Image अब कौन कहेगा, ये मुदित मतवाला सुन दीपक दूर तक जाएगा तेरा उजाला मारीशस विश्व हिंदी सम्मेलन चल रहा था। दुनिया भर के भाषाविद व हिंदी सेवी पोर्ट लुइस में एकत्र थे, उनमें साहित्कार एवं तत्कालीन राज्यपाल गोआ मृदुला दीदी भी थीं और मैं भी। मैं हिंदी के पक्ष में लिखा पर्चा सबको बांटता और फ़ोटो खिंचवाता । पर्चे बांटना व जनमत बनाना मेरा राजनीतिक कर्म है । फ़िल्म प्रमाणन बोर्ड के अध्यक्ष व गीतकार प्रसून जोशी से बतकही कर जैसे आगे बढ़ा पीछे से अति अपनीय व मृदुल आवाज आई- सुन दीपक ए मुदित मतवाला' मैंने मुड़ कर देखा तो पाया यह स्वर यथा नाम तथा गुण मृदुला सिन्हा जी का था। उन्होंने अधिकार पूर्...
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Image भारतीय आत्मा के परचम-पुरुष महात्मा गाँधी और अल्बर्ट आइंस्टाइन के शब्दों में भारतीय मनीषा के प्रतिनिधि राममनोहर लोहिया के मध्य आपसी सम्बन्ध, वैचारिक साम्य व साझा विरासत पर नए सिरे से उनकी समसामयिक प्रासंगिकता की कसौटी पर चर्चा नितान्त आवश्यक है। सर्वमान्य व स्वमसिद्ध तथ्य है कि गाँधी व लोहिया ने देश के लोक मानस को सर्वाधिक प्रभावित व झंकृत किया। भारत के बाहर सत्याग्रह कर गिफ्तारी देने वाले ये दोनों नेता रहे हैं। रंग-भेद के खिलाफ बापू ने अफ्रीका तो लोहिया ने अमेरिका में सत्याग्रह किया था। देश की आजादी के वक्त लगभग सभी बड़े राष्ट्रीय नेता दिल्ली में सरकार के गठन की कवा...
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आज ही के पवित्र दिन १९०७ में भारतीय क्रांतिधर्मिता व समाजवादी सोच के प्रकाश स्तम्भ भगत सिंह का जन्म दिन हुआ था और सर्वविदित है कि 23 मार्च, 1931 को सात बजकर 33 मिनट पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन के सूत्रधार भगत सिंह ने देश रक्षा के लिए अपने प्राणों को त्याग दिया था, इसी तिथि को 1910 में क्रांतिधर्मी व चिंतक राममनोहर लोहिया ने गांधीवादी हीरालाल और चंदा देवी के घर में पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इन दोनों महापुरुषों के व्यक्तित्व, कार्य-प्रणाली, सोच एवं जीवन-दर्शन में कई समानताएं दृष्टिगत हैं। दोनों का सैद्धान्तिक लक्ष्य एक ऐसे शोषणविहीन, समतामूलक समाजवादी समाज क...
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Image गुरु पूर्णिमा पर प्रथम गुरु माता- पिता समेत शब्द-सियासत-साहित्य-संवेदना-संघर्ष व समझ का गुर देने वाले सभी गुरुगण विशेषकर छोटे लोहिया जनेश्वर जी, जार्ज फ़र्नांडीज़,भारत रत्न अटल बिहारी, ज्ञानपीठ रस्किन बॉन्ड, प्रथम लोकसभा के सदस्य रिशोंग कीशिंग, शायर-ए-आज़म कैफी आज़मी,महामना कुबेर मिश्र,लोकसभा अध्यक्ष रहे रवि रॉय, राष्ट्रवादी चिंतक शांता कुमार, गीतों के राजकुमार गोपाल दास नीरज, नेताजी मुलायम सिंह यादव व उनके लक्ष्मण शिवपाल सिंह को सादर प्रणाम...
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Image सर्वविदित तथ्य है कि भारत के महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंद्रशेखर आजाद देश को स्वतंत्र कराकर हिन्दुस्तान में गणतांत्रिक समाजवादी समाज की स्थापना करना चाहते थे। अपने इसी पवित्र लक्ष्य के लिए 7-8 सितम्बर 1928 को ऐतिहासिक फिरोजशाह कोटला किले के खण्डहरों में गठित हिन्दुस्तान समाजवादी गणतांत्रिक संघ के वे संस्थापक अध्यक्ष बने थे। आजाद और उनके क्रांतिधर्मी सहयोगी यथा भगत सिंह, बटुकेश्वर दत्त, सुखदेव, राजगुरू, मन्मथनाथ गुप्त, डा0 भगवान दास माहौर, विश्वनाथ वैशम्पायन कोरे क्रांतिकारी नहीं अपितु काफी मननशील स्वाध्यायी प्रवृत्ति के थे। दुर्भाग्य है कि आजाद व उनके साथियो...
