों से काफी ऊँचा हो गया। अर्जित करने वाले लोग बड़े होते हैं किन्तु त्याग करने वाले महान, शिवपाल के इस निण्रय की जमकर तारीफ हुई थी मेरी आंखों को तब से वे और भी भाने लगे।
समाजवादी पार्टी की उत्तर प्रदेश इकाई के वे 1997 में प्रमुख महासचिव हुए। चतुर्थ राज्य सम्मेलन में 25 नवम्बर को उन्हें दोबारा महासचिव बनाया गया। पार्टी के संस्थापक प्रदेश अध्यक्ष रामशरण दास जी के काफी अस्वस्थ होने पर उन्हें 1 नवम्बर 2007 को कार्यकारिणी अध्यक्ष का दायित्व दिया गया। पांचवे राज्य सम्मेलन (01 से 03 नवम्बर, मेरठ) में इसकी घोषणा हुई। 21 नवम्बर 2008 को रामशरण दास जी के महाप्रयाण के बाद वे अध्यक्ष हुए। रामशरण दास जी की ही गवाही पर इंदिरा गांधी को सजा हुई जिसके बाद देश पर आपात काल आरोपित हुआ। समाजवादी नेता रामशरण दास को 1974 में गवाही से मुकरने के लिए तत्कालीन इंदिरा सरकार और सरकार समर्थक उद्योगपतियों ने क्या-क्या लोभ नहीं दिए लेकिन रामशरण जी टूटे नहीं पद और पैसे का प्रलोभन बेअसर रहा। 06 जनवरी 2009 को वे राज्य कार्यसमिति द्वारा विधिवत अध्यक्ष निर्वाचित हुए, पहली ही परीक्षा भदोही का उपचुनाव पड़ा। बसपा सरकार ने सरोज को खड़ा किया, उसके सभी मंत्रियों व प्रशासन की कूट रचना शिवपाल जी की रणनीति के आगे नाकारी साबित हुई। सपा की प्रत्याशी मधुबाला पासी विजयी हुई। यह मिथ शिवपाल ने तोड़ दिया कि बसपा राज में विपक्ष उपचुनाव नहीं जीत सकता। सही मायने में यह सपा के जीतों और बसपा के पराजयों का प्रस्थान बिन्दु बना वे जून 2009 के प्रथम सप्ताह तक प्रदेश अध्यक्ष रहे। शिवपाल जी यद्यपि राजनीति की शास्त्रीय शैली का प्रतिनिधित्व करते हैं जो बुनियादी और विचारधारागत राजनीति की कोंख से उपजा है, तथापि उन्होंने अपने आपको कभी जड़ नहीं होने दिया। नई सोच, तकनीकि व कार्यविधियों को उन्होंने पर्याप्त सममान व स्थान दिया। उन्होंने 2005 में ही मंडी परिषद की वेबसाइट का और पार्टी दफ्तर में कम्प्यूटर सेल का उद्घाटन कर दिया था। समाजवादियों पर आरोप लगाया जाता है कि समाजवादी कम्प्यूटर व अंग्रेजी के विरोधी हैं। यह आरोप वे लोग लगाते हैं जिन्हें समाजवादी नीतियों की जानकारी नहीं है। समाजवादी छोटे यंत्रों पर आधारित आर्थिक विकेन्द्रीकरण की खुली वकालत की है। कम्प्यूटर भी लघुयंत्र है, यही कारण है कि सपा सरकार बनने के बाद लैपटाप प्रदान करने की योजना बनी। अंग्रेजी यहाँ शोषण का कारण होती है, वहीं समाजवादियों द्वारा भले ही विरोध हुआ हो अथवा स्वयं लोहिया जी ने अंग्रेजी में डंदापदक पत्रिका निकाली। "Economic after Marx" जैसी पुस्तकें उन्होंने आंग्ल भाषा में लिखी हैं। हाँ, इतना अवश्य है कि समाजवादियों ने सदैव सामंती भाषाओं की जगह लोकभाषाओं को तवज्जो दी है। चाहे वो लोहिया की पीढ़ी के समाजवादी हों अथवा उनके बाद की पीढ़ी हो जिसके सेतु पुरूष शिवपाल सिंह हैं। घोर विरोधी भी शिवपाल की सांगठनिक क्षमता और संघर्ष के माद्दा की प्रशंसा करते हैं।
