
नेताजी सुभाष चंद्र बोस और राममनोहर लोहिया की साझा विरासत के अग्रदूत कैप्टेन अब्बास अली की आज सौवीं जयंती है । यह वर्ष उनकी जन्म शताब्दी है । वे मनसा वाचा कर्मणा प्रतिबद्ध व प्रगतिशील समाजवादी, घोर सुभाषवादी व घनघोर लोहियावादी थे । उन्होंने त्याग, सादगी और सैद्धांतिक कटिबद्धता के जो उदाहरण सार्वजनिक जीवन में प्रस्तुत किए, अविस्मरणीय व अनुकरणीय है । वे चाहते तो सत्ता के उच्चासनों पर ख़ुद को आसीन कर सकते थे किंतु उन्होंने सिद्धांत को सदैव सत्ता एवं सत्ताजनित शक्ति व सुविधाओं से अधिक महत्व दिया । वे जितने बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे उससे भी बड़े सामाजिक सद्भाव के योद्धा थे । अपने आदर्श सुभाष व लोहिया की भाँति साम्प्रदायिकता के विरुद्ध जीवन-पर्यंत लड़ते रहे और ऐसे समय महाप्रयाण किया जब राष्ट्र-देश को उनकी सर्वाधिक आवश्यकता थी ।वे चंद्रशेखर आज़ाद- भगत सिंह की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन आर्मी से जुड़ कर क्रांति करना चाहते थे पर सुयोग न बन सका । १९४५ में २५ वर्ष की अवस्था में सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व वाली आज़ाद हिंद फ़ौज के सेनानी बने और स्वतंत्रता की बेदी पर ख़ुद को निसार दिया । ज़ालिम ब्रितानिया हुकूमत ने उन्हें मौत की सजा दी । असहनीय यातनायें भी उनके फ़ौलादी हिम्मत को डिगा न सकीं । भारत आज़ाद हुआ, वे जेल से रिहा हुए । लोकप्रियता की बुलंदी पर सवार चचा चाहते तो मिनिस्टर बन सकते थे पर उन्होंने लोहिया का कंटकाकीर्ण राह चुना ताकि भारत का भविष्य और बेहतर बना सके । अपने अद्भुत संगठन-क्षमता का प्रयोग समाजवादी आंदोलन व सामाजिक समरसता के सशक्तिकरण में लगा दिया । आपातकाल का प्रतिकार करते हुए १९ महीने जेल में रहे । उन्होंने अपने जीवन के ५० साल कारागार में बिताये । वे अनासक्त कर्मयोगी थे । आज़ जब देश में लोकजीवन भ्रष्टाचार व साम्प्रदायिकता की विष-बेल की जकड़ में फँसती जा रही है , चचा अपने जीवनकाल से भी अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं...
उनकी तो इक मिसाल जैसे कोई दरख़्त
औरों को छाँव बख्शे ख़ुद धूप में जले
आइए, नेताजी के कप्तान, लोहिया के सेनानी भारत माँ के लाल अब्बास अली की जयंती व जन्मशताब्दी वर्ष पर उन्हें नमन करते हुए सांप्रदायिकता के विनाश व यकजहती की मज़बूती का संकल्प लें....
आओ उनके अपने ख़्वाबों का हिंद बनायें
नफ़रतों से परेशान हैं आप भी हम भी