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भारत का जाज्वल्यमान इतिहास साक्षी है कि 23 मार्च, 1931 को 7 बजकर 33 मिनट पर भगत सिंह ने देश रक्षा के लिए अपन प्राणों को त्यागा था। वहीं वर्ष 1910 में इसी तिथि पर क्रान्तिधर्मी व चिंतक राममनोहर लोहिया ने गांधीवादी हीरालाल और चंदा देवी के घर में पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इन दोनों महापुरुषों के व्यक्तित्व, कार्य-प्रणाली, सोच एवं जीवन-दर्शन में कई समानताएं दृष्टिगत होती हैं। दोनों का सैद्धान्तिक लक्ष्य एक ऐसे शोषणविहीन, समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का था, जिसमें कोई व्यक्ति किसी का शोषण न कर सके और किसी प्रकार का अप्राकृतिक अथवा अमानवीय विभेद न हो। लोहिया, भगत सिंह को अपना ...
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Image जो लोग आपसे मिलें और कहें कि हिंदुस्तान के मुसलमान पाकिस्तान-परस्त हैं, इस्लाम के कारण वे भारत-माता के सपूत नहीं हो सकते । आँखें बंद करें, अशफाक उल्ला खान, इंकलाब ज़िंदाबाद का नारा देने वाले चचा हसरत मोहानी, जय हिंद का उद्घोष देने वाले आबिद हसन सफ़रानी, कृष्णाश्रयी कवि रसखान , भगत सिंह का मुक़दमा लड़ने वाले आसफ़ अली व पाकिस्तान को धूल चटाने वाले ब्रिगेडियर उशमान व वीर अब्दुल हमीद के रूहानी चेहरे सोचें और मान लें कि ऐसी बातें कहने वाले साम्प्रदायिक और देशद्रोही हैं । उनके लिए धर्म वैयक्तिक आस्था नहीं, राजनीतिक हथियार है । भारतीय मनीषा कहती है कि धर्म कभी राष्ट्र नहीं हो सक...
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Image नेताजी सुभाष चंद्र बोस और राममनोहर लोहिया की साझा विरासत के अग्रदूत कैप्टेन अब्बास अली की आज सौवीं जयंती है । यह वर्ष उनकी जन्म शताब्दी है । वे मनसा वाचा कर्मणा प्रतिबद्ध व प्रगतिशील समाजवादी, घोर सुभाषवादी व घनघोर लोहियावादी थे । उन्होंने त्याग, सादगी और सैद्धांतिक कटिबद्धता के जो उदाहरण सार्वजनिक जीवन में प्रस्तुत किए, अविस्मरणीय व अनुकरणीय है । वे चाहते तो सत्ता के उच्चासनों पर ख़ुद को आसीन कर सकते थे किंतु उन्होंने सिद्धांत को सदैव सत्ता एवं सत्ताजनित शक्ति व सुविधाओं से अधिक महत्व दिया । वे जितने बड़े स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे उससे भी बड़े सामाजिक सद्भाव क...
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Image आप की आदतें मिलती हैं फ़रिश्तों से बहुत ख़ुद को मुमकिन हो तो मौसम से बचाते रहिए सुबह ही माता जी ने कहा कि पूस की अमावस है, काफ़ी सर्दी होगी , घर से बाहर न निकलना । सचमुच रात को लगा कि रोहतांग घाटी की बर्फीली सर्दी बर्फ़ का पैहरन उतार कर लखनऊ आ गई है । रूम हीटर जला कर मैं भी डबल रज़ाई ओढ़ कर सो । क़रीब सवा बजे फ़ोन की घंटी बजी, हिम्मत जुटा कर फ़ोन उठाया तो दूसरी तरफ़ दीपक मिश्र जी थी । तीन शब्दों का एक वाक्य सूत्र की तरह बोलकर कि तुरंत आ जाइए फ़ोन काट दिया । मैं दुविधा में... वो कभी इस तरह बुलाते नहीं, बुलाना तो दूर कभी १० बजे बजे के बाद फ़ोन तक नहीं किया । तभी उन्हीं का दोबारा फ़ोन आया ...
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अरबपतियों के मामले में तीसरे स्थान पर सुशोभित सबसे अधिक कुपोषितों वाले हमारे देश में आज भी इंसान इंसान को जानवर की तरह ढ़ोने के लिए अभिशप्त है । कोलकाता में नेताजी सुभाष चंद्र बोस के आवास से निकल कर पोद्दार छात्रावास की ओर पैदल बढ़ा , यह वही छात्रावास है जहां लोहिया रहते थे । सोचा की रिक्शा कर लूँ । एक बीमार बुजुर्ग को रिक्शा चलाते देख संशयवश पूछ बैठा कि इस उम्र में इतनी कमजोर शरीर कैसे रिक्शा खींच पायेगी । ‘रिक्शे को भूख खींचती है बाबू’ रिक्शे वाले के जवाब ने मुझे निस्तब्ध कर दिया । दुविधा में था, न बैठूँ तो उसे कमाई से वंचित करुंगा और रिक्शे पर बैठूँगा तो सिद्धांत और आत्म...