ऐसा लग रहा है कि शब्द चित्र जीवनी में बदलता जा रहा है, उनकी जीवनी फिर कभी लिखूंगा। शिवपाल जी पर यदि लिखने बैठूं तो 500-600 पृष्ठ की पुस्तक भी छोटी पड़ जायेगी। यदि उनके वैचारिक और वैश्विक पक्ष पर न लिखूं तो एएक महत्वपूर्ण पहलू छूट जायेगा। शिवपाल जी से मिलने 12 नवम्बर 2012 को एक कार्यकर्ता किसी कार्य से उनके पास आया था, मंत्री जी ने उससे बातचीत में लोहिया जी के बारे में पूछा, संतोषजनक उत्तर न मिलने पर नेताजी के विषय में पूछा फिर भी वो कुछ बता नहीं पाया। उसके जाने के बाद मैंने मंत्री जी से आग्रह किया कि नेताजी पर एक पुस्तक आप लिखें क्योंकि आप उनके बहुआयामी संघर्षों के साक्षी हैं, नेताजी के बहाने नई पीढ़ी को समकालीन समाजवादी आन्दोलन व विचारधारा की जानकारी मिलेगी। उन्होंने मुझे ही लिखने को कहा। मैंने आठ नौ सप्ताह कुछ लिखा पर वह नेताजी के वेचारिक पक्ष ही केन्द्रित था, ज्यादातर उन अवधारणाओं को लिख पाया जिन्हें नेताजी ने लोहिया जी के बाद आगे बढ़ाया है। इसे आप ूूूण्सवीपंउनसंलंउण्पद में पढ़ सकते हैं। दोबारा मंत्रीजी से कहा आप लिखिये या फिर अपने संस्मरणों को बोल दीजिए, मैं उन्हें पंक्तिबद्ध कर दूंगा, बातचीत के आधार पर एक पुस्तक हो जायेगी। उन्होंने आग्रह स्वीकार कर लिया। मुलायम सिंह जी के व्यक्तित्व पर केन्द्रित पुस्तक “लोहिया के लेनिन मुलायम सिंह“ का विमोचन 23 दिसम्बर 2012 को हुआ। इसमें मंत्रीजी ने काफी मेहनत किया था, इसके बाद इसके ई-संस्करण www.lohiamulayam.in का विमोचन 10 मई 2013 तद्नुसार बैसाख शुक्ल प्रथम संवत् 2070 को दिन रविवार को क्रान्ति दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित संगोष्ठी में हुआ था। इस संगोष्ठी में मो० आज़म खान, उदय प्रताप सिंह, अरविन्द सिंह गोप, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी गोविन्द प्रसाद, धर्मानन्द तिवारी समेत कई वक्ताओं ने अपने विचार रखे थे। इस पुस्तक की प्रशंसा कई लोगों ने की। मारीशस के प्रधानमंत्री सर अनिरूद्ध जगन्नाथ से लेकर बारह वर्षीय जगन्नाथ सिंह ने इसे पढ़ा ओर लाभ उठाया। इण्टरनेट पर न जाने कितने लोगों ने पढ़ा होगा। जहाँ तक मेरी जानकारी है नेताजी पर यह पहली ई-बुक है। नेताजी के बाद शिवपाल जी ने चैधरी चरण सिंह पर पुस्तक लिखी जिसका विमोचन 23 दिसम्बर 2013 को चरण सिंह जी की जयंती के दिन आयोजित कार्यक्रम में हुआ, और इसके ई संस्करण www.charansingh.in का विमोचन चरण सिंह जयंती 2014 को हैबरा कालेज में ही हुआ। यह भी चरण सिंह पर लिखी गयी पहली ई-बुक है। रामप्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खान, चन्द्रशेखर