‘‘घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें,किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए हमसफर कोई तो हो वक्त के वीराने में,सूनी आँखों में कोई ख़्वाब सजाया जाए गम अकेला हो तो सांसों को सताता है बहुत,दर्द को दर्द का हमदर्द बनाया जाए जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं,उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए रोशनी की भी हिफाजत है इबादत की तरह,बुझते सूरज से चिरागों को जलाया जाए’’ चचा निदा फाज़ली की इस लोकप्रिय गज़ल के मतले का शेर है ‘‘अपना गम ले के कहीं और न जाया जाए, घर में बिखरी हुई चीजों को सजाया जाए’’ इस गज़ल को मैं सुनता और पढ़ता तो कई साल से रहा हूँ, लेकिन इसके एहसास व गहराई से ...
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नियति जिससे ऐतिहासिक कार्य कराना चाहती है, उसकी पृष्ठ भूमि स्वयं बैठकर तैयार करती है। एक दिन भारतीय समाजवाद और समाजवादी नेताओं पर उपलब्ध प्रामाणिक पुस्तकों पर वरिष्ठ समाजवादी नेता, मंत्री व लेखकीय सरोकार रखने वाले शिवपाल जी से चर्चा हो रही थी तो सहसा उन्होंने पूछा कि नेताजी (मा0 मुलायम सिंह) पर कितनी पुस्तकें लिखी गयी हैं जो उनके व्यक्तित्व व वैचारिक अवदान को रेखांकित करती हैं। खोजने पर 6 पुस्तकें मिलीं, लेकिन सभी मँहगी व मोटी पुस्तकें हैं जो या तो पुस्तकालयों में रखी जा सकती हैं या जिन्हें सिर्फ सम्पन्न लोग खरीद कर पढ़ सकते हैं। शिवपाल जी ने नेताजी पर 30-40 पन्नों की पुस्...
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यायावरी और सियासत ने कहाँ-कहाँ भटकाया और क्या-क्या दृष्य दिखलाये, कागज में उकेरने बैठता हूँ तो शब्द व भाव, साथ-साथ चलते हुए तो प्रतीत होते हैं किन्तु मिल नहीं पाते, समन्दर के दो किनारों की भाँति। अमीरी के कैलाश को देखा तो उसी की तलहटी में गरीबी की खाई भी मुँह चिढ़ाते नजर आई। बर्फ की गोद में सुलगते कश्मीर का सच जानते हुए भी कहा और लिखा नहीं जा सकता। धर्म और राजनीति का काम नफरत की सर्वग्रासी अग्नि को बुझाना है तो धर्म को आग लगाते और राजनीति को उस आग में घृत डालते देखा तो हतप्रभ होना स्वाभाविक था। मुजफ्फरनगर में अवांछनीय दंगे हुए, दंगें कहीं भी हों दुःखद और दुर्भाग्यपूर्ण होते ...
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महान समाजवाद चिन्तक व स्वतंत्रता संग्राम सेनानी राममनोहर लोहिया की पुण्यतिथि के दिन 12 अक्टूबर, 1938 को जन्मे उर्दू के नवप्रवर्तनकारी शायरों में अग्रगण्य निदा फाज़ली ने लिखा है “हर आदमी में होते हैं दस बीस आदमी, जिसको भी देखना हो कई बार देखना, दरिया के उस किनारे सितारे भी फूल भी, दरिया चढ़ा हो तो उस पार देखना, दो-चार गाम राह को हमवार देखना“ ये पंक्तियां उन्होंने जिसके लिए भी चाहे जिस संदर्भ में लिखी हों किन्तु जिस वर्ष राममनोहर लोहिया ने हैदराबाद में सोशलिस्ट पार्टी की स्थापना की थी, उसी वर्ष 1955 के वसंत पंचमी के पवित्र दिन संवेदनशील सुघर सिंह व करुणा की मूरत मूर्ति देवी के पु...
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भारतीय परिप्रेक्ष्य में समाजवाद हमेशा एक व्यापक और गतिशील सिद्धान्त रहा है। यहाँ के लोकजीवन की प्राणवायु समाजवाद है। 20वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध से अब तक का विश्लेषणात्मक विवेचना की जाय तो हर दौर में एक जमात ऐसी रही है जो स्वयं घोषित रूप से समाजवादी कहती रही है और समाजवादी आंदोलन को आगे बढ़ाती रही है, 21वीं शताब्दी के पूर्वाद्ध में मुलायम सिंह यादव इसी जमात का प्रतिनिधित्व करते हैं, जिनका आज जन्मदिन है। 8-9 सितम्बर 1928 को चन्द्रशेखर आजाद के नेतृत्व में भगत सिंह, सुखदेव, राजगुरू जैसे चिन्तनशील क्रांतिकारियों ने हिन्दुस्तान रिपब्लिकन सोशलिस्ट आर्मी बनाया ताकि भारत को आजाद ...
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चाहे जितनी दे दौलत हमें मंजूर नहीं, बेवसूल की सियासत हमें मंजूर नहीं। जहाँ हुंकार भरी वहीं पे गया वक्त सिहर, हमने हर दौर के जालिम से ली है टक्कर, कभी ‘‘बापू’’ कभी ‘‘भगत’’ कभी ‘‘जयप्रकाष’’ बनकर, हमारे सीने में रोषन है चिराग-ए-लोहिया हो कहीं भी जु़ल्मत हमें मंजूर नहीं। हमारे वास्ते कोई नहीं पराया है, जब भी तम का घनेरा गहराया है। लहू दे के भी हर हाल में जलाया है, ‘‘षोशण’’ व ‘‘अन्याय’’ के खिलाफ समाजवाद का दिया झुके परचम-ए-सदाकत, हमें मंजूर नहीं, हो कहीं भी जुल्मत हमें मंजूर नहीं, गैर बराबरी दुनिया-जहाँ से मिटाया जाये, जो है कमजोर उन्हें हर सिम्त उठाया जाये। नारी ‘‘अबल...