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शहीद शिरोमणि चंद्रशेखर आजाद की शहादत और वीरता से जुड़े बहुआयामी पहलुओं से पूरी दुनिया अवगत है। इस पक्ष पर विद्वानों एवं इतिहासकारों ने काफी कुछ लिखा और शोध किया है, किंतु समाजवादी आंदोलन एवं विचारधारा के संदर्भ में उनकी भूमिका और योगदान पर व्यापक चर्चा की अभी भी जरूरत है। उनके जीवन व सैद्धांतिक आग्रहों का निष्कर्ष उन्हें एक प्रतिबद्ध व प्रगतिशील समाजवादी सिद्ध करता है। इतिहास साक्षी है कि प्रथम अखिल भारतीय समाजवादी संगठन की स्थापना 8 सितम्बर 1928 को नई दिल्ली स्थित फिरोजशाह कोटला के पुराने किले के परिसर में हुई थी जिसके अध्यक्ष चंद्रशेखर आजाद ही थे। इसका नाम हिंदुस्त...
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भारतीय राजनीति की ऋषि-परम्परा को पूरी दुनिया बड़े ही श्रद्धा व सम्मान से देखा जाता है। यह परम्परा प्रहृलाद-राम-कृष्ण से प्रारम्भ होती है और वाया तिलक-गोखले-महात्मा गांधी, लोहिया व दीनदयाल तक पहुँचाती है। लोहिया व दीनदयाल भले ही दो अलग विचारधाराओं के कीर्ति-कलश एवं प्रतिमान-पुरुष हों किन्तु दोनों में कई सादृश्यतायें मिलती हैं। कहीं-कहीं दोनों एक दूसरे के पूरक व पर्याय भी प्रतीत होते हैं। उन्हें एक पथ के दो परंतप व परमाथभर्् पथिक कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी। डा0 लोहिया से पंडित दीनदयाल 7 वर्ष छोटे थे। लोहिया की मृत्यु 1967 में हुई तो पंडित जी ने 1968 में महाप्रयाण किया। इस दृष्ट...
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हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी के सूत्रधार शहीद-ए-आज़म भगत सिंह और महान क्रांतिधर्मी समाजवादी चिन्तक डा0 राम मनोहर लोहिया के व्यक्तित्व, सोच, कार्य प्रणाली तथा जीवन दर्शन में कई समानतायें एवं सादृश्यतायें दृष्टिगत हैं। भगत सिंह के स्वप्न एवं डा0 लोहिया की अवधारणायें व्यापक दृष्टिकोण से देखने में एक ही रूप व रंग के प्रतीत होते हैं। दोनों का सैद्धान्तिक साध्य ऐसे समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना थी जिसमें कोई व्यक्ति किसी का भी शोषण न कर सके। कई घटनायें, व्यक्ति और प्रेरक तत्व ऐसे हैं जो दोनों के जीवन में उभयनिष्ठ हैं। इसे महज मणिकांचन संयोग नहीं कहा ज...
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सर्वविदित है कि 23 मार्च, 1931 को सात बजकर 33 मिनट पर हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट एसोसिएशन के सूत्रधार भगत सिंह ने देश रक्षा के लिए अपने प्राणों को त्याग दिया था, इसी तिथि को 1910 में क्रांतिधर्मी व चिंतक राममनोहर लोहिया ने गांधीवादी हीरालाल और चंदा देवी के घर में पुत्र के रूप में जन्म लिया था। इन दोनों महापुरुषों के व्यक्तित्व, कार्य-प्रणाली, सोच एवं जीवन-दर्शन में कई समानताएं दृष्टिगत हैं। दोनों का सैद्धान्तिक लक्ष्य एक ऐसे शोषणविहीन, समतामूलक समाजवादी समाज की स्थापना का था जिसमें कोई व्यक्ति किसी का शोषण न कर सके और किसी प्रकार का अप्राकृतिक अथवा अमानवीय विभेद न हो। लो...
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इनकी चंद तस्वीरें कहीं महफूज कर लीजै सवाल उठेगा मुस्तकबिल में ऐसे लोग, कैसे थे? जमीं पर रहते थे, फरिश्तों के जैसे थे समाजवाद के अनन्य व्याख्याता, शाश्वत व नवप्रवर्तनकारी वैचारिकी के क्रांतिधर्मी चिन्तक, शोषितों-पीडि़तों-वंचितों के प्रबल पैरोकार, त्यागमूर्ति, लोहिया के अप्रतिम अनुयायी जनेश्वर मिश्र का उल्लेख आते ही स्मृति पटल पर कई चित्र स्वतः ही उभरने लगते हैं। एक तस्वीर सामाजिक रूढि़यों का सार्वजनिक प्रतिकार करते हुए किशोर की होती है, दूसरी तस्वीर संघर्ष के बल पर समाजवाद और लोकतंत्र की अलख जगाने वाले प्रतिबद्ध युवा की होती है, तीसरी तस्वीर जनता के दुःख-दर्द-दंश ...
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