आजाद, महात्मा गांधी, राम मनोहर लोहिया के साथ-साथ बाबू कपिलदेव सिंह, रामशरण दसा, जनेश्वर मिश्र, मोहन सिंह व ब्रजभूषण तिवारी पर भी उनके लेख प्रकाशित हो चुके हैं। राम मनोहर लोहिया के विचारों से अवगत कराने के लिए उन्होंने लोहिया के द्रौपदी व सावित्री, दो कटघरे जैसे भाषणों को पुस्तकाकार में छपवा कर बंटवाया। लोहिया के सभी भाषणों को जो अब तक टेप कैसेट्स में उपलब्ध थी, उन्होंने पेन ड्राइव में करवाया जिसका विमोचन लोहिया जयंती 23 मार्च 2012 के अवसर पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव व उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने किया था। जिस प्रवदरी विशाल पित्ती के योगदान की चर्चा लोहिया जी के भाषणों को संरक्षित रखने में होती है, मधु लिमए जी का उल्लेख उनके वक्तव्यों के मीमांसक के रूप में होती है, इसी प्रकार लोहिया के सभी भाषणों को सदैव के लिए बचाकर रखने और एक जगह उपलब्ध कराने के लिए शिवपाल जी का नाम सदैव लिया जायेगा। उन्होंने जनेश्वर जी पर भी पहली ई-बुक निकलवायी।
मैं समाजवाद के प्रहरी के रूप में अनुचिन्तन निकालता हूँ जिसके लोहिया व समाजवाद पर अब तक 9 विशेष अंक प्रकाशित हो चुके है इसे ूूूण्ंदनबीपदजंदण्बवउ पढ़ा जा सकता है। इसके दो शोधपरक अंक “स्वतंत्रता संग्राम, समाजवादी आन्दोलन व लोहिया“ तथा “सांस्कृतिक उपनिवेशवाद हिन्दी व डा० लोहिया“ किसी भी दशा में नहीं निकल पाते यदि शिवपाल जी व्यक्तिगत अभिरूचि न लेते क्योंकि दोनों विशेषांको में शोध-कार्य बहुत था। मैं अकिंचन कहाँ से करता? “स्वतंत्रता संग्राम, समाजवादी आन्दोलन व लोहिया“ के अतिथि संपादक भी शिवपाल जी हैं। अपने हर उद्बोधन में वे सन् बयालिस में समाजवादियों के योगदान को जरूर रेखांकित करते हैं व पूरे प्रदेश को घूम-घूमकर उन्होंने कम से कम तीन बातें तो बता दी हैं, बालू-तबके को कहीं न कहीं बहस के लिए तर्क व तथ्य तो दे ही दिया है।
- ‘अंग्रजों भारत छोड़ो आन्दोलन’ की सफलता समाजवादियों की देन है।
- देश की एक लाख तिरालिस हजार वर्ग किमी पर चीन कब्जा जमा चुका है और भारत की अर्थव्यवस्था 2155.9 मिलियन डालर लगभग 2.7 लाख 35 हजार रुपये का कर्ज हे, पूरे बजट का इक्कीस फीसदी ब्याज चुकाने में जाता है।
- देश समग्र विकास में 135 देशों और प्रतिव्यक्ति आय में 142 देशों से पीछे है। कर्जा व कब्जा मुक्त समृद्ध देश सिर्फ समाजवाद से संभव है।