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वर्तमान दौर वैश्वीकरण और उदारीकरण का है। पूरी दुनिया के देशों के हित एक दूसरे से बड़ी ही सूक्ष्म तथा जटिल तरीके से जुड़ चुके हैं। विश्व बैंक, विश्व व्यापार संगठन और संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका संप्रभु देशों की सरकारों के समानान्तर प्रभावशाली और महत्त्वपूर्ण हो चुकी है। 19वीं और 20वीं सदी वाले सैनिक तथा राजनीतिक उपनिवेशवाद का स्थान सांस्कृतिक उपनिवेशवाद ने ले लिया है। 21वीं सदी में यदि भारत को अंग्रेजी का उपनिवेश कहा जाय तो गलत न होगा। देश में अंग्रेजी का शासन ब्रिटानियाँ हुकूमत के जमाने में जितनी थी, आज उससे कम नहीं है, कभी-कभी तो प्रतीत होता है कि यहाँ वास्तविक राष्ट...
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कभी-कभी जीवन के स्मृति पटल पर कुछ घटनायें, कुछ चेहरे और कुछ अविस्मरणीय क्षण स्थायी रूप से अंकित हो जाते हैं जिनकी अनुभूतियों, चुभन व स्पंदन को शब्दों में व्यक्त करना दुष्कर होता है। ‘‘मूकास्वाद्नवत्’’ बातें हृदय में तरंगों की तरह आती हैं, एक छटपटाहट व कसीली कसमसाहट सी छोड़कर जाने कहाँ चली जाती हैं। उसके बाद बचती है सिर्फ निस्तब्ध खामोशी की अनुगूँज जिसे मैं सुन तो सकता हूँ पर सुना नहीं सकता। उस जगमगाती रात की स्याह सुबह आज भी याद है, ऐसा लगता है मानो कल की ही बात हो। पहली बार जीवन में महसूस किया कि ‘‘सच’’ कितना निष्ठुर, निर्मम, निहंग, निरीह और निर्लज्ज होता है? अपनी लाश आप उ...
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(1936 में लार्ड लिनलिथगो भारत के वायसराय बन कर आए। वे यहाँ 1944 तक रहे, यह दौर काफी उच्चावचन भरा रहा। द्वितीय विश्वयुद्ध फारवर्ड ब्लॉक गठन,अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन, क्रिप्स मिशन जैसी घटनायें इनके ही कार्यकाल में हुई। इनका मानना था कि सोशलिस्टों के कारण ही भारत छोड़ो आंदोलन इतना सफल व उन्मादी रहा। डा0 लोहिया ने इन्हे पत्र लिखकर आगाह किया था कि क्रांति की राह का रोड़ा न बनें।) प्रिय लार्ड लिनलिथगो, मैं नहीं जानता कि मैं आपको यह क्यों लिख रहा हूँ? मैं आपकी व्यवस्था से कुछ भी अपेक्षा नहीं रखता। घूसखोरी और कत्लेआम जो आपके नीचे हो रहा है और वह ताकत जिसका मैं प्रतिनिधित्व करता हू...
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पूरे देश के साथ स्वतंत्रता दिवस और गणराज्य दिवस मनाने के अतिरिक्त गोवावासी प्रतिवर्ष 18 जून को गोवा क्रांति दिवस भी मनाते हैं। स्मरणीय है कि इसी दिन 1946 में डा0 राममनोहर लोहिया अपने एक मित्र एवं सहपाठी डा0 मेनजीस के निमंत्रण पर कुछ दिनो के लिए गोवा गए थे। वहाँ उन्हें ज्ञात हुआ कि गोवावासियों को सभा लेने का सामान्य नागरिक अधिकार भी प्राप्त नहीं है। उसी समय उन्होंने वहाँ गोवावासियों की आजादी की प्राप्ति के लिए मडगांव में सविनय अवज्ञा पूर्वक कानून तोड़ते हुए सभा लेकर संघर्ष करने का आह्वान किया। गोवा प्रदेश की भूमि पर डा0 लोहिया का दिया हुआ भाषण वहां हिन्दी में दिया गया पहला ...
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डॉ0 राममनोहर लोहिया एक साथ कई किरदारों को निभाने वाले अप्रतिम विभूति थे, वे जितने महान चिंतक थे, उतने ही बड़े विद्वान और उससे कहीं अधिक बड़े राजनीतिज्ञ और समाज सुधारक, यदि इतिहास की वस्तुपरक तात्विक विवेचना करें तो डॉ0 लोहिया अग्रिम पंक्ति में खड़े क्रांतिधर्मी सत्याग्रही प्रतीत होते हैं। डा0 लोहिया ने भारत की आजादी की लड़ाई में बहुआयामी भूमिका निभाई और 15 अगस्त 1947 के बाद भी स्वतंत्रता के लिए संघर्षरत रहे, तभी तो राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त की कलम से निकला ‘‘एक ही तो वीर रहा सीना तान है, लोहिया महान है।’’ वे गोवा के लोकगीतों के नायक बन गए, ‘‘आग्वादच्या शिवा, तुमे आमका हांडल...
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