श्रीलंका के निगाम्बो कन्वेंशन 2013 में अमरीका के एक सोशलिस्ट साथी ने साथ में बैठकर शराब न पीने के कारण वोट नहीं दिया वरना मैं सोशलिस्ट काउन्सिल का महासचिव होता। अमरीकी दोस्त एन्थोनी बागले को यह नागवार गुजरा कि एक काले आदमी ने उसके आॅफर को इग्नोर कर दिया। इससे उसका वर्णीय अहं आहत हुआ, और तो कुछ नुकसान नहीं कर सकता था पर मुझे वोट नहीं दिया और दूसरी लाॅबी के जर्मन प्रत्याशी को दे दिया। मेरी योग्यता व योगदान सके अलावा मित्रता भी एक पैग की भेंट चढ़ गयी। जैसे हमारे यहाँ जातिभेद व जातिवाद की जकड़न है वैसे ही अमरीका में रंगभेद है। लोहिया ने 1964 में इसके खिलाफ सत्याग्रह किया था, गिरफ्तार भी हुये थे, भारी जन-दबाव ओर लोहिया के नैतिक आभा मण्डल के कारण अमरीकी प्रशासन को माफी मांगते हुए छोड़ना पड़ा था। लोहिया के साथ रूथ स्टेफन भी गिरफ्तार हुई थी। उनकी अमरीका यात्रा पर वहाँ प्रख्यात विद्वान व समाजवादी हैरिस वोफार्ड ने 242 पन्नों की पुस्तक “लोहिया एण्ड अमेरिका मीट“ लिखी है। चुनाव में हार के कारण और अमरीकी साथी रवैये से जब शिवपाल जी को अवगत कराया तो उन्होंने मजेदार सलाह दी कि साथ में कोल्ड ड्रिंक लेकर बैठ जाते, उसका भी मन रह जाता जीतने के बाद उसे बताते यह शिवपाल जी का अनुभव बोल रहा था। माउण्ट वेनिया सागर तट पर एक बार डूबते-डूबते बचा था, अच्छे कर्मों ने बचा लिया नहीं तो आज मैं स्वर्गीय होता। इस घटना को मैं खुद भी भूल चुका था जबकि आधे घण्टे सम्न्दर और मृत्यु दोनों ने मुझे फुटबाल बनाकर खेला था। उनसे जब मारीशस यात्रा का आशीर्वाद लेने गया तो उन्होंने साफ हिदायत दी कि समन्दर के किनारे मत जाना, जाना भी तो नहाना नहीं, नहाना भी तो एकदम किनारे रहना। मैं कपड़े आदि के मामले में बेहद लापरवाह हूँ, सार्क पीपुल्स में भाग लेने जब विदेश जा रहा था तो मंत्रीजी ने कहा थोड़े ढंग के कपड़े पहनकर जाना, आठ देशों के प्रतिनिधियों के बीच जा रहे हो, मेरे यह कहने पर कि तीन घण्टे बाद फ्लाइट है, इतनी जल्दी सदरी या कोट नहीं बन पायेगी। वे अंदर गए और अपनी नई सदरियाँ लाकर मुझे दे दी। यह उनका अभिभावकत्व है।
आजकल कई साथी मुझसे पूछते है कि तुम्हारे भाषण में इतना गुणात्मक सुधार कैसे आया। इसके पीछे वीणा-वादिनी के आशीर्वाद और शिवपाल जी की सलाह है। युवा सम्मेलन में मैंने जोश भरा भाषण दिया, मंत्रीजी उसमें मुख्य अतिथि थे। सभी लोगों ने भाषण की तारीफ की, अपने उद्बोधनों में मुझे उद्धरित किया, मंत्री जी ने भी अपने भाषण में तो तारीफ की लेकिन गाड़ी में बैठने के बाद अकेले होने पर डाँटा कि इतनी तेज आवाज में क्यों बोलते हो, माइक का काम माइक को करने दो, गले को माइक न बनाओ। आराम से तथ्यों को रखना चाहिए। जब मैं शिवपाल जी के साथ होता हूँ, उनकी बातों में गांव, गरीब, वंचितों की पीड़ा के साथ-साथ लोकजीवन की वे चर्चायें होती हैं जिनसे हमारी पीढ़ी अनभिज्ञ है।
उल्लेख्य है कि शिवपाल जी ऊँचाइयों को स्पर्श करने के बाद भी पुराने संघर्ष के दिनों और संघर्ष के साथियों को नहीं भूले। युवा पीढ़ी को भी वे यही सीख देते हैं। भाई अम्बरीश उनके साथ हेलीकाॅप्टर से एक बार अपने गांव गए। उन्होंने मंत्रीजी से कहा कि बचपन में एक बार उन्हें तत्कालीन विधायक ने जरप से उतार दिया था, आज विधायकों के सिरमौर के साथ हेलीकाॅप्टर से गांव जा रहे हैं बहुत अच्छा लग रहा है। यह सुनकर मंत्रीजी ने सीख दी कि कभी उन दिनों को मत भूलना।
वे जितने देशज हैं उतने ही वैश्विक भी। मैंने उनकी वैश्विक अभिरूचि 02 मई 2011 को देखी थी जब नेपाल के मंत्री जयप्रकाश और ईश्वर दयाल लखनऊ आये थे। पार्टी दफ्तर में हुई इस मुलाकात में उन्होंने भारत नेपाल के साझा सम्बन्धों, समस्याओं के अलावा वहाँ समाजवादी आंदोलन व नेतृत्व की भी जानकारी ली। तिब्बत का एक संसदीय दल अपनी आजादी की लड़ाई के लिए जनमत बनाने के लिए देशाटन पर निकला। उततर प्रदेश में उसकी सार्वजनिक मदद शिवपाल जी ने की। तिब्बतों सांसदों की एक राय है कि शिवपाल से अधिक सहयोगी मनोवृत्ति का और उपनिवेशवाद के विरूद्ध इतनी साफगोई से बोलने वाला नेता दूसरा नहीं। मारीशस के वर्तमान प्रधानमंत्री और तीन बार पहले भी प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति रह चुके मूवमेंट सोशलिस्ट मारीशस के नेता सर अनिरूद्ध जगन्नाथ को जब शिवपाल जी की लिखी पुस्तके दी तो वे बड़ी देर तक पहले तस्वीरें देखते रहे फिर पढ़ने लगे। थोड़ी देर बाद कहा कि मैं इस व्यक्ति से बात करना चाहता हूँ, इसमें जीस्ट है। सर अनिरुद्ध जगन्नाथ को मारीशस के लोकनायक जयप्रकाश नारायण की संज्ञा दी जाय तो अतिश्योक्तिपूर्ण कथन नहीं होगा। शिवपाल जी से उनकी बात हुई। बाद शिवपाल जी इण्डो मारीशस सोशलिस्ट काउन्सिल के अध्यक्ष बने तो किसी भी डेलीगेट ने सवाल नहीं उठाया, यह उनकी स्वीकारिता है। जहाँ तक मैंने महसूस किया है कि शिवपाल जी को पद व पैसे से अधिक प्रतिष्ठा प्रिय है।
उनकी राजनीति का यही मकसद भी है। मेरे एक साथी ने कहा है कि मेरी तरफ से शिवपाल जी को दुआ के रूप में यह शेर भेंट करना,
“खुदा बख़्शे तुझे इतनी शोहरत,
कि तेरे नाम से पहले किसी का नाम न हो।“
शिवपाल ने अपने आपको सतत संघर्ष व अनवरत कर्म से बड़ा बनाया है। नेपोलियन की उक्ति “मैने कर्म से ही अपने को बहुगुणित किया है। (I multiplied myself by activity) को उन्होंने अपना जीवन दर्शन बना लिया।
शब्द चित्र बीस या पच्चीस पन्नों का होता है, यह बड़ा होता जा रहा है। मैंने शिवपाल जी के जिस रूप को देख आपके सामने चित्रित कर दिया। पूरा लिख बैठता तो यह लघु पुस्तक ग्रन्थ में परिवर्तित हो जाती लेकिन संस्मरणों का खजाना खत्म नहीं होता। उनके साठवें जन्मदिन पर भी यही शुभकामना देता हूँ कवे राजनीति के शिखर पुरूष बनें, कमजोरों की ताकत बनें और देश के समाजवादी आन्दोलन तथा विचारधारा को नया आयाम दें।
“खुदा मेरे महबूब को सलामत रखे,
जमीं पे रहकर फरिश्तों का काम करता है,
दिल उनका बहुत एहतराम करता है।“